लखनऊ/पौड़ी गढ़वाल, 7 फरवरी 2026। पहाड़ों की शांत सुबह, संकरी पगडंडियों पर हलचल, और गांव के आंगन में बच्चों की खिलखिलाहट—इसी आत्मीय माहौल के बीच पंचूर ने अपने सबसे प्रसिद्ध पुत्र का स्वागत किया। दो दिवसीय उत्तराखंड दौरे पर पहुंचे योगी आदित्यनाथ ने अपने पैतृक गांव में रात्रि विश्राम किया और शनिवार सुबह गांव भ्रमण के दौरान बच्चों को टॉफी-चॉकलेट देकर दुलारा। मुस्कराते हुए उन्होंने बच्चों से कहा—“हम भी तुम्हारे दादा हैं।” यह वाक्य गांव की गलियों में देर तक गूंजता रहा।
पहाड़, परिवार और अपनापन: पंचूर की सुबह
पंचूर, यमकेश्वर की पहाड़ियों पर बसा छोटा-सा गांव, जहां रिश्तों की पहचान पद से नहीं, अपनत्व से होती है। गांव भ्रमण के दौरान मुख्यमंत्री ने नाते-रिश्तेदारों और ग्रामीणों से मुलाकात की। बातचीत में उन्होंने लोगों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने, गांव में बसने और खेती-बाड़ी को बढ़ावा देने का संदेश दिया। पहाड़ की जमीन और लोगों का धैर्य—दोनों पर उनका भरोसा साफ झलकता रहा।
अपने स्कूल में लौटना: स्मृतियों से विकास तक
दौरे के दौरान उन्होंने उस विद्यालय के नवनिर्मित कक्षों का उद्घाटन भी किया, जहां से उन्होंने कक्षा नौ तक शिक्षा प्राप्त की थी। अपने ही स्कूल के आंगन में लौटकर विकास कार्यों का शुभारंभ करना एक दुर्लभ क्षण होता है—जहां स्मृतियां और जिम्मेदारी साथ खड़ी दिखती हैं। बच्चों से मुलाकात करते हुए शिक्षा के प्रति उनका स्नेह और आग्रह स्पष्ट दिखा।
सादगी की पृष्ठभूमि, लंबा सफर
ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय केवल आगमन नहीं, बल्कि वह यात्रा भी रही जो पंचूर की पगडंडियों से शुरू होकर बड़े दायित्व तक पहुंची। सीमित संसाधनों और कठिन कनेक्टिविटी वाले दौर में पढ़ाई की निरंतरता, उच्च शिक्षा की ओर कदम, और फिर सार्वजनिक जीवन में बढ़ती जिम्मेदारियां—इस क्रम ने गांव के युवाओं के लिए प्रेरक कथा का रूप ले लिया है।
शिक्षा यात्रा (संक्षेप में)
- प्राथमिक शिक्षा: स्थानीय प्राथमिक विद्यालय (कक्षा 5 तक)
- जूनियर हाईस्कूल: बिथ्याणी (कक्षा 8 तक)
- जनता इंटर कॉलेज, चमकोट खाल: कक्षा 9
- खाड़ी हाईस्कूल, नरेंद्र नगर: कक्षा 10
- भरत मंदिर इंटर कॉलेज, ऋषिकेश: कक्षा 12
- महाविद्यालय, कोटद्वार: बीएससी
संदेश जो गांव ने सुना
इस यात्रा का सबसे भावुक पल बच्चों के साथ बिताया गया समय रहा। टॉफी-चॉकलेट बांटते हुए उनका सहज संवाद—“हम भी तुम्हारे दादा”—ने औपचारिकता की दीवारें तोड़ दीं। ग्रामीणों से बातचीत में उन्होंने खेती और गांव में बसावट पर जोर दिया, मानो कह रहे हों कि विकास की असली जड़ें यहीं हैं।
पंचूर के लिए यह सिर्फ एक दौरा नहीं, स्मृतियों का पुनर्मिलन था; और बच्चों के लिए, अपने ही गांव में इतिहास को मुस्कराते हुए देखने का अवसर।








