लखनऊ (21 Jan 2026)। लोकतंत्र केवल प्रक्रियाओं से नहीं, बल्कि सार्थक संवाद, जवाबदेही और जन-विश्वास से मजबूत होता है। इसी भाव को केंद्र में रखते हुए ओम बिरला ने कहा कि AI और तकनीक से बढ़ेगी विधायकों की कार्यक्षमता, जिससे लोकतांत्रिक संस्थाएं अधिक पारदर्शी, प्रभावी और जनता के करीब बन सकेंगी। यह विचार उन्होंने 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन के समापन सत्र में व्यक्त किया।
लोकसभा अध्यक्ष ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब समय आ गया है जब नवाचार, संवाद और प्रौद्योगिकी—खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)—को विधायी कामकाज का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए। इससे न केवल शोध-आधारित बहस को बल मिलेगा, बल्कि निर्णय प्रक्रिया भी अधिक तथ्यपरक और समयबद्ध होगी।
लोकतांत्रिक संस्थाओं को जनता से जोड़ने का समय
अपने संबोधन की शुरुआत में ओम बिरला ने सम्मेलन की मेजबानी के लिए उत्तर प्रदेश सरकार का आभार जताया और योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व की सराहना की। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश ने हाल के वर्षों में सुशासन, कानून-व्यवस्था, सामाजिक कल्याण और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों को और मजबूत करती है।
बिरला ने कहा कि पीठासीन अधिकारी सम्मेलनों का उद्देश्य केवल विचार-विमर्श तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि इन चर्चाओं से ठोस और सकारात्मक परिणाम निकलें, जिनका लाभ सीधे जनता तक पहुंचे।
‘विकसित भारत’ के लक्ष्य की ओर सकारात्मक चर्चा
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि सम्मेलन में सभी विधायी संस्थाओं ने यह संकल्प लिया है कि वे “विकसित भारत” की परिकल्पना को साकार करने के लिए निरंतर संवाद और सकारात्मक बहस को बढ़ावा देंगी। उन्होंने विशेष रूप से उत्तर प्रदेश विधानसभा का उल्लेख करते हुए बताया कि विजन-2047 जैसे दीर्घकालिक विषयों पर 36 घंटे तक चली चर्चा यह दर्शाती है कि सार्थक बहस से विकास की स्पष्ट दिशा तय की जा सकती है।
उनका कहना था कि राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन विकास और जनहित के मुद्दों पर संवाद निरंतर चलता रहना चाहिए।
AI और तकनीक से बढ़ेगी विधायकों की कार्यक्षमता
ओम बिरला ने जोर देकर कहा कि आज लगभग सभी राज्य विधानसभाएं पेपरलेस हो चुकी हैं। पुरानी बहसों, बजट दस्तावेजों और विधायी कार्यवाहियों का डिजिटलीकरण हो चुका है। इसका सीधा लाभ यह है कि विधायकों को किसी भी विषय पर ऐतिहासिक संदर्भ और तथ्य तुरंत उपलब्ध हो जाते हैं।
उन्होंने कहा कि AI आधारित टूल्स विधायकों की क्षमता बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं—
- शोध को आसान बनाना
- नीति-निर्माण में डेटा आधारित सहायता
- विधायी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता
इसी दिशा में विधानसभाओं में रिसर्च विंग का गठन भी किया गया है, ताकि बहसें भावनाओं से नहीं, बल्कि तथ्यों से संचालित हों।
बैठकों की घटती संख्या पर चिंता
लोकसभा अध्यक्ष ने विधायी बैठकों की घटती संख्या पर भी चिंता जताई। उन्होंने सुझाव दिया कि राज्य विधानमंडलों में कम से कम 30 दिन की बैठकें अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। उनका कहना था कि सदन वह मंच है, जहां समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज सरकार तक पहुंचती है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे जनता को न्यायपालिका पर भरोसा है, वैसे ही यदि विधायक सकारात्मक सोच के साथ सदन में अपनी भूमिका निभाएं, तो विधानसभाओं पर भी जनता का विश्वास और मजबूत होगा।
गतिरोध नहीं, संवाद लोकतंत्र की पहचान
सदनों में बार-बार होने वाले व्यवधान पर टिप्पणी करते हुए ओम बिरला ने कहा कि सदन का हर क्षण बहुमूल्य होता है। विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन उसका सही मंच सदन के भीतर तर्क और शब्दों के माध्यम से होना चाहिए, न कि गतिरोध के जरिए। इससे ही लोकतंत्र की गरिमा बनी रहती है।
‘लेजिसलेटिव इंडेक्स’ से स्वस्थ प्रतिस्पर्धा
लोकसभा अध्यक्ष ने लेजिसलेटिव इंडेक्स की अवधारणा पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि इससे विधानसभाओं की उत्पादकता, कार्यप्रणाली और प्रभावशीलता का आकलन संभव होगा। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा से नई प्रक्रियाएं और नवाचार सामने आएंगे, जिससे विधायी संस्थाएं और अधिक सक्षम बनेंगी।
यूपी—परिवर्तन और ऊर्जा की धरती
अपने संबोधन के अंत में ओम बिरला ने सम्मेलन के सफल आयोजन के लिए उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना सहित सभी आयोजकों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परिवर्तन की धरती है, जहां से मिली ऊर्जा को सभी प्रतिनिधि अपने-अपने राज्यों में लेकर जाएंगे।











