लखनऊ (wed, 18 Feb 2026)। लखनऊ में आयोजित एक महत्वपूर्ण संवाद कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य किसी भी समाज की मूलभूत जरूरतें हैं, इन्हें व्यवसाय नहीं बनाया जा सकता। बुधवार, 18 फरवरी 2026 को लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में हुए इस कार्यक्रम में उन्होंने शोधार्थियों, शिक्षकों और छात्रों से सीधे बातचीत करते हुए कई सामाजिक, शैक्षणिक और वैश्विक मुद्दों पर अपने विचार रखे।
उन्होंने जोर देकर कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं हर व्यक्ति तक समान रूप से पहुंचनी चाहिए। उनका मानना था कि जब ये क्षेत्र केवल लाभ कमाने का माध्यम बन जाते हैं, तो समाज में असमानता बढ़ती है और मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है। कार्यक्रम में लखनऊ विश्वविद्यालय के अलावा बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (BBAU) सहित कई संस्थानों के पीएचडी शोधार्थी शामिल रहे।
‘शोध देश की दिशा बदल सकता है’ — शोधार्थियों को संदेश
संवाद के दौरान मोहन भागवत ने शोध कार्य को राष्ट्र निर्माण से जोड़ते हुए कहा कि देश की दिशा और दशा बदलने में शोध की बड़ी भूमिका होती है। उन्होंने कहा कि शोध सिर्फ डिग्री पाने का माध्यम नहीं, बल्कि सत्य को सामने लाने का प्रयास होना चाहिए।
उन्होंने शोधार्थियों से आग्रह किया कि वे अपने काम को प्रामाणिकता, निष्ठा और निःस्वार्थ भावना से करें। उनके अनुसार, भारत को सही तरीके से समझने के लिए गहराई से अध्ययन और तथ्य आधारित शोध आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी विषय को लेकर भ्रम या दुष्प्रचार तभी खत्म हो सकता है जब शोध पूरी ईमानदारी से किया जाए।
पश्चिमी शिक्षा मॉडल और भारतीय दृष्टि पर टिप्पणी
अपने संबोधन में उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिमी शिक्षा प्रणाली के प्रभाव ने भारत की पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था को काफी हद तक बदल दिया। उनके मुताबिक अंग्रेजी शासनकाल में जो बदलाव आए, उनमें कई सुधार की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि व्यक्ति और समाज का संतुलित विकास होना चाहिए। उनके विचारों में भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक मूल्यों और आत्मबोध को फिर से मजबूत करने की जरूरत पर विशेष बल दिखाई दिया।
वैश्वीकरण, बाजारीकरण और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की अवधारणा
वैश्वीकरण के विषय पर बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा कि आज दुनिया में वैश्वीकरण का अर्थ धीरे-धीरे बाजारीकरण तक सीमित हो गया है, जो समाज के लिए चुनौती बन सकता है। उन्होंने भारतीय दर्शन ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत पूरी दुनिया को एक परिवार मानने की सोच रखता है।
उनका कहना था कि जब तक पूरी मानवता सुखी नहीं होगी, तब तक किसी एक व्यक्ति या देश का स्थायी सुख संभव नहीं है। इसलिए उपभोगवादी जीवनशैली के बजाय संयम और संतुलन पर आधारित जीवन अपनाना जरूरी है।
पर्यावरण संरक्षण पर भी दिया जोर
कार्यक्रम के दौरान पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा भी प्रमुखता से सामने आया। उन्होंने कहा कि आधुनिक विकास के साथ प्रकृति के प्रति मित्रवत व्यवहार जरूरी है। पेड़ लगाना, पानी बचाना और सिंगल यूज प्लास्टिक से दूरी बनाना जैसे छोटे कदम भी बड़े बदलाव ला सकते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि आधुनिक तकनीक का उपयोग पर्यावरण संरक्षण के लिए सकारात्मक रूप में किया जाना चाहिए, ताकि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहे।
राजनीतिक से ज्यादा वैचारिक चर्चा का केंद्र रहा कार्यक्रम
पूरे संवाद में माहौल अधिक वैचारिक और शैक्षणिक रहा। छात्रों और शोधार्थियों के बीच हुई इस बातचीत में शिक्षा, संस्कृति, राष्ट्र निर्माण और वैश्विक सोच जैसे विषय प्रमुख रहे। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे संवाद विश्वविद्यालयों में विचार-विमर्श की स्वस्थ परंपरा को मजबूत करते हैं और युवाओं को व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करते हैं।









