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दलहन-तिलहन किसानों के लिए केंद्र का बड़ा फैसला, MSP से नीचे गिरा भाव तो सीधे मंडी में उतरेगी सरकार

On: October 2, 2026
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लहन-तिलहन किसानों के लिए केंद्र का बड़ा फैसला
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नई दिल्ली/2 अक्टूबर 2026: दलहन-तिलहन किसानों को बाजार में कीमत गिरने पर अपनी उपज मजबूरी में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से कम दाम पर बेचने से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने खरीद व्यवस्था में अहम बदलाव का ऐलान किया है। अब बाजार भाव एमएसपी से नीचे जाने पर नेफेड (NAFED) और एनसीसीएफ (NCCF) को राज्यों की खरीद प्रक्रिया शुरू होने का इंतजार नहीं करना होगा। दोनों केंद्रीय एजेंसियां सीधे मंडियों में उतरकर किसानों से खरीद शुरू कर सकेंगी।

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 29 सितंबर को राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन-रबी अभियान 2026 के दौरान इस फैसले की जानकारी दी। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य बाजार में कीमत गिरने और सरकारी खरीद शुरू होने के बीच पैदा होने वाली देरी को कम करना है, ताकि किसान को अपनी फसल औने-पौने दाम पर बेचने की नौबत न आए।

MSP से नीचे भाव आते ही सक्रिय होंगी NAFED और NCCF

अभी दलहन और तिलहन की MSP खरीद प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (PM-AASHA) की मूल्य समर्थन योजना यानी PSS के तहत होती है। सामान्य व्यवस्था में संबंधित राज्य सरकार के अनुरोध के बाद केंद्रीय नोडल एजेंसियों के जरिए खरीद शुरू की जाती है। बाजार भाव एमएसपी से नीचे आने पर खरीद का प्रावधान पहले से मौजूद है।

नई व्यवस्था में केंद्र ने इसी प्रक्रिया में होने वाली प्रशासनिक देरी को कम करने पर जोर दिया है। कृषि मंत्री के मुताबिक, बाजार भाव एमएसपी से नीचे आते ही NAFED और NCCF राज्यों की प्रक्रिया का इंतजार किए बिना मंडियों में खरीद शुरू कर सकेंगी। इसके बाद राज्य एजेंसियां भी खरीद प्रक्रिया से जुड़ सकती हैं।

यानी किसान के लिए सबसे अहम बदलाव यह है कि सरकारी खरीद की शुरुआत के लिए राज्य स्तर पर प्रस्ताव और प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार कम किया जाएगा।

मंडी में फसल आने से पहले ही तैयार होगा खरीद का खाका

सरकार ने केवल मंडी में तत्काल खरीद शुरू करने की बात नहीं कही है, बल्कि जिला स्तर पर पहले से तैयारी करने पर भी जोर दिया है। NAFED और NCCF को उन क्षेत्रों में उत्पादन, मंडी में संभावित आवक और भंडारण क्षमता का आकलन करने के निर्देश दिए गए हैं, जहां संबंधित फसलों की पैदावार ज्यादा होती है।

इसका मकसद यह है कि फसल की आवक शुरू होने के बाद खरीद केंद्र, भंडारण और अन्य व्यवस्थाएं जुटाने में समय न लगे। खासकर उस स्थिति में जब किसी मंडी में एक साथ बड़ी मात्रा में उपज पहुंचती है, तब समय पर सरकारी खरीद किसान के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।

दलहन-तिलहन में क्यों जरूरी है सरकारी खरीद?

