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आर्थिक नीतियों में न्यायालय का दखल तभी, जब मौलिक अधिकारों का हनन हो: CJI बीआर गवई का बड़ा बयान

On: November 8, 2025
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आर्थिक नीतियों में न्यायालय का दखल तभी, जब मौलिक अधिकारों का हनन हो: CJI बीआर गवई
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नई दिल्ली, 08 नवंबर 2025 (शनिवार)। भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई ने शनिवार को देश की आर्थिक नीतियों और न्यायपालिका की भूमिका पर एक महत्वपूर्ण बयान दिया। उनका स्पष्ट कहना था—सुप्रीम कोर्ट आर्थिक नीतियों में तब तक दखल नहीं देता, जब तक उनसे नागरिकों के मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) का उल्लंघन न हो।

सीजेआइ ने यह टिप्पणी वाणिज्यिक न्यायालयों के स्थायी अंतरराष्ट्रीय मंच (PIFCC) की बैठक को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कहा कि आर्थिक मामले सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और न्यायालय का काम उन्हें चुनौती देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि संविधान की सीमाओं और न्याय के दायरे में उनका पालन हो।

“कानून के शासन का प्रहरी है न्यायपालिका”

जस्टिस गवई ने कहा,

“न्यायपालिका हमेशा कानून के शासन की संरक्षक रही है। सुप्रीम कोर्ट ने दशकों से यह सुनिश्चित किया है कि वह आर्थिक नीतियों में तब तक हस्तक्षेप न करे, जब तक उनमें संविधान या मौलिक अधिकारों का सीधा हनन न दिखाई दे।”

उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने कई मौकों पर कॉरपोरेट या वाणिज्यिक कानूनों की गलत व्याख्या और कानूनी ढांचे के दुरुपयोग के प्रयासों को सख्ती से खारिज किया है।

आर्थिक स्वतंत्रता और नियमन के बीच संतुलन

CJI गवई ने यह भी कहा कि अदालत ने आर्थिक स्वतंत्रता, नियामक अनुशासन और निष्पक्षता के बीच संतुलन कायम रखने की कोशिश की है। उन्होंने जोर देकर कहा कि राज्य की शक्तियों को संविधान की मर्यादाओं के भीतर रहकर ही काम करना चाहिए—खासकर कराधान (Taxation) और विनियमन (Regulation) जैसे मामलों में।

उनके अनुसार, किसी भी वाणिज्यिक कानून की व्याख्या करते समय विधायिका की मंशा, जनहित और न्याय के बीच सामंजस्य होना अनिवार्य है।

नियामक निकायों की भूमिका पर भी टिप्पणी

सीजेआइ ने वित्तीय और वाणिज्यिक नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ऐसे निकायों को वित्तीय स्थिरता और जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए पारदर्शी और उचित तरीके से काम करना चाहिए। उनके कदम न सिर्फ न्यायसंगत, बल्कि आनुपातिक (Proportional) भी होने चाहिए।

निष्कर्ष

प्रधान न्यायाधीश के इस बयान ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय न्यायपालिका लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की अपनी जिम्मेदारी को लेकर सजग है। आर्थिक नीतियों पर सरकार को मजबूत हाथ मिलता है, लेकिन संविधान के दायरे में। और जहां कहीं भी नागरिकों के मौलिक अधिकार प्रभावित होंगे, वहां न्यायपालिका पीछे नहीं हटेगी।

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