यरूशलम, 09 फरवरी 2026। वेस्ट बैंक एक बार फिर वैश्विक कूटनीति के केंद्र में है। इस्राइल की सुरक्षा कैबिनेट ने ऐसे फैसलों को मंजूरी दी है, जिनका मकसद वेस्ट बैंक में प्रशासनिक पकड़ मजबूत करना और फलस्तीनी प्राधिकरण (Palestinian Authority) की सीमित होती भूमिका को और संकुचित करना बताया जा रहा है। वित्त मंत्री बेज़लेल स्मोट्रिच की अगुवाई में लिए गए इन निर्णयों में जमीन के लेन-देन, रिकॉर्ड की पारदर्शिता और संवेदनशील इलाकों में निर्माण पर प्रत्यक्ष इस्राइली निगरानी बढ़ाने जैसे कदम शामिल हैं।
कैबिनेट के इस रुख को सरकार के भीतर उन धड़ों की जीत माना जा रहा है, जो लंबे समय से “फलस्तीनी राज्य” की अवधारणा को अव्यावहारिक बताते रहे हैं। यही वजह है कि इन फैसलों के राजनीतिक अर्थ सिर्फ प्रशासनिक बदलाव तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे वेस्ट बैंक के भविष्य की दिशा तय करने वाले संकेत भी दे रहे हैं।
फलस्तीनी नेतृत्व और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के विरुद्ध और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जोखिमपूर्ण बताया है। इस्राइल की शांति समर्थक संस्था ‘पीस नाउ’ से जुड़े शोधकर्ताओं का कहना है कि यह कदम कागज पर भले प्रशासनिक लगे, लेकिन जमीन पर इसके प्रभाव दूरगामी होंगे। हालांकि, इन निर्णयों को लागू करने के लिए वेस्ट बैंक में इस्राइल के शीर्ष सैन्य कमांडर की मंजूरी आवश्यक बताई गई है।
फैसले के मुख्य बिंदु: जमीन, रिकॉर्ड और निर्माण पर नियंत्रण
- वेस्ट बैंक में यहूदी नागरिकों के लिए फलस्तीनी जमीन खरीदने पर लगी रोक हटाने की पहल।
- जमीन के रिकॉर्ड को सार्वजनिक कर बसावट (settlements) प्रक्रियाओं को आसान बनाना।
- हिब्रोन जैसे संवेदनशील धार्मिक क्षेत्रों में निर्माण अनुमति का अधिकार इस्राइली अधिकारियों को देना।
- पर्यावरण और पुरातात्विक मामलों के नाम पर फलस्तीनी क्षेत्रों में इस्राइली दखल की गुंजाइश बढ़ाना।
- एक विशेष कमिटी को सक्रिय करना, जो इस्राइल को “प्रोएक्टिव” तरीके से जमीन खरीदने की अनुमति दे सके।
इन बिंदुओं को जोड़कर देखें तो तस्वीर साफ होती है—वेस्ट बैंक में प्रशासनिक और कानूनी नियंत्रण के नए औज़ार तैयार किए जा रहे हैं।
फलस्तीनी प्रतिक्रिया: “कानूनी जामा पहनाने की कोशिश”
फलस्तीन के राष्ट्रपति Mahmoud Abbas ने इन फैसलों को “खतरनाक” बताते हुए कहा कि यह बसावटों को वैध ठहराने का सुनियोजित प्रयास है। उन्होंने United Nations Security Council और अमेरिका से हस्तक्षेप की अपील की।
जॉर्डन के विदेश मंत्रालय ने भी कड़ी आपत्ति दर्ज करते हुए कहा कि यह कदम क्षेत्र में “अवैध अधिकार” थोपने जैसा है।
वेस्ट बैंक का जमीनी गणित, जो विवाद की जड़ है
वेस्ट बैंक का लगभग 40% हिस्सा फलस्तीनी प्रशासन के अधीन माना जाता है, जबकि शेष क्षेत्र पर इस्राइली नियंत्रण है (ओस्लो समझौतों के बाद बने एरिया A, B, C के ढांचे के तहत)। निजी स्तर पर फलस्तीनियों के लिए यहूदी नागरिकों को जमीन बेचने पर प्रतिबंध रहा है।
वेस्ट बैंक और पूर्वी यरूशलम में 7 लाख से अधिक यहूदी निवासी बसावटों में रह रहे हैं। यह इलाका 1967 के युद्ध के बाद इस्राइल के नियंत्रण में आया था। फलस्तीनी इसे अपने भावी राज्य की भूमि मानते हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की व्यापक राय बसावटों को अंतरराष्ट्रीय कानून के विरुद्ध मानती रही है।
राजनीतिक संकेत: प्रशासनिक बदलाव या दीर्घकालिक रणनीति?
इन फैसलों को सिर्फ नौकरशाही सुधार कहना मुश्किल है। विश्लेषकों के अनुसार, जमीन के रिकॉर्ड सार्वजनिक करना और खरीद प्रक्रियाओं को संस्थागत रूप देना, भविष्य में बसावट विस्तार को कानूनी जटिलताओं से बचाने की तैयारी हो सकती है।
यानी, वेस्ट बैंक में “तथ्यों को जमीन पर बदलने” की रणनीति—जहां कागज़ी प्रक्रियाएं वास्तविक भूगोल को प्रभावित करती हैं।
शांति वार्ताओं के ठहरे हुए माहौल में यह कदम दोनों पक्षों के बीच अविश्वास को और गहरा कर सकता है। यही वजह है कि यह मुद्दा स्थानीय प्रशासनिक दायरे से निकलकर वैश्विक कूटनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है।












