नई दिल्ली/25 अक्टूबर 2026: दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण और मरीजों को महंगी दवाओं से राहत देने की व्यवस्था के बीच एक बड़ा सवाल सामने आया है। तय कीमत से अधिक पर दवाएं बेचने के मामलों में फार्मा कंपनियों से हजारों करोड़ रुपये की वसूली अब भी बाकी है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, कुल ₹8,447.4 करोड़ की बकाया राशि में से अब तक ₹1,582.4 करोड़ ही वसूले जा सके हैं। बाकी रकम की वसूली के लिए सरकारी स्तर पर प्रक्रिया जारी है, जबकि बड़ी राशि कानूनी विवादों में उलझी हुई है।
मामला केवल सरकारी बकाया तक सीमित नहीं है। दवाओं पर होने वाला खर्च आम परिवारों के घरेलू बजट को भी प्रभावित करता है। ऐसे में कीमतों के नियमों का पालन सुनिश्चित करना और अतिरिक्त वसूली के मामलों का समयबद्ध निपटारा करना मरीजों के हित से जुड़ा अहम मुद्दा है।
दवा कंपनियों से वसूली: ₹8,447 करोड़ के मुकाबले कितनी रकम मिली?
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, दवा कंपनियों से वसूली जाने वाली कुल राशि ₹8,447.4 करोड़ है। इसमें से ₹1,582.4 करोड़ की वसूली हो चुकी है। यानी कुल बकाया का लगभग 18.7 प्रतिशत हिस्सा ही सरकारी खजाने में वापस आया है। शेष करीब ₹6,865 करोड़ की राशि की वसूली बाकी है।
इस बकाया रकम में ₹5,800 करोड़ से अधिक के मामले कानूनी विवादों में फंसे बताए गए हैं। इसके अलावा, लगभग ₹200 करोड़ की वसूली के लिए संबंधित मामले जिलाधिकारियों को भेजे गए हैं। वहीं, ₹2,369.3 करोड़ की राशि की वसूली की प्रक्रिया जारी है।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि कीमतों के उल्लंघन पर अतिरिक्त राशि वसूलने की व्यवस्था मौजूद होने के बावजूद, पूरी रकम की वसूली करना एक बड़ी प्रशासनिक और कानूनी चुनौती बना हुआ है।
कौन रखता है दवाओं की कीमतों पर नजर?
देश में दवाओं की कीमतों की निगरानी का प्रमुख जिम्मा राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) के पास है। यह केंद्र सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के औषध विभाग के अधीन कार्य करता है।
प्राधिकरण आवश्यक दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने और निर्धारित मूल्य सीमा के पालन पर नजर रखने का काम करता है। यदि कोई कंपनी लागू नियमों के विरुद्ध निर्धारित कीमत से अधिक राशि वसूलती है, तो संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत अतिरिक्त रकम और ब्याज की वसूली का आदेश दिया जा सकता है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दवा कंपनियां निर्धारित मूल्य सीमा का पालन करें और मरीजों को नियमों के विपरीत अधिक कीमत न चुकानी पड़े।
इलाज के खर्च में दवाओं की बड़ी हिस्सेदारी
अस्पताल में भर्ती होने या लंबे समय तक इलाज कराने की स्थिति में दवाओं पर होने वाला खर्च परिवारों के लिए बड़ी चिंता बन जाता है। खासकर कम आय वाले परिवारों के लिए लगातार दवाएं खरीदना आर्थिक दबाव बढ़ा सकता है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में इलाज के कुल खर्च का करीब 19 प्रतिशत हिस्सा दवाओं पर खर्च होता है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा लगभग 15 प्रतिशत है। ऐसे में दवाओं की कीमतों पर प्रभावी नियंत्रण केवल बाजार नियमन का विषय नहीं, बल्कि आम लोगों की स्वास्थ्य संबंधी आर्थिक सुरक्षा से भी जुड़ा है।
हालांकि, इन प्रतिशतों का आकलन किस सर्वेक्षण, वर्ष और खर्च की किस श्रेणी के आधार पर किया गया है, इसकी पुष्टि आवश्यक है।
महंगी दवा खरीदने वाले मरीजों को पैसा वापस मिलता है?
तय कीमत से अधिक पर दवा बेचे जाने के मामलों में अतिरिक्त राशि की वसूली का प्रावधान है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि संबंधित दवा खरीदने वाले प्रत्येक मरीज को स्वतः पैसा वापस मिल जाता है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वसूली की रकम सीधे मरीजों को लौटाने की सामान्य व्यवस्था नहीं है। इसलिए कीमत से अधिक भुगतान करने वाले उपभोक्ताओं के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण बना रहता है कि उन्हें राहत किस प्रक्रिया के तहत मिल सकती है।
मरीजों के हित में जरूरी है कि दवाओं की कीमतों से संबंधित शिकायतों का निपटारा पारदर्शी हो और उपभोक्ताओं को शिकायत दर्ज कराने तथा उपलब्ध कानूनी उपायों की स्पष्ट जानकारी मिले।
दवाओं के दाम बढ़ाने के क्या हैं नियम?
भारत में आवश्यक दवाओं की कीमतों का नियमन औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 (DPCO) और संबंधित प्रावधानों के तहत किया जाता है। आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची (NLEM) में शामिल दवाओं की कीमतें निर्धारित नियमों के अनुसार नियंत्रित की जाती हैं।
दवाओं की कीमतों में सालाना बदलाव के नियम सभी दवाओं पर एक जैसे लागू नहीं होते। गैर-नियंत्रित दवाओं के मामले में भी लागू प्रावधानों के अनुसार खुदरा कीमत में एक वर्ष के भीतर 10 प्रतिशत से अधिक वृद्धि पर प्रतिबंध का नियम है। वहीं, मूल्य-नियंत्रित दवाओं के लिए अलग व्यवस्था लागू होती है।
यदि कोई कंपनी निर्धारित मूल्य सीमा का उल्लंघन करती है, तो उसके खिलाफ लागू कानून के तहत कार्रवाई और अतिरिक्त राशि की वसूली की जा सकती है।
वसूली के साथ मरीजों को राहत देना भी जरूरी
दवा कंपनियों से बकाया रकम की वसूली सरकारी राजस्व और मूल्य नियंत्रण व्यवस्था के पालन, दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। लेकिन इस प्रक्रिया का एक मानवीय पहलू भी है—दवा खरीदने वाला मरीज अक्सर कीमतों के नियमों और कानूनी प्रावधानों से अनजान रहता है।
ऐसे में प्रभावी निगरानी, समय पर वसूली, पारदर्शी शिकायत निवारण और उपभोक्ताओं के अधिकारों के बारे में जागरूकता जरूरी है। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है कि दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के नियम केवल कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि आम मरीजों को भी उनका वास्तविक लाभ मिले।












