नई दिल्ली/21 अक्टूबर 2026: दिवाली से पहले दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए पराली प्रबंधन पर जोर बढ़ गया है। इसी दिशा में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने पंजाब और हरियाणा के गैर-एनसीआर जिलों में संचालित ईंट भट्ठों के लिए धान की पराली से बने बायोमास पेलेट और ब्रिकेट के इस्तेमाल का लक्ष्य निर्धारित किया है। एक नवंबर 2026 से ईंधन मिश्रण में इनकी हिस्सेदारी कम से कम 30 प्रतिशत करने का लक्ष्य है। आयोग की इस पहल का उद्देश्य खेतों में पराली जलाने की घटनाओं को कम करना और कृषि अवशेषों का वैकल्पिक उपयोग बढ़ाना है।
पराली से ईंट भट्ठों में बनेगा ईंधन, 1 नवंबर से लागू होगा नया लक्ष्य
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग के आधिकारिक निर्देश संख्या 92 के अनुसार, पंजाब और हरियाणा के गैर-एनसीआर जिलों में स्थित ईंट भट्ठों को चरणबद्ध तरीके से धान की पराली से बने बायोमास पेलेट या ब्रिकेट का इस्तेमाल करना है। इस व्यवस्था में ईंधन के रूप में पराली से तैयार सामग्री को दूसरे ईंधनों के साथ मिलाकर जलाया जाएगा।
आयोग ने इसके लिए कई वर्षों का लक्ष्य निर्धारित किया है:
- 1 नवंबर 2025 से: कम से कम 20 प्रतिशत बायोमास पेलेट या ब्रिकेट।
- 1 नवंबर 2026 से: कम से कम 30 प्रतिशत।
- 1 नवंबर 2027 से: कम से कम 40 प्रतिशत।
- 1 नवंबर 2028 से: कम से कम 50 प्रतिशत।
यह व्यवस्था खेतों में पराली जलाने के बजाय उसे उपयोगी ईंधन में बदलने को प्रोत्साहित करती है। आयोग ने संबंधित राज्य सरकारों को निर्देशों के अनुपालन और प्रगति की निगरानी करने को कहा है।
पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने पर रोक लगाने की कोशिश
धान की कटाई के बाद खेतों में बचने वाली पराली का निपटान किसानों के सामने बड़ी चुनौती बन जाता है। कम समय में अगली फसल की बुवाई की तैयारी के कारण कुछ किसान खेतों में ही अवशेष जला देते हैं। इससे निकलने वाला धुआं हवा में प्रदूषक कणों की मात्रा बढ़ा सकता है।
सर्दियों की शुरुआत में मौसम की परिस्थितियां भी प्रदूषण को गंभीर बना सकती हैं। दिल्ली-एनसीआर में स्थानीय वाहनों, निर्माण गतिविधियों, औद्योगिक उत्सर्जन और धूल के साथ क्षेत्रीय प्रदूषण का असर भी वायु गुणवत्ता पर पड़ता है।
ऐसे में पराली को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने की व्यवस्था किसानों के लिए कृषि अवशेषों के वैकल्पिक उपयोग का रास्ता खोल सकती है। हालांकि, इसके प्रभावी परिणाम के लिए पराली का संग्रह, परिवहन, पेलेट निर्माण और ईंट भट्ठों तक नियमित आपूर्ति जरूरी होगी।
प्रदूषण नियंत्रण के लिए निगरानी और कार्रवाई पर जोर
दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की रोकथाम के लिए केवल पराली प्रबंधन पर्याप्त नहीं है। सड़कों से उठने वाली धूल, वाहनों का धुआं, निर्माण कार्यों से निकलने वाले कण और औद्योगिक उत्सर्जन भी वायु गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।
इन स्रोतों पर नियंत्रण के लिए संबंधित विभागों को निगरानी, निरीक्षण और नियमों के अनुपालन पर ध्यान देना होगा। प्रदूषण नियंत्रण के उपाय तभी प्रभावी होंगे, जब अलग-अलग स्रोतों पर एक साथ कार्रवाई की जाए।
आयोग के आधिकारिक निर्देश में पंजाब और हरियाणा की राज्य सरकारों को ईंट भट्ठों में पराली आधारित ईंधन के इस्तेमाल को अनिवार्य बनाने तथा अनुपालन की जानकारी नियमित रूप से उपलब्ध कराने को कहा गया है।
क्या दिल्ली-एनसीआर को मिलेगी प्रदूषण से राहत?
पराली आधारित ईंधन का इस्तेमाल बढ़ने से खुले में कृषि अवशेष जलाने की जरूरत कम करने में मदद मिल सकती है। इससे क्षेत्रीय स्तर पर धुएं के एक महत्वपूर्ण स्रोत पर अंकुश लगाने की संभावना है।
लेकिन दिल्ली-एनसीआर की हवा को साफ रखने के लिए वाहनों, उद्योगों, निर्माण गतिविधियों और सड़क की धूल से होने वाले प्रदूषण पर भी लगातार नियंत्रण जरूरी है। साथ ही, ईंट भट्ठों में पराली आधारित ईंधन के इस्तेमाल से होने वाले उत्सर्जन की निगरानी भी महत्वपूर्ण रहेगी।
दिवाली और सर्दियों के दौरान वायु गुणवत्ता को लेकर बढ़ती चिंता के बीच यह पहल पराली प्रबंधन को प्रदूषण नियंत्रण से जोड़ती है। अब इसका वास्तविक असर निर्देशों के पालन, ईंधन की उपलब्धता और खेतों में पराली जलाने की घटनाओं में आने वाली कमी पर निर्भर करेगा।











