नई दिल्ली, 2 अगस्त 2026। एल-नीनो के कारण इस साल मानसून पर मंडरा रहे कमजोर बारिश के खतरे के बीच विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की नई रिपोर्ट ने राहत भरी उम्मीद जगाई है। रिपोर्ट के अनुसार, हिंद महासागर में पॉजिटिव IOD (Positive Indian Ocean Dipole) विकसित होने की संभावना बन रही है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो भारत में एल-नीनो के नकारात्मक असर को काफी हद तक संतुलित किया जा सकता है और मानसून को नई मजबूती मिल सकती है।
मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि सितंबर तक पॉजिटिव IOD बनने की स्थिति बनी तो खासतौर पर दक्षिण भारत सहित कई राज्यों में वर्षा की कमी काफी हद तक पूरी हो सकती है।
WMO की रिपोर्ट ने क्यों बढ़ाई उम्मीद?
विश्व मौसम विज्ञान संगठन की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक हिंद महासागर का तापमान पैटर्न धीरे-धीरे पॉजिटिव IOD की ओर बढ़ रहा है। यह स्थिति भारत की ओर नमी से भरपूर मानसूनी हवाओं को मजबूत करने में मदद करती है।
रिपोर्ट में कुछ अंतरराष्ट्रीय जलवायु पूर्वानुमान केंद्रों के हवाले से कहा गया है कि सितंबर के दौरान पॉजिटिव IOD विकसित होने की संभावना है। इससे मानसून के अंतिम चरण में सामान्य से बेहतर बारिश देखने को मिल सकती है।
क्या होता है एल-नीनो?
एल-नीनो एक वैश्विक जलवायु प्रणाली है, जिसमें मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है।
भारत के संदर्भ में एल-नीनो को अक्सर कमजोर मानसून, कम वर्षा और अधिक गर्मी से जोड़कर देखा जाता है। इसी वजह से जब एल-नीनो सक्रिय होता है तो कृषि, जल संसाधन और बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ने की आशंका बढ़ जाती है।
पॉजिटिव IOD कैसे बदल सकता है तस्वीर?
इंडियन ओशन डिपोल (IOD) हिंद महासागर के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों के समुद्री सतह तापमान के अंतर को दर्शाता है।
जब IOD पॉजिटिव अवस्था में होता है तो हिंद महासागर से भारत की ओर अधिक नमी पहुंचती है। इससे मानसूनी हवाएं मजबूत होती हैं और कई इलाकों में वर्षा की गतिविधियां तेज हो जाती हैं। यही वजह है कि पॉजिटिव IOD को एल-नीनो के प्रभाव को कम करने वाला महत्वपूर्ण जलवायु कारक माना जाता है।
दक्षिण भारत को मिल सकती है सबसे बड़ी राहत
यदि पॉजिटिव IOD का अनुमान सही साबित होता है तो दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत को सबसे अधिक फायदा मिल सकता है। 1 अगस्त तक इस क्षेत्र में सामान्य से करीब 22 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई थी।
मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि सितंबर में अच्छी वर्षा होने पर इस कमी की भरपाई होने की संभावना बढ़ जाएगी। इससे खरीफ फसलों, जलाशयों और पेयजल भंडारण को भी राहत मिल सकती है।
सिर्फ एल-नीनो से तय नहीं होता भारत का मानसून
विशेषज्ञों के अनुसार भारत में मानसून केवल एल-नीनो या IOD के आधार पर तय नहीं होता। वर्षा की स्थिति कई अन्य मौसमीय कारकों पर भी निर्भर करती है।
इनमें प्रमुख हैं—
- बंगाल की खाड़ी में बनने वाले कम दबाव के क्षेत्र।
- मानसूनी ट्रफ की स्थिति।
- हिंद महासागर और अरब सागर से मिलने वाली नमी।
- क्षेत्रीय वायुमंडलीय परिसंचरण।
इसी कारण कई बार मजबूत एल-नीनो के दौरान भी देश के कुछ हिस्सों में सामान्य या औसत से अधिक वर्षा दर्ज की जाती है।
मौसम वैज्ञानिकों की नजर सितंबर पर
फिलहाल हिंद महासागर की स्थिति न्यूट्रल मानी जा रही है, लेकिन वैज्ञानिकों की निगाह सितंबर के मौसमीय बदलाव पर टिकी है। यदि आने वाले हफ्तों में पॉजिटिव IOD पूरी तरह विकसित होता है तो मानसून को नया बल मिल सकता है और कई राज्यों में बारिश का दौर फिर तेज हो सकता है।
क्या है इसका मतलब?
पॉजिटिव IOD का अनुमान ऐसे समय आया है जब एल-नीनो को लेकर चिंताएं बढ़ रही थीं। यदि यह मौसमीय पैटर्न अपेक्षित रूप से विकसित होता है तो देश के कई हिस्सों, खासकर दक्षिण भारत में वर्षा की कमी कम हो सकती है। हालांकि अंतिम स्थिति आने वाले हफ्तों में हिंद महासागर की गतिविधियों और अन्य मौसमीय कारकों पर निर्भर करेगी। फिलहाल WMO का यह पूर्वानुमान किसानों, जल प्रबंधन एजेंसियों और मौसम विशेषज्ञों के लिए राहत भरा संकेत माना जा रहा है।













