नई दिल्ली, 06 अप्रैल 2026। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच देश में गहराते एलपीजी संकट को लेकर सियासत तेज हो गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि मौजूदा हालात से निपटने में सरकार का रवैया ठीक वैसा ही है, जैसा कोविड-19 महामारी के दौरान देखने को मिला था—बड़ी घोषणाएं, लेकिन ठोस नीति का अभाव।
सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए राहुल गांधी ने सीधे तौर पर प्रधानमंत्री Narendra Modi को निशाने पर लिया। उन्होंने लिखा कि सरकार ने एलपीजी संकट को संभालने का दावा तो बड़ा किया, लेकिन जमीनी हकीकत में इसका पूरा बोझ गरीब और मजदूर वर्ग पर डाल दिया गया है।
“नीति का अभाव, सिर्फ घोषणाएं” — राहुल गांधी का आरोप
राहुल गांधी ने कहा कि यह संकट केवल वैश्विक परिस्थितियों का परिणाम नहीं, बल्कि नीति की कमी का भी नतीजा है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर हर बड़े संकट में सबसे पहले गरीब ही क्यों प्रभावित होते हैं।
उनके मुताबिक, रोजाना 500 से 800 रुपये कमाने वाले प्रवासी मजदूरों के लिए रसोई गैस अब एक “लक्ज़री” बनती जा रही है। उन्होंने एक भावनात्मक उदाहरण देते हुए कहा कि “रात को काम से लौटने वाला मजदूर कई बार इस स्थिति में होता है कि उसके पास चूल्हा जलाने तक के पैसे नहीं होते।”
यह बयान न केवल आर्थिक दबाव की ओर इशारा करता है, बल्कि उस सामाजिक असमानता को भी उजागर करता है, जो ऐसे संकटों के दौरान और गहरी हो जाती है।
“मजदूर टूटने की कगार पर”, उद्योगों पर भी असर
कांग्रेस नेता ने आगे कहा कि स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि मजदूरों को शहर छोड़कर गांव लौटने पर मजबूर होना पड़ रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यही हालात रहे, तो इसका सीधा असर देश की औद्योगिक रीढ़ पर पड़ेगा।
राहुल गांधी के अनुसार, वस्त्र (टेक्सटाइल) उद्योग पहले ही संकट में है और विनिर्माण क्षेत्र (manufacturing sector) किसी तरह सांस ले रहा है। उन्होंने इस पूरे संकट की जड़ एक “कूटनीतिक चूक” को बताया, जिस पर सरकार अब तक खुलकर बात नहीं कर रही।
उनका कहना था कि जब “अहंकार नीति का रूप ले लेता है”, तो परिणाम केवल आर्थिक गिरावट नहीं होता, बल्कि व्यापक सामाजिक असंतुलन भी पैदा होता है।
“हर संकट में गरीब ही क्यों?” — उठाया बड़ा सवाल
राहुल गांधी ने अपने बयान के अंत में एक बुनियादी सवाल उठाया—
“हर संकट में सबसे पहले गरीब ही क्यों मरते हैं?”
उन्होंने लोगों से अपील की कि वे चुप न रहें, क्योंकि यह सिर्फ गरीबों का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे समाज का सवाल है।
सरकार का पक्ष: वैश्विक हालात जिम्मेदार
दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही संसद में यह कह चुके हैं कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई है, जिसका असर भारत सहित कई देशों पर पड़ रहा है।
उन्होंने देशवासियों से अपील की थी कि वे कोविड-19 के समय की तरह एकजुट रहें और किसी भी अफवाह से बचें। साथ ही, सरकार ने आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता बनाए रखने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी विभागों को सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं।
कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की बैठक में भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई, जहां आम जनता की जरूरतों और आपूर्ति व्यवस्था की समीक्षा की गई।
निष्कर्ष: सियासत बनाम जमीनी हकीकत
एलपीजी संकट अब केवल आर्थिक मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुका है। एक तरफ विपक्ष सरकार की नीतियों पर सवाल उठा रहा है, तो दूसरी ओर सरकार इसे वैश्विक परिस्थितियों से जोड़कर देख रही है।
हालांकि, असली चुनौती वही है जो हर बार होती है—क्या राहत के उपाय समय पर उन लोगों तक पहुंच पाएंगे, जिनके लिए एक सिलेंडर की कीमत भी रोजमर्रा की लड़ाई बन चुकी है?












