नई दिल्ली/17 अक्टूबर 2026: मानसून की विदाई के बाद देश के प्रमुख जलाशयों में पानी की स्थिति चिंता बढ़ाने वाली है। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, देश के 178 प्रमुख जलाशयों में उनकी कुल उपयोगी भंडारण क्षमता का महज 68.58 फीसदी पानी उपलब्ध है। पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले जल भंडारण में 24.53 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। दक्षिण भारत के कई जलाशयों और कावेरी व पेन्नार जैसे नदी बेसिन में स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है।
जलाशयों में कम पानी का असर आने वाले महीनों में खेती, पेयजल आपूर्ति और जलविद्युत उत्पादन पर पड़ सकता है। हालांकि, संकट कितना गंभीर होगा, यह संबंधित क्षेत्रों में पानी की मांग, भूजल की उपलब्धता और आगे होने वाली बारिश पर भी निर्भर करेगा।
जलाशयों में पानी की कमी कितनी गंभीर है?
केंद्रीय जल आयोग (CWC) के साप्ताहिक जलाशय भंडारण बुलेटिन में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, देश के 178 प्रमुख जलाशयों में कुल 126.717 अरब घन मीटर पानी उपलब्ध है। इनकी कुल उपयोगी भंडारण क्षमता 184.762 अरब घन मीटर है। यानी इन जलाशयों में करीब 31.42 फीसदी उपयोगी क्षमता अभी खाली है।
ये जलाशय देश की अनुमानित 257.812 अरब घन मीटर कुल जल भंडारण क्षमता का लगभग 71.67 फीसदी हिस्सा रखते हैं। इसलिए इनमें जमा पानी की स्थिति देश के जल संसाधनों का महत्वपूर्ण संकेत देती है।
आंकड़ों के मुताबिक, मौजूदा भंडारण पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 41.193 अरब घन मीटर कम है। वहीं, पिछले 10 वर्षों के औसत भंडारण से भी यह 24.930 अरब घन मीटर नीचे है।
इसका मतलब है कि कमी केवल पिछले साल के मुकाबले नहीं है, बल्कि लंबे समय के औसत की तुलना में भी जलाशयों में पानी कम है। यही स्थिति आने वाले महीनों के लिए जल प्रबंधन को महत्वपूर्ण बनाती है।
दक्षिण भारत के जलाशयों में सबसे ज्यादा चिंता क्यों?
दक्षिण भारत के कई प्रमुख जलाशयों में सामान्य भंडारण के मुकाबले पानी का स्तर काफी नीचे दर्ज किया गया है। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल के कुछ जलाशयों की स्थिति विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है।
दिए गए आंकड़ों के अनुसार, प्रमुख जलाशयों की स्थिति इस प्रकार है:
| जलाशय | सामान्य भंडारण के मुकाबले उपलब्ध पानी |
|---|---|
| सोमासिला, आंध्र प्रदेश | 22.05% |
| श्रीशैलम, आंध्र प्रदेश | 33.64% |
| मेट्टूर, तमिलनाडु | 32.49% |
| इडुक्की, केरल | 10.62% |
| घटप्रभा, कर्नाटक | 22.56% |
| तुंगभद्रा, कर्नाटक | 22.54% |
| शोलायार, केरल | 23.62% |
| पेरियार, केरल | 46.43% |
इन आंकड़ों में सबसे कम स्तर इडुक्की जलाशय का है, जहां सामान्य भंडारण के मुकाबले उपलब्ध पानी 10.62 फीसदी बताया गया है। हालांकि, इस प्रतिशत का अर्थ यह नहीं है कि जलाशय में उसकी कुल क्षमता का केवल इतना ही पानी है; यह सामान्य भंडारण के सापेक्ष स्थिति दर्शाता है।
दक्षिण भारत के इन जलाशयों से जुड़े क्षेत्रों में पानी की मांग और उपलब्धता के बीच संतुलन बनाए रखना आने वाले समय में महत्वपूर्ण हो सकता है।
महाराष्ट्र में भी कई जलाशयों का भंडारण कम
जलाशयों में पानी की कमी का असर केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं है। महाराष्ट्र के कुछ प्रमुख जलाशयों में भी सामान्य भंडारण की तुलना में काफी कम पानी उपलब्ध है।
दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, जायकवाड़ी में सामान्य भंडारण का 15.55 फीसदी, उजनी में 10.62 फीसदी, मंजरा में 12.45 फीसदी और लोअर तेरना में 28.24 फीसदी पानी दर्ज किया गया है।
वहीं, कर्नाटक के अलीयार जलाशय का भंडारण सामान्य स्तर के मुकाबले शून्य फीसदी बताया गया है। इसका अर्थ सामान्य भंडारण की तुलना में उपलब्धता का स्तर शून्य दर्ज होना है। इसे जलाशय में भौतिक रूप से बिल्कुल पानी नहीं होने का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
कम भंडारण वाले जलाशयों से जुड़े इलाकों में पेयजल, खेती और अन्य जरूरतों के लिए उपलब्ध संसाधनों का आकलन करना जरूरी होगा।
42 जलाशयों में सामान्य भंडारण का 50 से 80 फीसदी पानी
देश के सभी जलाशयों की स्थिति एक जैसी नहीं है। कुछ जलाशयों में पानी की कमी अधिक है, जबकि अन्य में सामान्य स्तर के मुकाबले बेहतर भंडारण मौजूद है।
जल आयोग के दिए गए आंकड़ों के अनुसार, 42 जलाशयों में सामान्य भंडारण का 50 से 80 फीसदी पानी उपलब्ध है। इनमें 11 जलाशयों में यह स्तर 51 से 60 फीसदी, 14 में 61 से 70 फीसदी और 17 में 71 से 80 फीसदी के बीच है।
इससे स्पष्ट होता है कि देश में जल उपलब्धता का आकलन करते समय क्षेत्रीय अंतर को समझना जरूरी है। जहां कुछ क्षेत्रों में पानी की कमी गंभीर हो सकती है, वहीं अन्य इलाकों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बनी हुई है।
कावेरी और पेन्नार बेसिन में पानी की भारी कमी
नदी बेसिन के आंकड़ों में कावेरी और पेन्नार की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक दिखाई देती है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, कावेरी बेसिन में सामान्य भंडारण से 60.50 फीसदी कम पानी है, जबकि पेन्नार बेसिन में यह कमी 72.32 फीसदी बताई गई है।
इसके अलावा, कृष्णा बेसिन में सामान्य से 32.59 फीसदी और साबरमती बेसिन में 38.03 फीसदी कम भंडारण दर्ज किया गया है। सिंधु, माही, कच्छ-सौराष्ट्र और लूणी नदी क्षेत्रों में भी सामान्य स्तर के मुकाबले कमी बताई गई है।
पेन्नार से कन्याकुमारी तक बहने वाली पूर्ववाहिनी नदियों और तादरी से कन्याकुमारी तक की पश्चिमवाहिनी नदियों के बेसिन में भी कम भंडारण की स्थिति सामने आई है।
कावेरी और पेन्नार जैसे नदी बेसिन में कम पानी का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि इनसे जुड़े क्षेत्रों में सिंचाई, घरेलू जरूरतों और अन्य उपयोगों के लिए जल संसाधनों का प्रबंधन आवश्यक होता है। हालांकि, वास्तविक असर स्थानीय जलाशयों, भूजल और पानी के वितरण की व्यवस्था के आधार पर अलग-अलग हो सकता है।
इन नदी बेसिन में सामान्य से ज्यादा पानी
देश के कुछ नदी बेसिन में सामान्य भंडारण के मुकाबले अधिक पानी उपलब्ध है। नर्मदा बेसिन में सामान्य से 7.81 फीसदी ज्यादा पानी दर्ज किया गया है। महानदी बेसिन में यह स्तर 2.95 फीसदी और स्वर्णरेखा बेसिन में 30.74 फीसदी अधिक बताया गया है।
इसके अलावा, गंगा, ताप्ती, गोदावरी, ब्रह्मपुत्र और ब्राह्मणी-बैतरणी सहित कई नदी बेसिन में भंडारण सामान्य स्तर के आसपास बताया गया है।
इससे पता चलता है कि देश में जल भंडारण की स्थिति क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग है। इसलिए किसी एक क्षेत्र में पानी की कमी के आधार पर पूरे देश में एक समान जल संकट का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
कम जल भंडारण से सिंचाई और पेयजल पर क्या असर पड़ेगा?
