नई दिल्ली|01 जून 2026: भारत और म्यांमार के संबंधों में सोमवार को एक महत्वपूर्ण मोड़ तब देखने को मिला, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और म्यांमार के राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग के बीच नई दिल्ली में उच्चस्तरीय द्विपक्षीय वार्ता हुई। इस बैठक का सबसे अहम पहलू सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता रहा, जहां म्यांमार के राष्ट्रपति ने स्पष्ट शब्दों में आश्वासन दिया कि उनके देश की धरती का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किसी भी गतिविधि के लिए नहीं होने दिया जाएगा।
भारत के लिए यह आश्वासन इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पूर्वोत्तर राज्यों से लगी करीब 1,640 किलोमीटर लंबी भारत-म्यांमार सीमा लंबे समय से सुरक्षा चुनौतियों और अवैध गतिविधियों के कारण संवेदनशील बनी हुई है। इसके साथ ही म्यांमार में बढ़ता चीनी प्रभाव भी नई दिल्ली की रणनीतिक चिंताओं का हिस्सा रहा है।
सीमा सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग पर जोर
प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग के बीच हुई बातचीत में रक्षा सहयोग, सीमा प्रबंधन, व्यापार, निवेश, विकास परियोजनाओं और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत बनाने पर विस्तार से चर्चा हुई। दोनों नेताओं ने लंबित द्विपक्षीय समझौतों और सहयोग से जुड़े प्रस्तावों को जल्द अंतिम रूप देने की इच्छा भी जताई।
बैठक के दौरान दोनों देशों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि एक-दूसरे की सुरक्षा चिंताओं का सम्मान करते हुए सीमावर्ती क्षेत्रों का किसी भी प्रकार के असामाजिक या राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा। यह संदेश ऐसे समय में आया है जब म्यांमार की आंतरिक परिस्थितियां अभी भी पूरी तरह स्थिर नहीं मानी जा रही हैं।
चुनाव जीतने के बाद भारत पहुंचे राष्ट्रपति ह्लाइंग
म्यांमार में अप्रैल 2026 में हुए चुनावों में मिन आंग ह्लाइंग को भारी बहुमत से विजयी घोषित किया गया था। इससे पहले वे कार्यवाहक राष्ट्रपति की भूमिका निभा रहे थे। हालांकि चुनावों के बावजूद देश की राजनीतिक और सुरक्षा स्थिति पूरी तरह सामान्य होती नहीं दिख रही है।
म्यांमार में एक ओर सेना समर्थित शासन है तो दूसरी ओर लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग करने वाले संगठन और सशस्त्र विद्रोही समूह सक्रिय हैं। चिन ब्रदरहुड और आराकान आर्मी जैसे संगठनों का प्रभाव कई क्षेत्रों में बना हुआ है। विशेष रूप से रखाइन प्रांत के कई हिस्सों में सरकारी नियंत्रण कमजोर बताया जाता है।
ऐसे माहौल में राष्ट्रपति ह्लाइंग का चुनाव जीतने के बाद भारत को अपने शुरुआती विदेशी दौरों में शामिल करना क्षेत्रीय राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम भारत के साथ विश्वास बढ़ाने और संतुलित विदेश नीति का संकेत देने की कोशिश भी है।
म्यांमार की संप्रभुता का सम्मान करेगा भारत
बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोहराया कि भारत म्यांमार की संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता का पूरा सम्मान करता है। यह संदेश ऐसे समय में आया है जब म्यांमार वैश्विक स्तर पर विभिन्न राजनीतिक दबावों और आंतरिक चुनौतियों का सामना कर रहा है।
राष्ट्रपति ह्लाइंग भारत दौरे पर अपने पांच वरिष्ठ मंत्रियों और एक बड़े व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल के साथ पहुंचे हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि दोनों देश केवल राजनीतिक ही नहीं बल्कि आर्थिक संबंधों को भी नई गति देना चाहते हैं।
रुपया-क्यात व्यवस्था से बढ़ेगा व्यापार
बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में बताया गया कि भारत और म्यांमार स्थानीय मुद्रा आधारित व्यापार व्यवस्था यानी रुपया-क्यात सेटलमेंट मैकेनिज्म को आगे बढ़ाने पर सहमत हुए हैं। इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापारिक लेनदेन को अधिक सरल और प्रभावी बनाना है।
वर्तमान में भारत और म्यांमार के बीच लगभग दो अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार होता है। दोनों देशों ने कृषि प्रसंस्करण, ऊर्जा, पेट्रोलियम, खनन और निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता भी जताई है। इन परियोजनाओं को दोनों देशों के कानूनों और नियामक ढांचे के अनुसार आगे बढ़ाया जाएगा।
लोकतंत्र बहाली और आंग सान सू ची का मुद्दा भी उठा
विदेश सचिव विक्रम मिसरी के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी ने बातचीत के दौरान म्यांमार की आंतरिक शांति प्रक्रिया और समावेशी राजनीतिक व्यवस्था की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की शीघ्र बहाली की भारत की पुरानी प्रतिबद्धता दोहराई।
सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी ने म्यांमार की पूर्व नेता आंग सान सू ची का मुद्दा भी उठाया। सू ची को फरवरी 2021 में सेना द्वारा सत्ता से हटाए जाने के बाद गिरफ्तार कर लिया गया था और बाद में विभिन्न मामलों में सजा सुनाई गई थी। फिलहाल उन्हें जेल से निकालकर घर में नजरबंद रखा गया है।
भारत लगातार यह मानता रहा है कि म्यांमार में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली और राजनीतिक संवाद ही स्थायी शांति और स्थिरता का रास्ता है।
भारत और म्यांमार के बीच हुई यह बैठक केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरे दक्षिण और दक्षि











