प्रयागराज/10 सितंबर 2026: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि किसी मुकदमे में मुख्य चश्मदीद की घटनास्थल पर मौजूदगी ही संदेह के घेरे में हो, तो उसकी मौखिक गवाही के आधार पर किसी आरोपी को आजीवन कारावास की सजा नहीं दी जा सकती। अदालत ने साक्ष्य और विवेचना में सामने आई कमियों को देखते हुए 2005 के हत्या मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द कर दो अभियुक्तों को बरी कर दिया।
यह फैसला न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने सुनाया। मामला मैनपुरी जिले के बेवर थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जहां तीन अगस्त 2005 को वीरपाल सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चश्मदीद की मौजूदगी पर उठाए सवाल
अभियोजन के मुताबिक, वारदात के समय वीरपाल सिंह के चचेरे भाई खुशीराम घटनास्थल पर मौजूद थे। खुशीराम सरकारी स्कूल में हेडमास्टर थे और उन्होंने खुद को घटना का प्रत्यक्षदर्शी बताया था। उनकी गवाही को मामले में महत्वपूर्ण साक्ष्य माना गया।
ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2007 में इसी गवाही के आधार पर सुखराम, जीतराज और औसान सिंह को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अपील के लंबित रहने के दौरान अभियुक्त सुखराम की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनकी अपील समाप्त कर दी गई।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान चश्मदीद की घटनास्थल पर मौजूदगी को लेकर महत्वपूर्ण सवाल सामने आया। अदालत ने गौर किया कि घटना सुबह करीब आठ बजे हुई थी, जबकि गवाह की उस समय स्कूल में आधिकारिक ड्यूटी थी। ऐसे में उसका घटनास्थल पर मौजूद होना स्वयं जांच का विषय था।
स्कूल के रिकॉर्ड की जांच नहीं करने पर विवेचना पर सवाल
पीठ ने पाया कि जांच अधिकारी ने इस महत्वपूर्ण तथ्य की पुष्टि के लिए स्कूल के हाजिरी रजिस्टर अथवा छुट्टी से संबंधित रिकॉर्ड का सत्यापन नहीं किया। यानी जिस व्यक्ति की गवाही अभियोजन के मामले की अहम कड़ी बनी, उसकी मौके पर मौजूदगी की पुष्टि करने के लिए उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड की ठीक से जांच ही नहीं की गई।
अदालत ने जांच की इस कमी को गंभीर चूक माना। आपराधिक मामलों में किसी गवाह की गवाही को परखते समय उसकी विश्वसनीयता के साथ-साथ यह देखना भी जरूरी होता है कि वह घटना को वास्तव में देख पाने की स्थिति में था या नहीं। यहां यही बुनियादी सवाल जांच के स्तर पर अनुत्तरित रह गया।
हथियारों की बैलिस्टिक जांच भी नहीं हुई
मामले में जांच की दूसरी बड़ी कमी हथियारों और गोली से जुड़े वैज्ञानिक साक्ष्यों को लेकर सामने आई। पुलिस घटना में इस्तेमाल बताए गए हथियारों की बैलिस्टिक जांच नहीं करा सकी।
इसके अलावा घटनास्थल से बरामद कारतूस और मृतक के शरीर से निकाली गई गोलियों का अभियुक्तों के कथित हथियारों से वैज्ञानिक मिलान भी साबित नहीं किया जा सका। ऐसे में प्रत्यक्षदर्शी की संदिग्ध मौजूदगी के साथ वैज्ञानिक साक्ष्य की कमी ने अभियोजन के मामले को और कमजोर कर दिया।
अदालत ने माना कि ऐसे विरोधाभासों और विवेचना की कमियों को नजरअंदाज कर केवल संदिग्ध चश्मदीद की मौखिक गवाही के आधार पर गंभीर दंड देना उचित नहीं होगा।
अभियोजन को संदेह से परे मामला साबित करना होता है
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में आपराधिक न्याय व्यवस्था के मूल सिद्धांत को भी रेखांकित किया। किसी आरोपी को दोषी साबित करने का दायित्व अभियोजन पक्ष पर होता है और उसे अपना मामला सभी उचित संदेहों से परे साबित करना पड़ता है।
मामले में चश्मदीद की घटनास्थल पर मौजूदगी को लेकर संदेह, स्कूल रिकॉर्ड की जांच न किया जाना और हथियारों व गोलियों का वैज्ञानिक मिलान साबित न होना—इन सभी परिस्थितियों को एक साथ देखते हुए अदालत ने अभियुक्त जीतराज और औशान सिंह को संदेह का लाभ दिया।
खंडपीठ ने दोनों को बरी करने का आदेश देते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को निरस्त कर दिया।









