प्रयागराज/17 अक्टूबर 2026: उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग में कथित फर्जी शिक्षक नियुक्तियों को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने कक्षा एक से आठ तक के सभी शिक्षकों को अपने नियुक्ति पत्र और शैक्षणिक योग्यता से संबंधित दस्तावेज जमा करने का निर्देश दिया है। कोर्ट के आदेश के अनुसार, दस्तावेजों की जांच के लिए बेसिक शिक्षा अधिकारियों (बीएसए) और स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) के बीच समन्वय स्थापित किया जाएगा।
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने कुसुमलता की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। मामले में सामने आए तथ्यों के आधार पर अदालत ने फर्जी दस्तावेजों से नौकरी हासिल करने के आरोपों को गंभीरता से लिया। कोर्ट ने सरकारी स्कूलों में घटती छात्र संख्या और शिक्षा की गुणवत्ता पर भी चिंता जताई।
फर्जी शिक्षक नियुक्तियों पर हाई कोर्ट का बड़ा निर्देश
सुनवाई के दौरान एसटीएफ के अपर पुलिस अधीक्षक कार्यालय से प्राप्त जानकारी के आधार पर बताया गया कि याची पर गोरखपुर के कोदीपुर स्थित कंपोजिट प्राथमिक विद्यालय बैरीपार में तैनात सहायक अध्यापिका कुसुमलता श्रीवास्तव के शैक्षणिक दस्तावेजों का इस्तेमाल कर नौकरी प्राप्त करने का आरोप है।
अदालत के अनुसार, याची 12 और 13 अक्टूबर को एसटीएफ के सामने पेश नहीं हुईं और सत्यापन के लिए शैक्षणिक योग्यता से संबंधित दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं किए। पिछली सुनवाई में उनके अधिवक्ता ने ऑपरेशन के कारण बेड रेस्ट पर होने की जानकारी दी थी।
एसटीएफ की जांच का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि प्रदेश में बड़ी संख्या में शिक्षकों की नियुक्तियों में जाली शैक्षणिक दस्तावेजों के इस्तेमाल की बात सामने आई है। कुछ मामलों में एक ही शैक्षणिक दस्तावेज के आधार पर 10 या उससे अधिक लोगों के नौकरी करने की जानकारी भी दी गई।
एक सप्ताह में नियुक्ति पत्र और शैक्षणिक दस्तावेज जमा करने होंगे
हाई कोर्ट ने कक्षा एक से आठ तक के सभी शिक्षकों को एक सप्ताह के भीतर अपने नियुक्ति पत्र और शैक्षणिक योग्यता से संबंधित दस्तावेज बीएसए के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
इसके साथ ही शिक्षकों को नोटरी से प्रमाणित शपथपत्र देना होगा। इसमें उन्हें बताना होगा कि उनका कोई निकट संबंधी बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) या उससे ऊपर के पद पर शिक्षा विभाग में कार्यरत है अथवा सेवानिवृत्त हो चुका है या नहीं।
अदालत ने निकट संबंधियों के दायरे में पति-पत्नी, पिता, पुत्र-पुत्री, दामाद, बहू, सास-ससुर, साला, जीजा और चचेरे भाई-बहन आदि का उल्लेख किया है। यदि किसी शिक्षक का ऐसा कोई संबंधी नहीं है, तो उसे इस संबंध में भी शपथपत्र देना होगा।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी बीएसए तत्काल प्रधानाध्यापकों और प्रभारी प्रधानाध्यापकों को आदेश जारी करें, ताकि निर्धारित समय में दस्तावेज जुटाने की प्रक्रिया पूरी की जा सके।
एक्सेल शीट बनाकर एसटीएफ को भेजे जाएंगे दस्तावेज
हाई कोर्ट ने केवल दस्तावेज जमा कराने तक ही कार्रवाई सीमित नहीं रखी है। आदेश के अनुसार, दस्तावेज प्राप्त होने के बाद प्रत्येक शिक्षक से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी संकलित की जाएगी।
इसमें शिक्षक का नाम, नियुक्ति की तारीख, शैक्षणिक योग्यता, नियुक्ति के समय निर्धारित न्यूनतम योग्यता और संबंधित गजट के अनुसार प्राप्त मेरिट जैसी जानकारियां शामिल होंगी। इनका विवरण एक्सेल शीट में तैयार किया जाएगा।