गेहूं और धान की तुलना में दलहन और तिलहन के लिए सरकारी खरीद का नेटवर्क पारंपरिक रूप से अलग रहा है। सरकार अब इन फसलों की घरेलू पैदावार बढ़ाने और किसानों को बेहतर मूल्य सुरक्षा देने पर जोर दे रही है।

केंद्र ने 2030-31 तक दलहन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए मिशन भी शुरू किया है। इसके तहत तुअर, उड़द और मसूर की खरीद को विशेष महत्व दिया जा रहा है। सरकार के अनुसार, इन तीनों फसलों की खरीद पूर्व-पंजीकृत किसानों से उनकी पेशकश के अनुसार करने की व्यवस्था है।

हालिया फैसलों से खरीद का दायरा बढ़ाने की कोशिश भी दिखाई देती है। 30 सितंबर 2026 को केंद्र ने उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में खरीफ 2026-27 के लिए दलहन और तिलहन की ₹5,547.99 करोड़ की MSP खरीद को मंजूरी दी। इसके तहत कुल 7.06 लाख मीट्रिक टन दलहन और तिलहन की खरीद प्रस्तावित है।

तुअर, उड़द और मसूर की खरीद पर खास जोर

सरकार दलहन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए तुअर, उड़द और मसूर की खरीद को विशेष रूप से आगे बढ़ा रही है। मार्च 2026 में कृषि मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि आत्मनिर्भरता मिशन के तहत इन फसलों की खरीद पूर्व-पंजीकृत किसानों से केंद्रीय नोडल एजेंसियों के माध्यम से की जाएगी।

वहीं, कई राज्यों में खरीद केंद्रों और सहकारी नेटवर्क का विस्तार किया जा रहा है। अप्रैल 2026 में बिहार में मसूर की संगठित खरीद शुरू करने और छत्तीसगढ़ में NAFED तथा NCCF के जरिए खरीद ढांचे को मजबूत करने की जानकारी सरकार ने दी थी।

तिलहन किसानों के लिए भावांतर भुगतान का विकल्प

हर स्थिति में पूरी फसल की भौतिक खरीद करना जरूरी नहीं है। तिलहन के मामले में सरकार के पास मूल्य अंतर भुगतान योजना (PDPS) का विकल्प भी है।

इस व्यवस्था में पात्र किसान की फसल का मंडी भाव यदि निर्धारित एमएसपी से कम रहता है, तो एमएसपी और बिक्री/मॉडल मूल्य के बीच का अंतर निर्धारित नियमों के अनुसार किसान को सीधे भुगतान किया जा सकता है।

इसका अर्थ है कि सरकार दलहन-तिलहन किसानों को बाजार में कीमत गिरने की स्थिति से बचाने के लिए दो अलग रास्तों का इस्तेमाल कर सकती है—जहां जरूरी हो वहां MSP पर प्रत्यक्ष खरीद और जहां उपयुक्त हो वहां मूल्य अंतर की भरपाई।

सरकार के सामने अब असली चुनौती समय पर खरीद की

नई व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका समय पर लागू होना है। MSP घोषित होना एक बात है, लेकिन किसान को वास्तव में उस कीमत के आसपास या उस पर अपनी उपज बेचने का अवसर मिलना दूसरी बात है।

केंद्र ने इसी अंतर को कम करने की कोशिश की है। यदि NAFED और NCCF मंडी में कीमतों पर नजर रखते हुए पहले से खरीद की तैयारी कर लें और भाव एमएसपी से नीचे आते ही खरीद शुरू कर दें, तो किसान को तत्काल बिक्री की जरूरत में कम कीमत स्वीकार करने का दबाव घट सकता है।

आगे इस व्यवस्था की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि मंडियों में खरीद केंद्र कितनी तेजी से सक्रिय होते हैं, किसानों का पंजीकरण और सत्यापन कितना सुचारू रहता है तथा खरीदी गई उपज के भंडारण और भुगतान की व्यवस्था कितनी समयबद्ध रहती है। केंद्र का घोषित लक्ष्य साफ है—दलहन और तिलहन किसानों को बाजार भाव में गिरावट के समय MSP से नीचे बेचने की मजबूरी से बचाना और 2030-31 तक दलहन में आत्मनिर्भरता की दिशा में खरीद व्यवस्था को मजबूत करना।

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