नई दिल्ली, 12 फरवरी 2026। देश में लंबे समय से बहस का विषय बने ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ प्रस्ताव को लेकर अब न्यायिक दृष्टिकोण भी स्पष्ट होने लगा है। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने संसद की संयुक्त समिति (JPC) के समक्ष कहा कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराना संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) का उल्लंघन नहीं करता।
उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब इस प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक हलकों में तीखी बहस जारी है। आलोचकों का तर्क है कि इससे संघीय ढांचा (Federal Structure) और लोकतांत्रिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। लेकिन गवई का मानना है कि प्रस्तावित बदलाव केवल चुनाव की टाइमिंग से जुड़ा है, न कि लोकतंत्र की आत्मा से।
🔎 क्या कहा पूर्व CJI ने?
पूर्व मुख्य न्यायाधीश गवई ने समिति के सामने चार प्रमुख तर्क रखे:
- सिर्फ समय-निर्धारण में बदलाव:
प्रस्ताव चुनाव कराने के समय और समन्वय में परिवर्तन करता है। चुनाव की मूल प्रक्रिया, मतदाता अधिकार और प्रतिनिधित्व प्रणाली जस की तस रहेगी। - संविधान संशोधन का अधिकार:
संसद को संविधान में संशोधन करने का अधिकार है, बशर्ते वह मूल ढांचे को प्रभावित न करे। उनके अनुसार, यह प्रस्ताव संघीय ढांचे या लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं करता। - जवाबदेही बनी रहेगी:
अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) और अन्य संवैधानिक प्रावधान पहले की तरह प्रभावी रहेंगे। यानी सरकार की जवाबदेही में कोई कमी नहीं आएगी। - ऐतिहासिक संदर्भ:
उन्होंने याद दिलाया कि 1967 तक भारत में लोकसभा और राज्यों के चुनाव साथ-साथ ही होते थे। इसलिए यह कोई बिल्कुल नया प्रयोग नहीं, बल्कि पुरानी व्यवस्था की पुनर्स्थापना है।
📜 किन विधेयकों पर चल रही है चर्चा?
संसदीय समिति दो अहम विधेयकों पर विचार कर रही है:
- संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024
- केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024
इन विधेयकों का उद्देश्य कुछ राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल को घटाकर या समायोजित कर भविष्य में सभी चुनावों को एक साथ कराना है।
⚖️ विधि आयोग का भी समर्थन
पूर्व CJI के अलावा 23वें विधि आयोग ने भी हाल में राय दी है कि ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ प्रस्ताव संविधान के मूल ढांचे, संघीय व्यवस्था और मतदाता अधिकारों के खिलाफ नहीं है। इससे केंद्र सरकार के चुनाव सुधार एजेंडे को संस्थागत समर्थन मिला है।
हालांकि, विपक्षी दलों और कुछ संवैधानिक विशेषज्ञों का मत अब भी अलग है। उनका कहना है कि बार-बार चुनाव लोकतंत्र की ऊर्जा हैं और क्षेत्रीय मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श में जगह दिलाते हैं।
🏛️ बहस अभी जारी है
‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ का मुद्दा केवल प्रशासनिक सुविधा का प्रश्न नहीं, बल्कि लोकतंत्र की संरचना से जुड़ा विमर्श है। एक तरफ तर्क है कि इससे चुनावी खर्च कम होगा, नीतिगत स्थिरता आएगी और आचार संहिता के कारण विकास कार्यों में रुकावट कम होगी। दूसरी ओर आशंका है कि इससे राज्यों की स्वायत्तता पर असर पड़ सकता है।
पूर्व CJI बी.आर. गवई के बयान ने इस बहस को नया आयाम दिया है। अब निगाहें संसद और संसदीय समिति की सिफारिशों पर टिकी हैं, जो इस प्रस्ताव की संवैधानिक दिशा तय करेंगी।