बीएसए को यह विवरण संबंधित दस्तावेजों के साथ एसटीएफ की संबंधित रेंज को भेजना होगा। इसके बाद एसटीएफ के रेंज प्रमुख सत्यापन की व्यवस्था करेंगे। जरूरत पड़ने पर वे पुलिस अधीक्षक, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक या पुलिस आयुक्त की सहायता भी ले सकेंगे।
इस प्रक्रिया का उद्देश्य नियुक्तियों से संबंधित अभिलेखों का सत्यापन कर संदिग्ध मामलों की पहचान करना है।
फर्जी नियुक्तियों पर पहले भी सख्त आदेश दे चुका है हाई कोर्ट
सुनवाई के दौरान अदालत ने समन्वय पीठ के 22 जनवरी 2026 के आदेश का भी उल्लेख किया। यह आदेश गरिमा सिंह बनाम राज्य मामले में दिया गया था।
उस आदेश में प्रमुख सचिव को फर्जी तरीके से हुई नियुक्तियों को निरस्त करने, संबंधित मामलों में वेतन की वसूली करने और नियुक्तियों में मिलीभगत करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कठोर विभागीय तथा दंडात्मक कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए थे। इसके लिए छह महीने की समय-सीमा भी निर्धारित की गई थी।
वर्तमान मामले में अदालत ने दस्तावेजों के सत्यापन और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही पर जोर दिया है। शिक्षा निदेशक को बीएसए की कार्रवाई की निगरानी करने का निर्देश दिया गया है, जबकि अपर पुलिस महानिदेशक, एसटीएफ सत्यापन और जांच की निगरानी करेंगे।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी अधिकारी की लापरवाही को गंभीरता से लिया जाएगा और जरूरत पड़ने पर उसे व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया जा सकता है।
सरकारी स्कूलों में घटती छात्र संख्या पर कोर्ट की चिंता
फर्जी शिक्षक नियुक्तियों के मामले में सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में घटती छात्र संख्या पर भी चिंता जताई।
अदालत ने कहा कि मुफ्त किताबें, मिड-डे मील और यूनिफॉर्म जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने के बावजूद यदि सरकारी स्कूलों की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो रहा है, तो इसके कारणों की गंभीरता से समीक्षा जरूरी है। कोर्ट ने शिक्षकों की गुणवत्ता को भी इस समस्या का एक संभावित कारण बताया।
अदालत की टिप्पणी के अनुसार, यह चुनौती केवल हाल के वर्षों में हुई नियुक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि पिछले दो दशकों से चली आ रही है।
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि एक अच्छे शिक्षक के लिए केवल विषय का ज्ञान पर्याप्त नहीं है। विद्यार्थियों को पढ़ाने की क्षमता, नियमित उपस्थिति, बच्चों के प्रति धैर्य और निष्पक्ष व्यवहार भी उतने ही जरूरी हैं।
अदालत ने कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया में ही धोखाधड़ी करने वाले व्यक्ति से बच्चों और उनके अभिभावकों के भरोसे पर खरा उतरने की अपेक्षा करना कठिन है।
चार नवंबर को होगी अगली सुनवाई
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मामले को चार नवंबर 2026 को अनुपालन रिपोर्ट और आगे विचार के लिए सूचीबद्ध किया है। संबंधित अधिकारियों को निर्देशों के पालन की जानकारी अदालत के सामने प्रस्तुत करनी होगी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि अधिकारियों को कार्रवाई पूरी करने में प्रशासनिक कठिनाई या संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ता है, तो वे अगली सुनवाई से पहले इस बारे में अदालत को अवगत करा सकते हैं।
इस आदेश का मुख्य उद्देश्य बेसिक शिक्षा विभाग में नियुक्तियों की पारदर्शिता सुनिश्चित करना, शैक्षणिक दस्तावेजों का सत्यापन करना और कथित फर्जी नियुक्तियों के मामलों में जिम्मेदारी तय करना है। अब निगाहें बीएसए और एसटीएफ की कार्रवाई तथा चार नवंबर को पेश की जाने वाली अनुपालन रिपोर्ट पर रहेंगी।










