नई दिल्ली/27 अक्टूबर 2026। बंगाल की खाड़ी में उठे चक्रवात ‘अर्नब’ को लेकर तटीय राज्यों में सतर्कता बढ़ा दी गई है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के पूर्वानुमान के मुताबिक, यह तूफान 28 अक्टूबर को आंध्र प्रदेश के तट को पार कर सकता है। इसके प्रभाव से तेज हवाएं, भारी बारिश और कुछ इलाकों में बाढ़ का खतरा बना हुआ है। लेकिन मौसम की इस गंभीर हलचल के बीच एक सवाल भी लोगों के मन में उठ रहा है—इस तूफान का नाम ‘अर्नब’ ही क्यों रखा गया और आखिर चक्रवातों के नाम तय कौन करता है?
दरअसल, चक्रवातों के नाम मनमाने ढंग से नहीं रखे जाते। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक निर्धारित व्यवस्था है, जिसमें क्षेत्र के सदस्य देश पहले से नाम प्रस्तावित करते हैं। इन्हीं नामों का तय क्रम के अनुसार इस्तेमाल किया जाता है। आइए समझते हैं कि ‘अर्नब’ नाम का अर्थ क्या है और चक्रवातों के नामकरण की प्रक्रिया कैसे काम करती है।
चक्रवात अर्नब का नाम किसने रखा और इसका क्या मतलब है?
चक्रवात ‘अर्नब’ का नाम बांग्लादेश ने प्रस्तावित किया है। बंगाली भाषा में ‘अर्नब’ का अर्थ समुद्र या महासागर होता है। इस नाम को उत्तर हिंद महासागर क्षेत्र में आने वाले उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की निर्धारित सूची में शामिल किया गया है।
यहां एक बात समझना जरूरी है कि किसी तूफान का नाम उस देश के आधार पर नहीं रखा जाता, जहां वह टकराने वाला है। नामकरण पहले से तैयार क्षेत्रीय सूची के अनुसार होता है। इसलिए बांग्लादेश द्वारा प्रस्तावित नाम वाला चक्रवात भारत के तट पर भी पहुंच सकता है।
चक्रवातों को नाम देने का मुख्य उद्देश्य उनकी पहचान आसान बनाना है। जब समुद्र में एक से अधिक मौसम प्रणालियां सक्रिय हों, तब अलग-अलग नामों से चेतावनी जारी करना और लोगों तक जरूरी जानकारी पहुंचाना अधिक सरल हो जाता है।
चक्रवातों के नाम कैसे तय किए जाते हैं?
बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में बनने वाले चक्रवातों के नामकरण की व्यवस्था विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और संयुक्त राष्ट्र के एशिया एवं प्रशांत क्षेत्र के आर्थिक तथा सामाजिक आयोग (ESCAP) के अंतर्गत काम करने वाले उष्णकटिबंधीय चक्रवात पैनल से जुड़ी है।
इस क्षेत्रीय व्यवस्था में कुल 13 देश शामिल हैं। प्रत्येक देश अपनी ओर से चक्रवातों के लिए नाम प्रस्तावित करता है। इन नामों को निर्धारित मानदंडों के अनुसार सूची में शामिल किया जाता है। जब किसी मौसम प्रणाली की तीव्रता चक्रवात के निर्धारित स्तर तक पहुंच जाती है, तो भारतीय क्षेत्र के लिए जिम्मेदार क्षेत्रीय विशेषीकृत मौसम विज्ञान केंद्र (RSMC), नई दिल्ली, उसे सूची के क्रम के अनुसार नाम देता है।
उत्तर हिंद महासागर क्षेत्र में चक्रवातों के नामकरण की शुरुआत सितंबर 2004 में हुई थी। उस समय इस व्यवस्था में आठ देश शामिल थे। बाद में पांच और देश जुड़े। मौजूदा विस्तारित सूची को अप्रैल 2020 में अपनाया गया था।
चक्रवातों की सूची में कौन-कौन से 13 देश शामिल हैं?
उत्तर हिंद महासागर क्षेत्र में चक्रवातों के नाम प्रस्तावित करने वाले देशों की सूची इस प्रकार है:
- बांग्लादेश
- भारत
- ईरान
- मालदीव
- म्यांमार
- ओमान
- पाकिस्तान
- कतर
- सऊदी अरब
- श्रीलंका
- थाईलैंड
- संयुक्त अरब अमीरात
- यमन
इन देशों ने मिलकर मौजूदा सूची के लिए कुल 169 नाम प्रस्तावित किए हैं। नामों का इस्तेमाल सूची में निर्धारित क्रम के अनुसार किया जाता है। एक बार किसी नाम का उपयोग हो जाने के बाद उत्तर हिंद महासागर क्षेत्र में उसे दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जाता।
यानी हर नए चक्रवात के लिए कोई नया नाम तुरंत गढ़ने की जरूरत नहीं पड़ती। पहले से तय सूची के आधार पर नामकरण किया जाता है, जिससे पूरी प्रक्रिया व्यवस्थित बनी रहती है।
तूफानों के नाम रखते समय किन नियमों का ध्यान रखा जाता है?
