कानपुर (08 फ़रवरी 2026)। पंडत फिल्म विवाद ने अब धार्मिक और सामाजिक हलकों में तीखी बहस को जन्म दे दिया है। स्वामी यतींद्रानंद गिरी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि फिल्म ‘पंडत’ को किसी भी सूरत में रिलीज नहीं होने दिया जाएगा। उनका आरोप है कि यह फिल्म सनातन परंपराओं का उपहास करती है और समाज में अनावश्यक वैचारिक टकराव पैदा कर सकती है। उन्होंने सेंसर व्यवस्था की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसी सामग्री पर कड़ी निगरानी होनी चाहिए जो सामाजिक सौहार्द को प्रभावित कर सकती हो।
इंद्रानगर में बातचीत के दौरान स्वामी यतींद्रानंद गिरी ने बॉलीवुड पर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि फिल्म उद्योग में बाहरी और संदिग्ध प्रभाव बढ़ रहे हैं, जिनका असर फिल्मों की विषयवस्तु पर दिखता है। उनके अनुसार, समाज के जिन वर्गों ने त्याग और परंपरा से सामाजिक ढांचे को मजबूत किया, उन्हीं पर अब फिल्मी कथानकों के जरिए टिप्पणी की जा रही है, जो चिंताजनक है।
स्वामी ने कहा कि ब्राह्मण समाज को लेकर फिल्म में की गई टिप्पणियां आहत करने वाली बताई जा रही हैं। “ऐसे विषयों पर रचनात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर समाज को बांटना उचित नहीं है,” उन्होंने कहा। उनका मानना है कि रचनात्मक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।
सेंसर बोर्ड की भूमिका पर उठे सवाल
स्वामी यतींद्रानंद गिरी ने कहा कि फिल्मों के प्रमाणन की जिम्मेदारी निभाने वाले संस्थानों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसी सामग्री सार्वजनिक न हो जो तनाव या भ्रम की स्थिति पैदा करे। उन्होंने कहा कि कला के माध्यम से संवाद होना चाहिए, विवाद नहीं। “समाज में अच्छी चीजें जाएं, विभाजनकारी नहीं,” उन्होंने जोड़ा।
अविमुक्तेश्वरानंद प्रकरण और यूजीसी बिल पर भी प्रतिक्रिया
इस दौरान उन्होंने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़े हालिया विवाद पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि कुछ परिस्थितियों में संयम बरतना चाहिए था, हालांकि पुलिस-प्रशासन की कार्रवाई को भी उन्होंने उचित नहीं ठहराया। “दोनों पक्षों को संतुलन रखना चाहिए था,” उनका कहना था।
यूजीसी से जुड़े प्रस्तावित बदलावों पर भी उन्होंने चिंता जताई और कहा कि शिक्षा और संस्कृति से जुड़े विषयों पर व्यापक संवाद की आवश्यकता है। उनके अनुसार, भारत की परंपरा विविधताओं में एकता की रही है, और किसी भी नीति को उसी भावना के अनुरूप होना चाहिए।
सामाजिक संगठनों में हलचल, प्रशासन पर नजर
पंडत फिल्म विवाद के बाद कुछ सामाजिक संगठनों ने भी अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कराई है। हालांकि प्रशासनिक स्तर पर अब तक कोई आधिकारिक टिप्पणी सामने नहीं आई है। फिल्म के निर्माताओं की ओर से भी इस मुद्दे पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया का इंतजार है।
इस बीच, यह स्पष्ट है कि फिल्म की रिलीज से पहले ही बहस का दायरा बढ़ चुका है। सेंसर प्रक्रिया, रचनात्मक स्वतंत्रता और सामाजिक संवेदनशीलता—इन तीनों के बीच संतुलन कैसे बने, यही इस विवाद का केंद्र बनता जा रहा है।








