नई दिल्ली, बुधवार, 14 अक्टूबर 2026। भारतीय संगीत, नृत्य, सिनेमा और खानपान आज दुनिया के अलग-अलग देशों में भारत की पहचान को मजबूत कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार पहचान मिल रही है। इसके साथ ही विदेशों में मौजूद भारत की प्राचीन धरोहरों को वापस लाने और देश की ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने के प्रयास भी तेज किए जा रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने ये बातें नई दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘बृहत्तर भारत: दुनिया भर में भारत के सांस्कृतिक संबंध’ के लिए भेजे गए अपने लिखित संदेश में कहीं। यह सम्मेलन बृहत्तर भारत सोसाइटी की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित किया जा रहा है। इसमें भारत के सांस्कृतिक प्रभाव, ऐतिहासिक संबंधों और विभिन्न सभ्यताओं के साथ उसके जुड़ाव पर चर्चा हो रही है।
भारतीय संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने पर जोर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संदेश में भारतीय संस्कृति की व्यापक पहुंच का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारतीय संगीत, नृत्य, सिनेमा और खानपान दुनिया भर के लोगों को भारत से जोड़ने का माध्यम बन रहे हैं।
भारतीय संस्कृति का प्रभाव केवल कला और मनोरंजन तक सीमित नहीं है। योग, भारतीय दर्शन, पारंपरिक खानपान और ऐतिहासिक विरासत के प्रति बढ़ती दिलचस्पी भी भारत की वैश्विक पहचान को विस्तार दे रही है। ऐसे में सांस्कृतिक संबंधों पर चर्चा करने वाले अंतरराष्ट्रीय मंचों को अलग-अलग देशों के बीच आपसी समझ बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्राचीन धरोहरों की वापसी के प्रयास तेज
प्रधानमंत्री ने विदेशों में मौजूद भारत की प्राचीन धरोहरों को वापस लाने के प्रयासों का भी जिक्र किया। ऐतिहासिक महत्व की मूर्तियां, कलाकृतियां और अन्य पुरावशेष देश की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा हैं। इनका संरक्षण और मूल स्थान पर वापस लाना भारत की विरासत से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों में शामिल है।
सरकार की ओर से इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों का उद्देश्य देश की ऐतिहासिक वस्तुओं को सुरक्षित रखना और आने वाली पीढ़ियों तक उनकी सांस्कृतिक अहमियत पहुंचाना है। हालांकि, अलग-अलग धरोहरों की वापसी संबंधित देशों के साथ बातचीत, पहचान और अन्य प्रक्रियाओं पर निर्भर करती है।
ज्ञान भारतम पहल से प्राचीन पांडुलिपियों का संरक्षण
भारतीय सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए सरकार प्राचीन पांडुलिपियों के संरक्षण पर भी ध्यान दे रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में ज्ञान भारतम पहल का उल्लेख किया, जिसके तहत भारत की पांडुलिपि विरासत को सहेजने के प्रयास किए जा रहे हैं।
प्राचीन पांडुलिपियों में भारतीय इतिहास, साहित्य, दर्शन, चिकित्सा, विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां मौजूद हैं। समय के साथ इनमें से कई पांडुलिपियां क्षतिग्रस्त होने या उचित देखभाल के अभाव में नष्ट होने के खतरे का सामना करती हैं। ऐसे में उनका दस्तावेजीकरण, संरक्षण और उपलब्धता सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।
ज्ञान भारतम जैसी पहल का उद्देश्य इसी विरासत को सुरक्षित रखने और भारत की ज्ञान परंपरा को व्यापक स्तर पर सामने लाने से जुड़ा है।
विज्ञान भवन में 14 से 16 अक्टूबर तक सम्मेलन
नई दिल्ली के विज्ञान भवन में यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 14 से 16 अक्टूबर तक आयोजित किया जा रहा है। इसका आयोजन संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) कर रहा है।
सम्मेलन का विषय ‘बृहत्तर भारत: दुनिया भर में भारत के सांस्कृतिक संबंध’ है। इसमें भारत की सांस्कृतिक विरासत और दूसरे समाजों तथा सभ्यताओं के साथ उसके ऐतिहासिक संबंधों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है।
उद्घाटन सत्र में केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत भी मौजूद रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लिखित संदेश केंद्रीय संस्कृति सचिव विवेक अग्रवाल ने पढ़कर सुनाया।
सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से मजबूत होंगे अंतरराष्ट्रीय संबंध
भारत की सांस्कृतिक विरासत देश के इतिहास और परंपराओं का परिचय देने के साथ-साथ दुनिया के विभिन्न समाजों के साथ उसके पुराने संबंधों को भी सामने लाती है। संगीत, कला, साहित्य, खानपान और ऐतिहासिक धरोहरों के माध्यम से भारतीय संस्कृति ने अलग-अलग देशों में अपनी जगह बनाई है।
प्रधानमंत्री के संदेश में सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने, प्राचीन पांडुलिपियों को सहेजने और विदेशों में मौजूद भारतीय धरोहरों की वापसी के प्रयासों पर जोर दिया गया। सम्मेलन में इन विषयों पर चर्चा भारत की सांस्कृतिक पहचान और वैश्विक संबंधों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।