चक्रवातों के लिए नाम प्रस्तावित करते समय कुछ महत्वपूर्ण मानदंड अपनाए जाते हैं। नाम छोटा, स्पष्ट और आसानी से बोला जा सकने वाला होना चाहिए। साथ ही, उसका अर्थ ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे किसी देश, समुदाय, संस्कृति या धर्म की भावनाएं आहत हों।
नामों को राजनीति और विवादों से दूर रखने की भी कोशिश की जाती है। इनके चयन में यह ध्यान रखा जाता है कि नाम सामान्य लोगों के लिए याद रखना आसान हो और मौसम संबंधी चेतावनियों में भ्रम पैदा न करे।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के दिशा-निर्देशों के अनुसार, नामों का चयन क्षेत्रीय व्यवस्था के तहत होता है। अलग-अलग महासागरीय क्षेत्रों में नामकरण के नियम और सूचियां अलग हो सकती हैं। इसलिए अटलांटिक महासागर में इस्तेमाल होने वाले नामों और बंगाल की खाड़ी के नामों की व्यवस्था एक जैसी होना जरूरी नहीं है।
चक्रवातों का नाम IMD कैसे रखता है?
भारत में चक्रवातों की निगरानी और पूर्वानुमान की जिम्मेदारी भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के पास है। नई दिल्ली स्थित क्षेत्रीय विशेषीकृत मौसम विज्ञान केंद्र उत्तर हिंद महासागर क्षेत्र में बनने वाले चक्रवातों के नामकरण और संबंधित मौसम संबंधी परामर्श जारी करने की जिम्मेदारी निभाता है।
हालांकि, हर कम दबाव वाले क्षेत्र को चक्रवात का नाम नहीं दिया जाता। मौसम प्रणाली को निर्धारित तीव्रता तक पहुंचना होता है। जब वह चक्रवाती तूफान की श्रेणी में आती है, तभी निर्धारित सूची के अनुसार उसका नाम इस्तेमाल किया जाता है।
नामकरण से मौसम विभाग, प्रशासन, आपदा प्रबंधन एजेंसियों, मीडिया और आम जनता के बीच सूचना साझा करना आसान होता है। इससे चेतावनी जारी करते समय यह स्पष्ट रहता है कि किस तूफान की बात हो रही है और उसका संभावित प्रभाव किन क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
चक्रवात अर्नब कब और कहां तट से टकरा सकता है?
27 अक्टूबर को उपलब्ध मौसम संबंधी जानकारी के अनुसार, चक्रवात ‘अर्नब’ बंगाल की खाड़ी के पश्चिम-मध्य हिस्से में सक्रिय था और पश्चिम-उत्तर-पश्चिम दिशा में आगे बढ़ रहा था। IMD के पूर्वानुमान के मुताबिक, इसके 28 अक्टूबर को आंध्र प्रदेश के तट को पार करने की संभावना है।
तूफान के प्रभाव से आंध्र प्रदेश और ओडिशा के तटीय इलाकों में भारी बारिश तथा तेज हवाओं का खतरा है। इसके असर से अन्य राज्यों में भी मौसम बदल सकता है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश और हवा की तीव्रता का आकलन मौसम विभाग के नवीनतम बुलेटिन के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
चक्रवात को देखते हुए प्रशासन ने संवेदनशील क्षेत्रों में तैयारियां तेज की हैं। कुछ रेल सेवाओं पर असर पड़ने और उड़ानों के संचालन में बदलाव की आशंका भी जताई गई है। यात्रियों को सलाह है कि वे घर से निकलने से पहले संबंधित रेलवे या एयरलाइन से अपनी यात्रा की स्थिति की पुष्टि कर लें।
ध्यान दें: चक्रवात की दिशा, गति और तट से टकराने के समय में बदलाव संभव है। इसलिए लोगों को IMD और स्थानीय प्रशासन की ताजा चेतावनियों का पालन करना चाहिए।
क्यों जरूरी है चक्रवातों के नामकरण की व्यवस्था?
समुद्र में उठने वाला तूफान केवल मौसम की घटना नहीं होता। तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों, मछुआरों, यात्रियों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के लिए उसकी सही जानकारी समय पर मिलना बेहद जरूरी है। ऐसे में नामकरण चेतावनी को पहचानने और तेजी से साझा करने का एक व्यावहारिक माध्यम बनता है।
‘अर्नब’ नाम का अर्थ भले ही समुद्र हो, लेकिन इस तूफान का वास्तविक खतरा उसकी गति, तीव्रता, बारिश और संभावित तटीय प्रभाव से तय होगा। नाम पहचान देता है, जबकि मौसम विभाग के पूर्वानुमान बताते हैं कि लोगों को किस तरह की सावधानी बरतनी चाहिए।












