श्रीनगर (Sun, 08 Feb 2026)- जम्मू-कश्मीर सरकार ने डल झील के निवासियों के पुनर्वास पर बड़ा रुख बदलते हुए यथास्थान संरक्षण मॉडल अपनाने की घोषणा की है। अब परिवारों को झील से दूर बसाने के बजाय, झील के पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर ही इको-हैमलेट्स के रूप में बसाया जाएगा। यह नीति पर्यावरण संरक्षण और आजीविका—दोनों के संतुलन की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।
आवास एवं शहरी विकास विभाग ने विधानसभा में दिए लिखित उत्तर में बताया कि अतीत में बड़े पैमाने पर विस्थापन के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। इसी अनुभव के आधार पर नीति को संरक्षण-आधारित आवास की ओर मोड़ा गया है, जहां झील में रहने वाले समुदायों को पारिस्थितिकी का अभिन्न हिस्सा मानकर योजना बनाई जा रही है।
विधानसभा में खुलासा: पुराने विस्थापन से सीमित लाभ, अब संरक्षण-आधारित सोच
विधानसभा में जडीबल से विधायक तनवीर सादिक के गैर-तारांकित प्रश्न के लिखित उत्तर में सरकार ने स्पष्ट किया कि पहले जिन परिवारों को रखे-अर्थ कॉलोनी में बसाया गया, वह मॉडल अब प्राथमिक विकल्प नहीं रहेगा। अब ध्यान इस बात पर है कि जहां संभव हो, लोग अपने पारंपरिक जल-आधारित बस्तियों के आसपास ही रहें और झील की सेहत भी सुधरे।
सरकार ने यह भी बताया कि कश्मीर के मंडलायुक्त की अध्यक्षता वाली उच्च-स्तरीय समिति की चर्चाओं के बाद यह निर्णय लिया गया। समिति ने माना कि सामाजिक ताने-बाने को तोड़े बिना संरक्षण संभव है—बशर्ते ढांचा वैज्ञानिक और सीमित हो।
नीति का क्रियान्वयन: जेकेएलसीएमए को व्यापक परामर्श की जिम्मेदारी
इस नई रूपरेखा को तैयार करने और लागू करने की जिम्मेदारी जम्मू और कश्मीर झील संरक्षण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (JKLCMA) को दी गई है। प्राधिकरण सार्वजनिक परामर्श, अद्यतन सर्वेक्षण और पर्यावरणीय मानकों के आधार पर उन संरचनाओं की पहचान करेगा जिन्हें झील के भीतर ही व्यवस्थित किया जा सकता है।
नीतिगत ढांचे के अनुसार:
- जहां अधिकतम पुनर्वास पहले ही हो चुका है, वे बस्तियां यथास्थान संरक्षण से बाहर रहेंगी।
- झील के भीतर सीमित और सत्यापित संरचनाओं को ही इको-हैमलेट्स में समायोजित किया जाएगा।
- संरचनाओं की अंतिम संख्या अद्यतन सर्वेक्षण के बाद तय होगी।
इको-हैमलेट्स: आजीविका और पारिस्थितिकी का साझा नक्शा
सरकार का कहना है कि झील के भीतर छोटे-छोटे इको-विलेज/इको-हैमलेट्स विकसित किए जाएंगे, जहां सीवेज प्रबंधन, ठोस अपशिष्ट नियंत्रण, नेविगेशन, और जल-गुणवत्ता सुधार के उपाय साथ-साथ लागू होंगे। इससे न केवल प्रदूषण पर अंकुश लगेगा, बल्कि पारंपरिक पेशों—जैसे शिकारा संचालन, तैरते बाग़ (फ्लोटिंग गार्डन्स), मत्स्य पालन—को भी संरक्षित आधार मिलेगा।
यह प्रस्ताव JKLCMA के निदेशक मंडल द्वारा सैद्धांतिक रूप से अनुमोदित किया जा चुका है और उच्च-स्तरीय समिति का समर्थन भी प्राप्त है।
212.38 करोड़ की डल-निगीन संरक्षण परियोजना को मंजूरी
डल-निगीन संरक्षण के लिए ₹212.38 करोड़ की एकीकृत परियोजना को मंजूरी दी गई है। इस फंड से:
- आधुनिक सीवेज ढांचा,
- जल-मार्गों का सुव्यवस्थित नेविगेशन,
- तटीय एवं आर्द्रभूमि संरक्षण,
- और बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार किए जाएंगे।
विधायक तनवीर सादिक ने कहा कि मीर बेहरी, निगीन और रखे-अर्थ जैसे क्षेत्रों के निवासियों को अंततः झील के पारिस्थितिकी तंत्र का जरूरी हिस्सा माना गया है। उनके मुताबिक, “जबरन विस्थापन के बजाय यथास्थान संरक्षण मॉडल अपनाना झील और लोगों—दोनों की सुरक्षा में निर्णायक कदम है।”
क्यों अहम है यह बदलाव?
विशेषज्ञों के अनुसार, डल झील में दशकों से चली आ रही समस्या का समाधान केवल लोगों को हटाने में नहीं, बल्कि व्यवस्थित सह-अस्तित्व में है। नई नीति उसी सोच का विस्तार है—जहां पर्यावरणीय मानकों के साथ समुदाय की जड़ों को भी महत्व दिया गया है।
यह मॉडल सफल रहा तो डल झील संरक्षण देश के अन्य जल-आधारित बस्तियों के लिए भी एक मिसाल बन सकता है।













