नई दिल्ली, 12 फरवरी 2026। देश की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में शामिल अरावली को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है। हरियाणा जू सफारी प्रोजेक्ट पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा—“अरावली को किसी भी प्रकार से छूने की अनुमति नहीं दी जाएगी।” अदालत का यह बयान सिर्फ एक परियोजना पर टिप्पणी नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन को लेकर न्यायपालिका की गंभीरता का संकेत है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की खंडपीठ ने कहा कि जब तक अरावली रेंज की वैज्ञानिक और विधिक परिभाषा विशेषज्ञों द्वारा अंतिम रूप से तय नहीं हो जाती, तब तक किसी भी विकास परियोजना को हरी झंडी नहीं दी जा सकती।
🔎 अदालत ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान हरियाणा सरकार की ओर से दलील दी गई कि प्रोजेक्ट की डीटेल्ड रिपोर्ट में संशोधन कर क्षेत्रफल 10,000 एकड़ से घटाकर 3,300 एकड़ कर दिया गया है और इसे केंद्रीय सशक्त समिति के समक्ष रखा जाना है।
लेकिन अदालत ने साफ कर दिया—“हम विशेषज्ञ नहीं हैं। अरावली की परिभाषा विशेषज्ञ तय करेंगे। जब तक अंतिम रिपोर्ट नहीं आती, किसी को भी अरावली छूने की अनुमति नहीं दी जाएगी।”
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी रेखांकित किया कि अरावली केवल हरियाणा या राजस्थान की भौगोलिक सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कई राज्यों में फैली एक संवेदनशील पारिस्थितिक (Ecological) धरोहर है।
🌳 क्यों विवादों में है हरियाणा जू सफारी प्रोजेक्ट?
प्रस्तावित ‘अरावली जू सफारी प्रोजेक्ट’ गुड़गांव और नूंह जिलों में विकसित किया जाना था। प्रारंभिक योजना के अनुसार 10,000 एकड़ क्षेत्र में बड़े बिल्लियों (Big Cats), पक्षियों, सरीसृपों और तितलियों के लिए अलग-अलग संरक्षण जोन बनाए जाने थे।
हालांकि, पांच सेवानिवृत्त भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारियों और पर्यावरण समूह ‘पीपल फॉर अरावलीज’ ने याचिका दायर कर इसे पहले से क्षतिग्रस्त अरावली क्षेत्र के लिए गंभीर खतरा बताया। उनका कहना है कि इस तरह की परियोजना से प्राकृतिक जल स्रोत, वनस्पति और वन्यजीव आवास प्रभावित हो सकते हैं।
पिछले वर्ष अक्तूबर में भी सुप्रीम कोर्ट ने इस परियोजना पर रोक लगा दी थी। अदालत पहले ही निर्देश दे चुकी है कि अरावली हिल्स और रेंज की नई परिभाषा तय होने तक खनन जैसी गतिविधियों की अनुमति नहीं दी जाएगी।
📜 अरावली की परिभाषा क्या होगी?
पर्यावरण और वन मंत्रालय की समिति ने सुझाव दिया है कि:
- ‘अरावली हिल’ वह स्थल होगा जिसकी ऊंचाई स्थानीय स्तर से 100 मीटर या अधिक हो।
- ‘अरावली रेंज’ दो या अधिक ऐसे पहाड़ियों का समूह होगा, जो 500 मीटर की दूरी के भीतर स्थित हों।
अदालत ने इन सिफारिशों को स्वीकार करते हुए कहा है कि विशेषज्ञ समिति की अंतिम रिपोर्ट आने के बाद ही किसी विकास परियोजना पर विचार किया जाएगा।
⚖️ पर्यावरण बनाम विकास की बहस
हरियाणा जू सफारी प्रोजेक्ट को लेकर बहस केवल पर्यटन या रोजगार तक सीमित नहीं है। यह सवाल विकास और पर्यावरणीय संतुलन के बीच संतुलन खोजने का है।
एक ओर राज्य सरकार इसे इको-टूरिज्म और वन्यजीव संरक्षण का मॉडल बता रही है, वहीं पर्यावरणविद इसे अरावली की नाजुक पारिस्थितिकी के लिए जोखिम मानते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी से यह स्पष्ट हो गया है कि फिलहाल अरावली की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। अंतिम निर्णय विशेषज्ञों की रिपोर्ट के बाद ही लिया जाएगा।











