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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: लंबित आपराधिक मुकदमे के आधार पर चरित्र प्रमाणपत्र से इनकार नहीं किया जा सकता

On: August 5, 2026
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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: लंबित आपराधिक मुकदमे के आधार पर चरित्र प्रमाणपत्र से इनकार नहीं किया जा सकता
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प्रयागराज (05 अगस्त 2026)। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा लंबित होने के आधार पर उसका चरित्र प्रमाणपत्र (Character Certificate) जारी करने या उसका नवीनीकरण करने से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि जब तक सक्षम न्यायालय किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं करता, तब तक लंबित मुकदमे को उसके चरित्र पर प्रतिकूल टिप्पणी का आधार नहीं बनाया जा सकता।

यह टिप्पणी करते हुए न्यायालय ने जालौन निवासी एक याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया और जिला प्रशासन के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके जरिए लंबित आपराधिक मामले का हवाला देकर चरित्र प्रमाणपत्र के नवीनीकरण से इनकार किया गया था।

हाईकोर्ट ने डीएम का आदेश किया रद्द

यह फैसला न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने जालौन निवासी भरत लाल गुप्ता की याचिका स्वीकार करते हुए संबंधित जिलाधिकारी (डीएम) के आदेश को रद्द कर दिया।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि निर्धारित प्रारूप के अनुसार तीन सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता का चरित्र प्रमाणपत्र जारी किया जाए।

2018 के मुकदमे के आधार पर खारिज हुआ था आवेदन

मामले के अनुसार, भरत लाल गुप्ता ने अपने चरित्र प्रमाणपत्र के नवीनीकरण के लिए आवेदन किया था। हालांकि, 1 नवंबर 2021 को जिलाधिकारी ने उनका आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उनके खिलाफ वर्ष 2018 में मारपीट और गाली-गलौज से संबंधित एक आपराधिक मुकदमा लंबित है।

याचिकाकर्ता ने इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘अवतार सिंह’ मामले में दिए गए निर्णय का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि यदि किसी अभ्यर्थी ने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले की जानकारी ईमानदारी से दी है और कोई तथ्य नहीं छिपाया है, तो सक्षम प्राधिकारी को केवल मुकदमे के लंबित होने के आधार पर आवेदन अस्वीकार नहीं करना चाहिए।

कोर्ट के अनुसार, ऐसे मामलों में संबंधित प्राधिकारी को आरोपों की प्रकृति, मामले की गंभीरता और उससे जुड़े अन्य तथ्यों का समुचित मूल्यांकन करने के बाद ही निर्णय लेना चाहिए।

दोषसिद्धि से पहले नहीं माना जा सकता चरित्र पर दाग

खंडपीठ ने अपने आदेश में दोहराया कि भारतीय न्याय व्यवस्था में किसी भी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता, जब तक सक्षम न्यायालय उसे दोषसिद्ध घोषित न कर दे। ऐसे में केवल लंबित मुकदमे को आधार बनाकर किसी नागरिक के चरित्र पर प्रतिकूल टिप्पणी करना या उसे चरित्र प्रमाणपत्र से वंचित करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

यह फैसला उन मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां सरकारी सेवाओं, लाइसेंस या अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं में चरित्र प्रमाणपत्र की आवश्यकता होती है।

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