मुंबई/मंगलवार, 17 फरवरी 2026: भारत की वैश्विक रणनीति अब केवल कूटनीतिक बयानों तक सीमित नहीं रही, बल्कि ठोस समझौतों और बहुपक्षीय साझेदारियों के जरिए नए आयाम गढ़ती दिख रही है। मंगलवार, 17 फरवरी 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की मुलाकात ने इसी दिशा को और स्पष्ट किया। वहीं फरवरी के आखिरी सप्ताह में प्रधानमंत्री मोदी का प्रस्तावित इस्राइल दौरा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई चर्चा का केंद्र बनता नजर आ रहा है।
मुंबई में हुई बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की। भारत और फ्रांस ने रक्षा सहयोग को अगले दस वर्षों के लिए नई ऊंचाई देने और रणनीतिक साझेदारी को मजबूत बनाने का संकल्प दोहराया। यह वही रिश्ता है जिसकी नींव 1998 में रणनीतिक साझेदारी के रूप में रखी गई थी, लेकिन अब इसका विस्तार रक्षा से आगे विज्ञान, ऊर्जा और तकनीक तक पहुंचता दिख रहा है।
फ्रांस के साथ नई रणनीतिक दिशा
भारत और फ्रांस ने “भारत-फ्रांस नवाचार वर्ष 2026” की शुरुआत की, जिसे दोनों देशों के रिश्तों का नया अध्याय माना जा रहा है। उच्च स्तरीय वार्ता के दौरान 20 से अधिक समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक इन समझौतों को अंतिम रूप देने में विदेश मंत्री एस. जयशंकर और विदेश सचिव विक्रम मिस्री की अहम भूमिका रही।
रक्षा क्षेत्र में यह साझेदारी खास तौर पर चर्चा में रही। ‘मेक इन इंडिया’ के तहत कर्नाटक के वेमगल में टाटा और एयरबस के सहयोग से H-125 हेलीकॉप्टर असेंबली प्रोजेक्ट आगे बढ़ेगा। साथ ही 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद प्रक्रिया को भी नई रफ्तार मिलने की उम्मीद जताई गई है। हैमर मिसाइल को राफेल में तैनात करने और भारत में संयुक्त रूप से विकसित करने की दिशा में भी सहमति बनी है।
दोनों देशों ने थल सेना के रेसीप्रोकल डिप्लॉयमेंट यानी परस्पर तैनाती सहयोग को भी आगे बढ़ाने पर विचार किया, जो सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
विज्ञान, अंतरिक्ष और ऊर्जा में भी मजबूत साझेदारी
रक्षा के अलावा अंतरिक्ष विज्ञान, ग्रीन एनर्जी और नागरिक परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भी नई संभावनाएं खुली हैं। पृथ्वी की सतह की इमेजिंग के लिए ‘त्रिश्ना मिशन’ में सहयोग को आगे बढ़ाया जाएगा। इसके अलावा ग्रीन हाइड्रोकार्बन और छोटे परमाणु रिएक्टरों के विकास पर सहमति इस बात का संकेत है कि दोनों देश ऊर्जा सुरक्षा के भविष्य को साथ मिलकर आकार देना चाहते हैं।
एयरोनॉटिक्स में स्किल सेंटर की स्थापना और हेल्थ सेक्टर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सहयोग जैसी पहलें यह दिखाती हैं कि भारत-फ्रांस रिश्ते अब रक्षा से आगे तकनीकी साझेदारी की ओर बढ़ रहे हैं।
पड़ोसी चुनौतियां और भारत की रणनीतिक तैयारी
क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्य भी तेजी से बदल रहा है। पाकिस्तान द्वारा हाइपरसोनिक मिसाइल परीक्षण और चीन समर्थित रक्षा परियोजनाओं के बीच भारत अपनी सैन्य क्षमता को मजबूत करने में जुटा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय वायुसेना द्वारा अग्रिम ठिकानों पर राफेल की तैनाती और नए विमानों की खरीद प्रक्रिया इसी रणनीतिक सोच का हिस्सा है।
हिन्द महासागर क्षेत्र में निगरानी और ऑपरेशन क्षमता बढ़ाने के लिए भारत फ्रांस के साथ तकनीकी सहयोग को भी आगे बढ़ा रहा है। नौसेना साझेदारी को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत को क्षेत्रीय संतुलन के नजरिए से अहम माना जा रहा है।
भारत-फ्रांस साझेदारी का वैश्विक संदेश
फ्रांस लंबे समय से भारत का भरोसेमंद रक्षा भागीदार रहा है, जबकि रूस भी भारत का महत्वपूर्ण सहयोगी बना हुआ है। कूटनीतिक विश्लेषकों के अनुसार भारत की यह बहु-आयामी रणनीति दुनिया को यह संदेश देती है कि नई दिल्ली किसी एक धुरी पर निर्भर नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर संतुलित विदेश नीति अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
फ्रांस के साथ विज्ञान, तकनीक और संयुक्त उत्पादन में बढ़ता सहयोग अप्रत्यक्ष रूप से यह भी दिखाता है कि भारत वैश्विक शक्ति संतुलन में स्वतंत्र भूमिका निभाना चाहता है।
अब निगाह इस्राइल दौरे पर
फरवरी के अंतिम सप्ताह यानी 25-26 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रस्तावित इस्राइल दौरा भी खास माना जा रहा है। इस्राइल इस समय क्षेत्रीय तनावों के बीच मौजूद है और ऐसे माहौल में यह यात्रा कई कूटनीतिक संकेत दे सकती है। प्रधानमंत्री मोदी और इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच पहले से मजबूत व्यक्तिगत समीकरण रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, इस यात्रा के दौरान रक्षा उत्पादन, तकनीकी सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर नई घोषणाएं हो सकती हैं। माना जा रहा है कि भारत अपनी रक्षा साझेदारियों को और विविध बनाते हुए इस्राइल के साथ भी नए सहयोगी आयाम तय कर सकता है।
नया संकेत, नई दिशा
कुल मिलाकर देखें तो फ्रांस के साथ बढ़ता सहयोग और इस्राइल दौरे की तैयारी यह साफ दिखाती है कि भारत अब वैश्विक मंच पर केवल सहभागी नहीं, बल्कि निर्णायक भूमिका निभाने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। रणनीतिक साझेदारियों की यह श्रृंखला भारत को क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर मजबूत स्थिति में खड़ा करती नजर आ रही है।












