तेहरान, 09 फरवरी 2026। पश्चिम एशिया में बढ़ती सैन्य हलचल के बीच ईरान ने सख्त लहजे में संदेश दिया है कि “सेना की तैनाती” उसे झुका नहीं सकती। परमाणु वार्ताओं के नए दौर की पृष्ठभूमि में ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने कहा कि तेहरान यूरेनियम संवर्धन (uranium enrichment) रोकने वाला नहीं है और अमेरिका की नीयत पर उसे बेहद कम भरोसा है।
यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिकी नौसेना का शक्तिशाली विमानवाहक पोत USS Abraham Lincoln क्षेत्र में तैनात किया गया है। अराघची ने साफ शब्दों में कहा, “सैन्य मौजूदगी हमें डराती नहीं। हमारी संप्रभुता किसी दबाव में तय नहीं होगी।”
ईरान का संदेश: बातचीत हाँ, दबाव नहीं
अराघची ने सवाल उठाया कि क्या वॉशिंगटन वास्तव में बातचीत को गंभीरता से ले रहा है। उनके मुताबिक, ईरान इस दौर की वार्ताओं पर अपने रणनीतिक साझेदार China और Russia से भी परामर्श कर रहा है।
पश्चिमी देशों और Israel के आरोपों—कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करना चाहता है—को उन्होंने खारिज किया। अराघची ने कहा, “वे हमारे परमाणु बम से डरते हैं, जबकि हम परमाणु बम की तलाश में नहीं हैं। हमारा असली ‘परमाणु बम’ महाशक्तियों को ‘ना’ कहने की क्षमता है।”
क्या है विवाद का केंद्र?
- अमेरिका और इस्राइल चाहते हैं कि वार्ता में ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय सशस्त्र समूहों को समर्थन जैसे मुद्दे शामिल हों।
- ईरान इन विषयों को “गैर-परमाणु” बताते हुए बातचीत के दायरे से बाहर रखता है।
- यूरेनियम संवर्धन को तेहरान रणनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि संप्रभु अधिकार बताता है।
अराघची के शब्दों में, “भले ही हम पर युद्ध थोपा जाए, किसी को हमें अधिकार देने का हक नहीं है।”
इस्राइली प्रतिक्रिया और क्षेत्रीय सियासत
ईरान के बयानों के बीच इस्राइल के विदेश मंत्री Gideon Sa’ar ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को “विश्व शांति के लिए खतरा” बताया है। इससे साफ है कि वार्ता की मेज पर मौजूद मुद्दों से कहीं अधिक, उसके बाहर की रणनीतिक खींचतान भी माहौल को प्रभावित कर रही है।
संकेत क्या हैं?
विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिकी युद्धपोत की तैनाती एक रणनीतिक संदेश है—निरोध (deterrence) का। वहीं, ईरान का सार्वजनिक रुख घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों श्रोताओं के लिए है—कि तेहरान दबाव की राजनीति को स्वीकार नहीं करेगा।
यानी, बातचीत की मेज सजी है, लेकिन उसके आसपास शक्ति-प्रदर्शन की परछाइयाँ भी मौजूद हैं।
राजनय (diplomacy) और सैन्य संकेतों (military signaling) के इस मिश्रण में यह देखना अहम होगा कि क्या दोनों पक्ष भरोसे की उस न्यूनतम जमीन तक पहुँच पाते हैं, जहाँ से वास्तविक समझौते की राह निकले।












