नई दिल्ली/21 अक्टूबर 2026। अल नीनो के तेजी से मजबूत होने की आशंका ने भारत समेत दुनिया के कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। मानसून के दौरान सामान्य से कम बारिश के बाद अब सर्दियों के मौसम पर नजरें टिक गई हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के ताजा पूर्वानुमान के मुताबिक, प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से बढ़ सकता है। इसका असर दुनिया के विभिन्न हिस्सों में तापमान और बारिश के पैटर्न पर पड़ने की आशंका है।
भारत के लिए यह स्थिति खास तौर पर महत्वपूर्ण है। देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून का सीजन 13 प्रतिशत बारिश की कमी के साथ समाप्त हुआ। अब सवाल यह है कि आने वाले महीनों में तापमान सामान्य से अधिक रहने की स्थिति में खेती, जल संसाधनों और खाद्य उत्पादन पर कितना दबाव पड़ेगा। हालांकि, अल नीनो का प्रभाव हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं होता और स्थानीय मौसम की परिस्थितियां भी इसमें अहम भूमिका निभाती हैं।
अल नीनो पर WMO का बड़ा पूर्वानुमान, दिसंबर में बढ़ सकती है तीव्रता
विश्व मौसम विज्ञान संगठन की 21 अक्टूबर 2026 को जारी वैश्विक मौसमी जलवायु रिपोर्ट के अनुसार, नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के दौरान अल नीनो के और मजबूत होने का अनुमान है। इस अवधि में प्रशांत महासागर के प्रमुख निगरानी क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान की औसत विसंगति लगभग 3.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने का पूर्वानुमान है। इसके दिसंबर के आसपास चरम पर पहुंचने की संभावना जताई गई है।
WMO के अनुसार, समुद्र की सतह का बढ़ता तापमान वैश्विक मौसम प्रणालियों को प्रभावित कर सकता है। इससे कुछ क्षेत्रों में सूखे का जोखिम बढ़ सकता है, जबकि दूसरे इलाकों में सामान्य से अधिक बारिश और बाढ़ की परिस्थितियां बन सकती हैं। यह मौसमी पूर्वानुमान है, इसलिए इसे हर क्षेत्र में निश्चित रूप से होने वाली घटना नहीं माना जाना चाहिए।
क्या है अल नीनो और क्यों बदल जाता है मौसम?
अल नीनो प्रशांत महासागर से जुड़ी एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। इसमें मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। यह अल नीनो-दक्षिणी दोलन यानी ENSO का गर्म चरण है।
समुद्र के तापमान में इस बदलाव का असर वायुमंडलीय परिसंचरण, हवाओं की दिशा और वर्षा के वितरण पर पड़ता है। इसी वजह से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौसम का पारंपरिक पैटर्न बदल सकता है।
भारत में अल नीनो पर विशेष नजर रखी जाती है, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से इसका संबंध कई बार कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून से देखा गया है। हालांकि, हर अल नीनो वर्ष में भारत में सूखा पड़े, यह जरूरी नहीं है। हिंद महासागर की परिस्थितियां, अन्य जलवायु प्रणालियां और क्षेत्रीय मौसम भी मानसून को प्रभावित करते हैं।
मानसून में 13 प्रतिशत कम बारिश, कई क्षेत्रों में असमान वितरण
भारत का 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन बारिश की कमी के साथ समाप्त हुआ। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, देशभर में सामान्य से 13 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी 15 अक्टूबर तक पूरी हो गई थी।
हालांकि, देश के सभी हिस्सों में बारिश की स्थिति एक जैसी नहीं रही। कहीं वर्षा अपेक्षाकृत सामान्य रही, तो कुछ क्षेत्रों में कमी अधिक दर्ज की गई। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में 26 प्रतिशत तथा दक्षिण भारत में 24 प्रतिशत कम बारिश होने के दावे भी सामने आए हैं। इन क्षेत्रीय आंकड़ों को प्रकाशित करते समय संबंधित अवधि और IMD के आधिकारिक क्षेत्रवार आंकड़ों से मिलान करना जरूरी है।
कम बारिश का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता। इससे जलाशयों में पानी की उपलब्धता, भूजल स्तर, सिंचाई की जरूरत और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बढ़ सकता है। यदि आगे तापमान अधिक रहता है, तो पानी की मांग बढ़ने से चुनौती और गंभीर हो सकती है।
सर्दियों में बढ़ सकता है तापमान, खेती पर रहेगी नजर