मानसून के बाद जलाशयों में जमा पानी का इस्तेमाल अगले कई महीनों तक किया जाता है। इस दौरान फसलों की सिंचाई, शहरों और गांवों में पेयजल आपूर्ति तथा उद्योगों की जरूरतें महत्वपूर्ण रहती हैं।
यदि जलाशयों में उपलब्ध पानी कम हो और मांग अधिक बनी रहे, तो संबंधित क्षेत्रों में पानी के वितरण और इस्तेमाल की योजना पर दबाव बढ़ सकता है। किसानों को सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी की स्थिति पर नजर रखनी पड़ सकती है। इसी तरह, जिन शहरों और कस्बों की पेयजल आपूर्ति जलाशयों पर निर्भर है, वहां स्थानीय प्रशासन को उपलब्ध भंडार के अनुसार योजना बनानी पड़ सकती है।
फिर भी, केवल जलाशय के आंकड़ों से यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी शहर में पानी की किल्लत कब शुरू होगी। इसके लिए स्थानीय आपूर्ति व्यवस्था, भूजल स्तर, खपत और अतिरिक्त जल स्रोतों की जानकारी भी जरूरी है।
बिजली उत्पादन पर भी पड़ सकता है असर
देश की 20 जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े जलाशयों में से 12 का भंडारण सामान्य स्तर से कम या उसके बराबर बताया गया है।
जलविद्युत परियोजनाओं में बिजली बनाने के लिए पर्याप्त पानी की उपलब्धता महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में कम भंडारण कुछ परियोजनाओं के संचालन और बिजली उत्पादन की संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि, वास्तविक असर संबंधित परियोजना की स्थिति, उपलब्ध पानी, बिजली की मांग और संचालन संबंधी परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। इसलिए इन आंकड़ों को संभावित चुनौती का संकेत माना जाना चाहिए, न कि बिजली उत्पादन में निश्चित गिरावट का प्रमाण।
आने वाले महीनों में जल संकट बढ़ेगा या नहीं?
मानसून की विदाई के बाद जलाशयों में उपलब्ध पानी आने वाले महीनों की जरूरतों के लिए अहम होता है। मौजूदा आंकड़ों में पिछले साल और 10 वर्षों के औसत की तुलना में कमी दर्ज होना चिंता का विषय है। दक्षिण भारत के कुछ नदी बेसिन और जलाशयों में स्थिति ज्यादा गंभीर दिखाई देती है।
लेकिन आगे जल संकट कितना बढ़ेगा, इसका आकलन केवल मौजूदा भंडारण के आधार पर नहीं किया जा सकता। पानी की मांग, भूजल की उपलब्धता, स्थानीय वर्षा और जल प्रबंधन की व्यवस्था भी इसमें निर्णायक भूमिका निभाएगी।
ऐसे में जलाशयों के स्तर की नियमित निगरानी, पानी के विवेकपूर्ण इस्तेमाल और जरूरत के अनुसार वितरण की योजना बनाना महत्वपूर्ण होगा। खासकर कम भंडारण वाले क्षेत्रों में समय रहते तैयारी करने से पेयजल, सिंचाई और अन्य आवश्यकताओं पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
निष्कर्ष: देश के 178 प्रमुख जलाशयों में 68.58 फीसदी उपयोगी क्षमता के बराबर पानी उपलब्ध होने और पिछले साल की तुलना में भंडारण घटने के आंकड़े जल प्रबंधन को लेकर सतर्क रहने का संकेत देते हैं। दक्षिण भारत के कावेरी और पेन्नार बेसिन में कम भंडारण चिंता बढ़ाता है, लेकिन आने वाले महीनों में संकट की वास्तविक गंभीरता स्थानीय परिस्थितियों और उपलब्ध जल संसाधनों पर निर्भर करेगी।












