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इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: सक्षम पति बेरोजगारी का बहाना बनाकर पत्नी के भरण-पोषण से नहीं बच सकता

On: October 3, 2026
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इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला, सक्षम पति बेरोजगारी का बहाना बनाकर
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प्रयागराज, 3 अक्टूबर 2026। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी के भरण-पोषण से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि शारीरिक रूप से स्वस्थ और काम करने में सक्षम पति केवल बेरोजगार होने का हवाला देकर पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता। अदालत ने कासगंज परिवार न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पत्नी को आवेदन दाखिल करने की तारीख से 3,500 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।

यह मामला न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की एकल पीठ के समक्ष आया था। न्यायमूर्ति उपाध्याय ने जनवरी 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभाला था।

भरण-पोषण पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

मामले में पति की ओर से दलील दी गई थी कि पत्नी अपनी इच्छा से मायके में रह रही है। पति ने यह भी कहा कि वह बेरोजगार है और उसकी कोई स्थायी आय नहीं है। उसके मुताबिक, वह निर्धारित राशि का भुगतान करने की आर्थिक स्थिति में नहीं है।

अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने माना कि यदि पति शारीरिक रूप से सक्षम है और काम करके आय अर्जित कर सकता है तो केवल बेरोजगारी का हवाला देकर वह अपनी वैवाहिक जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।

भरण-पोषण की व्यवस्था का उद्देश्य ऐसी पत्नी को आर्थिक सहारा उपलब्ध कराना है, जो स्वयं अपना जीवनयापन करने की स्थिति में नहीं है। अदालत ने इसी आधार पर परिवार न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

पत्नी की स्वतंत्र आय नहीं थी

मामले के रिकॉर्ड के आधार पर अदालत के सामने यह तथ्य आया कि पत्नी की अपनी कोई स्वतंत्र आय नहीं थी। उसे दहेज की मांग पूरी नहीं होने के कारण वैवाहिक घर से निकाले जाने की बात भी रिकॉर्ड में सामने आई।

ऐसी परिस्थितियों में अदालत ने पति पर पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी को लागू माना। यानी पति की यह दलील कि उसके पास नौकरी नहीं है, अपने आप में भरण-पोषण से बचने का आधार नहीं बन सकती।

कासगंज परिवार न्यायालय का आदेश बरकरार

कासगंज परिवार न्यायालय ने पत्नी के आवेदन पर उसे 3,500 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। यह राशि आवेदन की तारीख से देय थी।

पति ने परिवार न्यायालय के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। पुनरीक्षण याचिका में उसने अपनी बेरोजगारी और सीमित आर्थिक स्थिति का हवाला दिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा।

भरण-पोषण के मामलों में अदालतें केवल यह नहीं देखतीं कि पति के पास इस समय नौकरी है या नहीं, बल्कि उसकी कमाने की क्षमता और मामले की समग्र परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व निर्णयों में भी सक्षम व्यक्ति की संभावित आय को भरण-पोषण तय करने के संदर्भ में देखा गया है।

बेरोजगारी और कमाने की क्षमता में अंतर

अदालत की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बेरोजगार होना और कमाने में असमर्थ होना एक ही बात नहीं है। यदि कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से सक्षम है और रोजगार या काम करके आय अर्जित कर सकता है, तो केवल यह कहना कि उसके पास फिलहाल नौकरी नहीं है, भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बचने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

हालांकि, प्रत्येक मामले में भरण-पोषण की राशि और पति की जिम्मेदारी तथ्यों तथा संबंधित पक्षों की आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर तय होती है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर न्यायिक आदेशों और फैसलों का रिकॉर्ड उपलब्ध है।

पत्नी को आर्थिक रूप से बेसहारा छोड़ना उद्देश्य नहीं

अदालत की टिप्पणी का मूल केंद्र यही है कि वैवाहिक संबंध में ऐसी पत्नी, जिसकी अपनी आय नहीं है और जो परिस्थितियों के कारण पति से अलग रह रही है, उसे जीवनयापन के लिए पूरी तरह असहाय नहीं छोड़ा जा सकता।

इस मामले में हाईकोर्ट ने कासगंज परिवार न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए 3,500 रुपये मासिक भरण-पोषण का निर्देश कायम रखा। फैसले से यह संदेश भी स्पष्ट होता है कि काम करने में सक्षम पति अपनी जिम्मेदारी से केवल बेरोजगारी का हवाला देकर बचने की कोशिश नहीं कर सकता।

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