विश्व मौसम विज्ञान संगठन की 14 अक्टूबर की रिपोर्ट में दक्षिण एशिया के अक्टूबर-दिसंबर 2026 के मौसमी पूर्वानुमान का उल्लेख किया गया है। दक्षिण एशियाई जलवायु दृष्टिकोण मंच (SASCOF) के आकलन के अनुसार, इस अवधि में क्षेत्र के अधिकांश हिस्सों में अधिकतम और न्यूनतम तापमान सामान्य या उससे अधिक रहने की संभावना है।
इसका अर्थ यह है कि सर्दियों में ठंड की तीव्रता और अवधि पर नजर रखना जरूरी होगा। हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि पूरे भारत में सर्दियां असामान्य रूप से गर्म ही रहेंगी। मौसम का वास्तविक स्वरूप क्षेत्र और समय के अनुसार बदल सकता है।
खेती के लिहाज से तापमान में बदलाव महत्वपूर्ण है। उत्तर भारत में गेहूं जैसी रबी फसलों की पैदावार पर सर्दियों के मौसम का सीधा असर पड़ता है। यदि फसल के दाने भरने के समय तापमान तेजी से बढ़ता है, तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है। दूसरी ओर, बारिश और ठंड की अनुकूल परिस्थितियां फसल के विकास में मदद करती हैं।
इसलिए किसानों के लिए केवल मौसमी अनुमान के आधार पर निर्णय लेने के बजाय कृषि विभाग और मौसम विज्ञान विभाग की स्थानीय सलाह पर ध्यान देना जरूरी होगा।
अल नीनो का वैश्विक असर: कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ का खतरा
अल नीनो का प्रभाव किसी एक देश या महाद्वीप तक सीमित नहीं रहता। प्रशांत महासागर में तापमान बढ़ने से वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण में बदलाव आता है, जिसका असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूप में दिखाई दे सकता है।
इंडोनेशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में जंगलों की आग का खतरा सूखे, भूमि प्रबंधन और अन्य स्थानीय कारणों से बढ़ सकता है। पूर्वी अफ्रीका के कुछ इलाकों में सूखे की स्थिति बन सकती है, जबकि दूसरे क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ की आशंका रहती है। दक्षिण अमेरिका में भी वर्षा के वितरण में बदलाव कृषि, जंगलों और जल संसाधनों को प्रभावित कर सकता है।
WMO का मौसमी पूर्वानुमान बताता है कि आगामी महीनों में दुनिया के कई क्षेत्रों में तापमान और बारिश का पैटर्न सामान्य से अलग रह सकता है। लेकिन हर प्राकृतिक आपदा को केवल अल नीनो का परिणाम मानना सही नहीं होगा। स्थानीय परिस्थितियां और दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन भी जोखिम को प्रभावित करते हैं।
भारत के सामने क्या हैं चुनौतियां और तैयारी के रास्ते?
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती मौसम में संभावित बदलावों के बीच पानी, कृषि और खाद्य आपूर्ति का बेहतर प्रबंधन करना है। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों के साथ कृषि एवं जल संसाधन विभागों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
किसानों को समय पर मौसम आधारित सलाह देना, कम पानी में तैयार होने वाली उपयुक्त फसलों को बढ़ावा देना, सिंचाई के बेहतर तरीकों को अपनाना और जलाशयों में उपलब्ध पानी का विवेकपूर्ण इस्तेमाल करना जरूरी है। जिन क्षेत्रों में बारिश की कमी रही है, वहां भूजल और सिंचाई की उपलब्धता पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होगी।
इसके साथ ही, गेहूं जैसी संवेदनशील फसलों के लिए तापमान संबंधी पूर्वानुमान पर नजर रखनी होगी। मौसम में बदलाव के संकेत मिलते ही कृषि विशेषज्ञों की सलाह किसानों तक पहुंचाना नुकसान कम करने में मदद कर सकता है।
निष्कर्ष: अल नीनो पर नजर, लेकिन घबराने की जरूरत नहीं
अल नीनो का मजबूत होना भारत के लिए एक गंभीर मौसमी संकेत है, खासकर तब जब मानसून सामान्य से कम बारिश के साथ समाप्त हुआ हो। आगामी सर्दियों में तापमान, बारिश और कृषि पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर सतर्कता जरूरी है।
फिलहाल, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वैश्विक पूर्वानुमानों को स्थानीय मौसम की जानकारी के साथ समझा जाए। समय पर तैयारी, पानी का बेहतर प्रबंधन और किसानों तक सटीक सलाह पहुंचाकर संभावित नुकसान को कम किया जा सकता है। आने वाले महीनों में WMO और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के नए अपडेट इस बात को स्पष्ट करने में मदद करेंगे कि अल नीनो का असर भारत के अलग-अलग हिस्सों में किस तरह सामने आता है।











