निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी 2026 को पेश बजट में शहरीकरण को सिर्फ निर्माण-कार्य नहीं, बल्कि दीर्घकालिक परिवर्तन की प्रक्रिया के रूप में रखा। यह दृष्टि शहरों को भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता, लचीलेपन (resilience) और आर्थिक गति के केंद्र में रखती है। फोकस तीन स्तंभों पर है—मानव पूंजी, अवसंरचना, और गतिशीलता—ताकि शहरी बदलाव एकमुश्त परियोजनाओं से आगे बढ़कर निरंतर सुधार और परिणामों की दिशा में जाए।
इस बार संकेत साफ हैं: महानगर-केंद्रित सोच से हटकर टियर-1 और टियर-2 शहरों, क्षेत्रीय संतुलन और संस्थागत सुदृढ़ीकरण की ओर निर्णायक कदम।
महानगरों से आगे: टियर-1/टियर-2 और क्षेत्रीय ढांचा
बजट का संदेश है कि शहरीकरण अब कुछ बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहेगा। नगर आर्थिक क्षेत्र (CER) जैसी अवधारणाओं के जरिए शहरों को उनके आसपास के कस्बों और उपनगरों के साथ क्षेत्रीय इकाई के रूप में देखने का प्रयास है। यह बदलाव “प्रोजेक्ट-आधारित” मॉडल से “सिस्टम-आधारित” मॉडल की ओर संकेत करता है।
- टियर-1/टियर-2 शहरों में बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी पर जोर
- क्षेत्रीय योजना (regional planning) का पुनरुत्थान
- शहरों के बीच आर्थिक और परिवहन समन्वय
यह दृष्टिकोण संतुलित शहरी वृद्धि का रास्ता खोलता है, जहां अवसर केवल महानगरों तक सीमित न रहें।
पहचान, विरासत और अनुभव-आधारित अर्थव्यवस्था
बजट में प्रमुख मंदिर शहरों, पर्यटन सर्किटों, विरासत संपत्तियों और पुरातात्विक स्थलों को आर्थिक परिसंपत्ति के रूप में देखने की सोच उभरकर आती है। साथ ही, पारिस्थितिक बहाली (eco-restoration) को शहरी अर्थव्यवस्था से जोड़ने की बात भी महत्वपूर्ण है।
- स्थान-आधारित पहचान (place identity) को बढ़ावा
- अनुभव-संचालित अर्थव्यवस्था (experience economy) से स्थानीय रोजगार
- पर्यटन, संस्कृति और पर्यावरण का समेकन
इससे शहर सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि आर्थिक और सांस्कृतिक केंद्र बनते हैं।
संस्थागत सुदृढ़ीकरण: असली गेम-चेंजर
बजट का शहरी एजेंडा यह मानता है कि केवल सड़क, पुल, मेट्रो बना देने से परिणाम स्थायी नहीं होते। असली फर्क संस्थाओं से पड़ता है—शासन, वित्तपोषण, योजना और क्रियान्वयन की क्षमता से।
- नगर निकायों की क्षमता निर्माण
- वित्तीय मॉडल और राजस्व सुदृढ़ीकरण
- वर्ष-दर-वर्ष मापने योग्य परिणामों पर जोर
यानी शहरी एजेंडा अब “कंस्ट्रक्शन” नहीं, बल्कि गवर्नेंस + फाइनेंस + प्लानिंग का सम्मिलित ढांचा है।
मानव पूंजी, अवसंरचना और गतिशीलता
रणनीति का त्रिकोण स्पष्ट है:
मानव पूंजी (कौशल, सेवाएं) + अवसंरचना (जल, परिवहन, आवास) + गतिशीलता (लास्ट-माइल कनेक्टिविटी, मल्टी-मोडल ट्रांजिट)।
यह संयोजन शहरों को रहने योग्य (livable), काम करने योग्य (workable) और निवेश योग्य (investable) बनाता है।
आगे की चुनौती
दृष्टि व्यापक है, लेकिन सफलता इस पर निर्भर करेगी कि:
- उभरते नगरों को नियोजन ढांचे में कितनी जगह मिलती है
- आवास और शहरी सेवाओं को संस्थागत समर्थन कितना मिलता है
- क्षेत्रीय योजनाएं जमीन पर कितनी तेजी से उतरती हैं
निष्कर्ष
शहरी विकास बजट 2026 शहरों को भारत की विकास कहानी के अग्रभाग में रखता है। यह बदलाव परियोजनाओं से प्रणालियों की ओर, महानगरों से क्षेत्रों की ओर, और निर्माण से शासन की ओर है। अगर संस्थागत सुधार और क्षेत्रीय योजना साथ चलते हैं, तो यह रणनीति आने वाले वर्षों में भारत के शहरी नक्शे को नई दिशा दे सकती है।











