नई दिल्ली (Mon, 04 May 2026)। जालुकबाड़ी में हिमंत बिस्वा सरमा की जीत ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि असम की इस हाई-प्रोफाइल सीट पर उनका वर्चस्व आज भी अटूट है। हिमंत बिस्वा सरमा ने लगातार छठी बार इस सीट से जीत दर्ज करते हुए कांग्रेस उम्मीदवार बिदिशा नियोग को 89,434 वोटों के बड़े अंतर से पराजित किया।
चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, सरमा को कुल 1,27,151 वोट मिले, जबकि बिदिशा नियोग महज 37,717 वोटों तक ही सीमित रहीं। यह अंतर न सिर्फ जीत, बल्कि एकतरफा जनादेश की कहानी कहता है।
हर राउंड में बढ़त, विपक्ष पूरी तरह पिछड़ा
मतगणना के दौरान शुरुआत से ही तस्वीर साफ हो गई थी। हर राउंड के साथ हिमंत बिस्वा सरमा की बढ़त मजबूत होती गई, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार लगातार पीछे छूटती चली गईं। यह मुकाबला भले ही कागज़ों पर कड़ा दिख रहा था, लेकिन ज़मीनी हकीकत में सरमा का किला अभेद्य साबित हुआ।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, जालुकबाड़ी में यह परिणाम केवल एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का लगातार नवीनीकरण है।
25 साल का अटूट सफर, बना राजनीतिक किला
जालुकबाड़ी सीट को लंबे समय से सरमा का राजनीतिक गढ़ माना जाता है। वह साल 2001 से लगातार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। खास बात यह है कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत कांग्रेस के साथ की और 2001, 2006 तथा 2011 में इसी पार्टी के टिकट पर जीत दर्ज की। बाद में भारतीय जनता पार्टी से जुड़ने के बाद 2016, 2021 और अब 2026 में भी उन्होंने जीत का सिलसिला जारी रखा।
यह निरंतरता भारतीय राजनीति में कम ही देखने को मिलती है, जहां नेता पार्टी बदलने के बावजूद अपनी जनाधार (mass base) को मजबूत बनाए रखते हैं।
82% से ज्यादा मतदान, जनता ने खुलकर किया समर्थन
इस बार असम की 126 विधानसभा सीटों पर 9 अप्रैल को एक ही चरण में मतदान हुआ था। जालुकबाड़ी में 82.04% मतदान दर्ज किया गया, जो दर्शाता है कि जनता ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
राज्य में भाजपा के नेतृत्व वाले NDA गठबंधन को लेकर एग्जिट पोल पहले ही संकेत दे चुके थे कि सरकार की वापसी संभव है, और अब जमीनी नतीजों ने इन अनुमानों को सही साबित कर दिया है।
2021 की तरह इस बार भी ऐतिहासिक अंतर
अगर पिछले चुनावों पर नजर डालें, तो 2021 में भी हिमंत बिस्वा सरमा ने भारी बहुमत से जीत हासिल की थी। तब उन्हें 77.39% वोट (1,30,762 वोट) मिले थे और उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार रोमेन चंद्र बोरठाकुर को 1,01,911 वोटों के अंतर से हराया था।
इस बार भले ही अंतर थोड़ा कम हुआ हो, लेकिन जीत की मजबूती में कोई कमी नहीं दिखी। यह लगातार छठी जीत उनके राजनीतिक कद और संगठनात्मक पकड़ को और मजबूत करती है।
आगे की राजनीति पर क्या असर?
जालुकबाड़ी में हिमंत बिस्वा सरमा की जीत केवल एक सीट तक सीमित नहीं है। यह असम की राजनीति में भाजपा की पकड़ और नेतृत्व की स्वीकार्यता का संकेत है। आने वाले समय में यह जीत राज्य की नीतियों और राजनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित कर सकती है।
जहां एक तरफ भाजपा इसे अपनी स्थिरता और विकास मॉडल की जीत बता रही है, वहीं कांग्रेस के लिए यह परिणाम आत्ममंथन का संकेत देता है।
यह साफ है कि जालुकबाड़ी अब केवल एक विधानसभा सीट नहीं रही, बल्कि यह एक ऐसे नेता की पहचान बन चुकी है, जिसने दो दशकों से अधिक समय तक जनता का भरोसा लगातार कायम रखा है।










