इंदौर, 24 अक्टूबर 2026। अंतरिक्ष में रेडिएशन के कारण इलेक्ट्रॉनिक चिप और संचार प्रणालियों के प्रभावित होने का खतरा रहता है। इस चुनौती से निपटने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने एस-बैंड आधारित रेडिएशन रोधी बीमफार्मर चिप विकसित की है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इस तकनीक का इस्तेमाल गगनयान कार्यक्रम के एक प्रस्तावित मिशन में अंतरिक्ष संचार को अधिक विश्वसनीय बनाने के लिए किया जा सकता है।
इसरो अहमदाबाद के वैज्ञानिक डॉ. हरिशंकर गुप्ता ने इंदौर में आयोजित एमपी सेमीकंडक्टर समिट के दौरान एक बातचीत में इस चिप की जानकारी दी। उनके मुताबिक, अंतरिक्ष मिशनों में इस्तेमाल होने वाली चिप को रेडिएशन के प्रभाव से बचाना बेहद जरूरी होता है, क्योंकि चिप में खराबी आने से महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम प्रभावित हो सकते हैं।
क्या है रेडिएशन रोधी बीमफार्मर चिप?
बीमफार्मर चिप ऐसी इलेक्ट्रॉनिक तकनीक का हिस्सा होती है, जो एंटेना के जरिए रेडियो सिग्नल को नियंत्रित करने और उसकी दिशा या वितरण को बेहतर बनाने में मदद करती है। एस-बैंड रेडियो फ्रीक्वेंसी का एक हिस्सा है, जिसका इस्तेमाल विभिन्न संचार प्रणालियों और अंतरिक्ष अनुप्रयोगों में किया जाता है।
अंतरिक्ष में मौजूद उच्च-ऊर्जा कण इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे वातावरण में काम करने के लिए तैयार की गई रेडिएशन-टॉलरेंट या रेडिएशन-हार्डन्ड चिप को इस तरह डिजाइन और जांचा जाता है कि वह विकिरण के प्रभाव के बावजूद अपेक्षित विश्वसनीयता बनाए रख सके।
इस तरह की तकनीक अंतरिक्ष यान की संचार व्यवस्था और अन्य महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों के लिए उपयोगी हो सकती है।
गगनयान मिशन में संचार को मिलेगी मजबूती
गगनयान भारत का मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम है। इसमें अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा के लिए संचार, नियंत्रण और अन्य जरूरी प्रणालियों का भरोसेमंद तरीके से काम करना अहम है।
डॉ. गुप्ता के बताए विवरण के अनुसार, विकसित की गई बीमफार्मर चिप को गगनयान मिशन-2 में इस्तेमाल करने की योजना है। इसका उद्देश्य अंतरिक्ष में संचार व्यवस्था को अधिक विश्वसनीय बनाना है, ताकि मिशन के दौरान जरूरी संवाद में तकनीकी बाधाओं का जोखिम कम किया जा सके।
हालांकि, चिप के मिशन में शामिल होने, उसके अंतिम उपयोग और प्रस्तावित उड़ान की समय-सीमा की पुष्टि इसरो की आधिकारिक घोषणा से की जानी चाहिए।
भविष्य में लेजर ड्राइवर चिप पर भी काम
अंतरिक्ष संचार को अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाने के लिए इसरो भविष्य में ऑप्टिकल कम्युनिकेशन सैटेलाइट में रेडिएशन रोधी लेजर ड्राइवर चिप के उपयोग पर भी काम कर रहा है।
ऑप्टिकल कम्युनिकेशन में डेटा के संचार के लिए प्रकाश, विशेषकर लेजर सिग्नल, का इस्तेमाल किया जाता है। इस व्यवस्था में लेजर से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक घटकों की विश्वसनीयता महत्वपूर्ण होती है। अंतरिक्ष के रेडिएशन वाले वातावरण में ऐसे घटकों को सुरक्षित तरीके से काम करने योग्य बनाना तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है।
डॉ. गुप्ता के अनुसार, इस दिशा में विकसित की जा रही तकनीक भविष्य के अंतरिक्ष संचार मिशनों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। इस चिप को लेकर दुनिया में पहली बार ऐसी उपलब्धि हासिल होने के दावे की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है।
भारत में चिप निर्माण की क्षमता बढ़ाने पर जोर
डॉ. गुप्ता ने बताया कि सेमीकंडक्टर चिप तैयार करने की प्रक्रिया में डिजाइन के बाद फैब्रिकेशन का चरण आता है। इसके बाद चिप की इलेक्ट्रिकल विशेषताओं, तापमान सहने की क्षमता और विश्वसनीयता की जांच की जाती है।
उन्होंने मोहाली में उपलब्ध सीमित फैब्रिकेशन सुविधाओं के साथ-साथ धुलेरा और नोएडा में विकसित हो रही चिप निर्माण इकाइयों का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक, भारत में अंतरिक्ष जैसे विशेष अनुप्रयोगों के लिए चिप की डिजाइनिंग, निर्माण और परीक्षण क्षमता का विस्तार महत्वपूर्ण है।
अंतरिक्ष मिशनों के लिए इस्तेमाल होने वाली चिप को सामान्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की तुलना में अधिक कठोर परिस्थितियों में काम करना पड़ सकता है। इसलिए उसके डिजाइन और निर्माण के साथ-साथ व्यापक परीक्षण भी जरूरी होता है।
रेडिएशन टेस्ट और विश्वसनीयता जांच में लग सकता है लंबा समय
अंतरिक्ष में इस्तेमाल की जाने वाली चिप को मिशन में शामिल करने से पहले कई तरह की जांच से गुजरना पड़ता है। इनमें रेडिएशन परीक्षण, तापमान संबंधी जांच, इलेक्ट्रिकल परीक्षण और लंबे समय तक विश्वसनीयता बनाए रखने की क्षमता का आकलन शामिल हो सकता है।
डॉ. गुप्ता ने बताया कि दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर के इंटर-यूनिवर्सिटी एक्सीलरेटर सेंटर (IUAC) की प्रयोगशाला में चिप का रेडिएशन परीक्षण किया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि अंतरिक्ष मिशनों में इस्तेमाल होने वाली चिप के परीक्षण और सत्यापन की प्रक्रिया में लंबा समय लग सकता है।
इस तरह की जांच का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अंतरिक्ष में विकिरण और तापमान जैसी कठिन परिस्थितियों के बावजूद उपकरण अपेक्षित तरीके से काम करे। हालांकि, हर चिप के परीक्षण में तीन साल लगने की बात को संबंधित तकनीकी प्रक्रिया और आधिकारिक जानकारी से सत्यापित करना जरूरी है।
अंतरिक्ष तकनीक में आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम
मानव अंतरिक्ष उड़ान जैसे जटिल मिशनों में संचार उपकरणों की विश्वसनीयता बेहद महत्वपूर्ण होती है। रेडिएशन का सामना करने में सक्षम चिप विकसित करना इस क्षेत्र में तकनीकी क्षमता बढ़ाने की दिशा में उपयोगी कदम हो सकता है।
भारत में सेमीकंडक्टर निर्माण, अंतरिक्ष इलेक्ट्रॉनिक्स और परीक्षण सुविधाओं का विस्तार होने से भविष्य में अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए जरूरी तकनीक विकसित करने की क्षमता मजबूत हो सकती है। हालांकि, इस चिप की वास्तविक उपयोगिता और गगनयान में इसकी भूमिका का आकलन इसरो की तकनीकी जानकारी और आधिकारिक मिशन विवरण के आधार पर ही किया जाना चाहिए।











