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इकोनॉमिक सर्वे 2026: कॉरपोरेट मुनाफा रिकॉर्ड पर, टैक्स में बढ़ा आम करदाताओं का योगदान

On: January 31, 2026
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इकोनॉमिक सर्वे 2026
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नई दिल्ली, 31 जनवरी 2026। इकोनॉमिक सर्वे 2026 ने भारतीय अर्थव्यवस्था की एक दिलचस्प—और कुछ हद तक असहज—तस्वीर सामने रखी है। तस्वीर यह कि एक ओर कॉरपोरेट इंडिया ने पिछले वर्षों में रिकॉर्ड मुनाफा कमाया, दूसरी ओर सरकारी खजाने में टैक्स के रूप में आम नागरिकों और गैर-कॉरपोरेट करदाताओं का योगदान तेज़ी से बढ़ा। सरल शब्दों में कहें तो मुनाफा कंपनियों का बढ़ा, लेकिन टैक्स की हिस्सेदारी में आम करदाता आगे निकल आया।

इस सर्वे के आँकड़े बताते हैं कि कर संरचना (tax structure) में एक स्पष्ट झुकाव आया है—प्रत्यक्ष करों की ओर, और उन प्रत्यक्ष करों में भी व्यक्तिगत आयकर की हिस्सेदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

प्रत्यक्ष करों की हिस्सेदारी 59% तक पहुँची

इकोनॉमिक सर्वे 2026 के अनुसार, कोविड से पहले कुल कर राजस्व में प्रत्यक्ष करों (Direct Taxes) की हिस्सेदारी लगभग 52% थी। वित्त वर्ष 2025 (FY25) में यह बढ़कर 59% हो गई। यह बदलाव केवल अनुपात का नहीं, बल्कि कर संग्रह की प्रकृति (nature of collection) का संकेत देता है।

कोविड से पहले व्यक्तिगत व गैर-कॉरपोरेट करों का औसत योगदान जीडीपी के लगभग 2.4% के बराबर था। कोविड के बाद यह बढ़कर 3.3% हुआ और FY25 में 3.7% के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया। इस अवधि में कर संग्रह की रफ्तार नाममात्र जीडीपी वृद्धि (Nominal GDP Growth) से भी तेज रही—अर्थशास्त्र की भाषा में इसे टैक्स बॉयेंसी (Tax Buoyancy) कहा जाता है।

कॉरपोरेट टैक्स बनाम व्यक्तिगत आयकर: अनुपात बदला

ताज़ा आँकड़ों के अनुसार:

  • व्यक्तिगत आयकर की हिस्सेदारी कुल कर राजस्व में 31.8% तक पहुँच गई
  • कॉरपोरेट टैक्स की हिस्सेदारी लगभग 25% के आसपास स्थिर रही

FY22 में व्यक्तिगत आयकर की हिस्सेदारी 24.7% थी, जो तीन वर्षों में तेज़ी से बढ़ी है। इसके उलट, कॉरपोरेट टैक्स संग्रह राशि बढ़ने के बावजूद उसकी प्रतिशत हिस्सेदारी में बड़ा बदलाव नहीं दिखता। यानी कंपनियाँ अधिक कमा रही हैं, टैक्स भी अधिक दे रही हैं, पर कुल टैक्स ढांचे में उनकी भागीदारी का अनुपात लगभग वहीं है।

करदाताओं की संख्या में रिकॉर्ड उछाल: 6.9 करोड़ से 9.2 करोड़

FY22 में 6.9 करोड़ लोगों ने आयकर रिटर्न दाखिल किया था। FY25 में यह संख्या बढ़कर 9.2 करोड़ हो गई—यह अपने आप में कर आधार (tax base) के विस्तार की बड़ी कहानी है।

इसके पीछे सर्वे तीन प्रमुख कारण बताता है:

  1. आय में बढ़ोतरी, जिससे अधिक लोग कर दायरे में आए
  2. तकनीक का उपयोग—डेटा मिलान, ई-फाइलिंग, एनालिटिक्स—जिससे कर चोरी कम हुई
  3. छोटे-छोटे नज इंटरवेंशन (nudges) जैसे समय पर रिमाइंडर, अनुपालन को आसान बनाना

विदेशी संपत्तियों पर सख्ती: 29,000 करोड़ की घोषणा

आयकर विभाग के फॉरेन एसेट कैंपेन के तहत रिटर्न और अंतरराष्ट्रीय डेटा का मिलान किया गया। जिन मामलों में विदेशी संपत्ति का विवरण मेल नहीं खाया, उन्हें नोटिस जारी हुए।

  • 25,000 करदाताओं ने रिटर्न संशोधित किए
  • ₹29,000 करोड़ की विदेशी संपत्ति घोषित हुई
  • ₹1,000 करोड़ से अधिक विदेशी आय सामने आई

यह संकेत देता है कि डेटा-आधारित निगरानी (data-driven scrutiny) अब कर प्रशासन का स्थायी हिस्सा बन चुकी है।

गलत टैक्स दावों पर कार्रवाई: HRA और राजनीतिक चंदा

डेटा मिलान से गलत टैक्स छूट (deductions) के दावों की पहचान भी हुई—खासतौर पर HRA और राजनीतिक चंदे से जुड़े मामलों में।

  • 9,000 लोगों ने अपडेटेड रिटर्न भरे
  • ₹2,050 करोड़ की गलत कटौतियाँ रोकी गईं
  • ₹680 करोड़ अतिरिक्त टैक्स वसूला गया
  • केवल HRA मामलों में ₹119 करोड़ से अधिक की अतिरिक्त वसूली

यह दिखाता है कि अनुपालन (compliance) अब केवल स्वैच्छिक नहीं, बल्कि तकनीकी निगरानी से भी सुनिश्चित हो रहा है।

कॉरपोरेट मुनाफा 2.5 लाख करोड़ से 7.1 लाख करोड़

Reserve Bank of India के आँकड़ों के अनुसार, कॉरपोरेट मुनाफा:

  • FY21: ₹2.5 लाख करोड़
  • FY25: ₹7.1 लाख करोड़

यानी लगभग 184% की बढ़ोतरी। इस दौरान कॉरपोरेट टैक्स संग्रह भी 100% से अधिक बढ़ा, लेकिन कुल कर राजस्व में उसका अनुपात लगभग स्थिर रहा।

GST कलेक्शन भी मजबूत

अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच Goods and Services Tax (GST) संग्रह ₹17.4 लाख करोड़ रहा, जो सालाना आधार पर 6.7% अधिक है। यह संकेत देता है कि अप्रत्यक्ष कर मोर्चे पर भी राजस्व प्रवाह स्थिर और मजबूत बना हुआ है।

निष्कर्ष: कर ढांचे की बदलती कहानी

इकोनॉमिक सर्वे 2026 का संदेश सीधा है—भारत में कर आधार चौड़ा हुआ है, अनुपालन बेहतर हुआ है, और प्रत्यक्ष करों का महत्व बढ़ा है। लेकिन साथ ही यह प्रश्न भी उभरता है कि तेज़ी से बढ़ते कॉरपोरेट मुनाफे के दौर में कुल कर संरचना का भार किस अनुपात में किस पर पड़ रहा है।

यह बदलाव केवल आँकड़ों का नहीं, बल्कि कर दर्शन (tax philosophy) और प्रशासनिक क्षमता के विकास का संकेत है—जहाँ तकनीक, डेटा और व्यवहारिक नीतियाँ मिलकर कर संग्रह की तस्वीर बदल रही हैं।

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