नई दिल्ली, 16 अक्टूबर 2026। चुनावी हलफनामे में गलत जानकारी देने या महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम कानूनी स्पष्टीकरण दिया है। शीर्ष अदालत के अनुसार, आम नागरिक भी ऐसे मामलों में उम्मीदवार के खिलाफ निजी आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इसके लिए यह जरूरी नहीं है कि शिकायत केवल चुनाव आयोग की ओर से ही की जाए।
यह मामला जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 125ए से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस धारा के तहत चुनावी हलफनामे से संबंधित शिकायतों पर दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 195 की रोक लागू नहीं होती। हालांकि, अदालत ने संबंधित विधायक के खिलाफ पहले रद्द की गई आपराधिक कार्यवाही को बहाल नहीं किया।
चुनावी हलफनामे पर सुप्रीम कोर्ट का क्या है फैसला?
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा कि यदि किसी उम्मीदवार पर नामांकन के साथ दाखिल हलफनामे में गलत जानकारी देने या जरूरी तथ्य छिपाने का आरोप है, तो कोई निजी नागरिक भी उसके खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकता है।
अदालत के इस स्पष्टीकरण का अर्थ है कि ऐसे मामलों में शिकायत दर्ज कराने के लिए नागरिकों को केवल चुनाव आयोग पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। हालांकि, शिकायत की जांच और आगे की कानूनी कार्रवाई संबंधित कानून तथा मामले के तथ्यों के आधार पर होगी।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125ए क्या कहती है?
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 125ए चुनावी हलफनामे में निर्धारित जानकारी को लेकर उम्मीदवार की जिम्मेदारी से संबंधित है। इसके तहत गलत जानकारी देने, महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने या कानून के अनुसार आवश्यक जानकारी का खुलासा नहीं करने पर दंड का प्रावधान है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस धारा के तहत निजी शिकायत पर विचार करने के लिए CrPC की धारा 195 के अंतर्गत अधिकृत अधिकारी की शिकायत होना अनिवार्य नहीं है।
क्या चुनाव आयोग की मंजूरी जरूरी होगी?
- निजी शिकायत का अधिकार: आम नागरिक कथित गलत जानकारी या तथ्य छिपाने के मामले में आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकता है।
- चुनाव आयोग की भूमिका: शिकायत दर्ज कराने का अधिकार केवल चुनाव आयोग तक सीमित नहीं है।
- मजिस्ट्रेट की भूमिका: शिकायत के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर सक्षम मजिस्ट्रेट उचित कानूनी आदेश दे सकते हैं।
- झूठी शिकायत पर कार्रवाई: किसी उम्मीदवार को परेशान करने के उद्देश्य से की गई बेबुनियाद शिकायत के मामले में भी कानून के अनुसार उचित कार्रवाई की जा सकती है।
कर्नाटक के विधायक शैलेंद्र बेल्दाले से जुड़ा है मामला
यह मामला राजकुमार मदकी की शिकायत से संबंधित है। मदकी ने कर्नाटक के बीदर विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित विधायक शैलेंद्र बेल्दाले के खिलाफ आरोप लगाया था कि उन्होंने 2023 के विधानसभा चुनाव के दौरान नामांकन के साथ दाखिल हलफनामे में अपने आवासीय पते के बारे में गलत जानकारी दी थी।
मदकी ने बंगलूरू के अतिरिक्त मुख्य महानगर दंडाधिकारी के समक्ष CrPC की धारा 200 के तहत निजी आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी। उनका आरोप था कि कथित कृत्य जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125ए के तहत दंडनीय है।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने शिकायत क्यों रद्द की थी?
कर्नाटक हाईकोर्ट ने 7 मार्च 2025 को मदकी की शिकायत रद्द कर दी थी। हाईकोर्ट का मानना था कि कथित अपराध के संबंध में कार्रवाई शुरू करने के लिए चुनाव आयोग की ओर से शिकायत दर्ज कराई जानी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा था कि मतदाता ऐसे मामले में चुनाव याचिका का विकल्प अपना सकता है, लेकिन निजी आपराधिक शिकायत दर्ज नहीं करा सकता।
इसके बाद मदकी ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। शीर्ष अदालत ने कानूनी प्रश्न पर स्पष्ट किया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125ए को CrPC की धारा 195 में शामिल नहीं किया गया है। अदालत के अनुसार, कानून में इस प्रावधान को शामिल न करने का विधायी निर्णय महत्वपूर्ण है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी स्थिति स्पष्ट करने के बावजूद विधायक के खिलाफ पहले रद्द की गई कार्यवाही को बहाल नहीं किया।
मतदाताओं और चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों पर क्या होगा असर?
इस फैसले से चुनावी हलफनामों में दी गई जानकारी की जवाबदेही को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट हुई है। अब कथित गलत जानकारी या जरूरी तथ्य छिपाने के मामलों में आम नागरिक भी निजी आपराधिक शिकायत का रास्ता अपना सकते हैं। इससे चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की ओर से हलफनामे में दी गई जानकारी की जांच के लिए नागरिकों की कानूनी भूमिका मजबूत हो सकती है।
हालांकि, शिकायत दर्ज होने मात्र से किसी उम्मीदवार का दोष साबित नहीं होता। आरोपों की जांच, उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर ही आगे की कार्रवाई तय होगी। इसलिए इस फैसले को उम्मीदवार की स्वतः अयोग्यता या दोषसिद्धि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट के स्पष्टीकरण से चुनावी हलफनामों में कथित गलत जानकारी देने के मामलों में निजी नागरिकों के लिए आपराधिक शिकायत का रास्ता स्पष्ट हुआ है। साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शिकायत और दोष सिद्ध होना दो अलग-अलग कानूनी चरण हैं।













