नई दिल्ली/24 अगस्त 2026: सड़क पर पैदल चलने वालों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक बार फिर सख्त रुख अपनाया। अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जवाब मांगा है कि लोगों के लिए फुटपाथ पर चलने का अधिकार सुनिश्चित करने और बाधा-मुक्त, सुरक्षित तथा स्पष्ट रूप से चिन्हित फुटपाथ उपलब्ध कराने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।
न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने मामले का दायरा बढ़ाते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इसमें पक्षकार बनाया। अदालत ने साफ किया कि पैदल यात्रियों के लिए सड़क पर सुरक्षित और तय स्थान होना महज शहरी सुविधा का विषय नहीं है, बल्कि लोगों के सुरक्षित आवागमन से जुड़ा महत्वपूर्ण अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट के 19 जून 2026 के फैसले में भी पैदल चलने के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी जा चुकी है।
फुटपाथ पर चलने का अधिकार क्यों है महत्वपूर्ण?
सोमवार की सुनवाई के दौरान पीठ ने पैदल यात्रियों के लिए निर्धारित स्थान की जरूरत पर जोर दिया। अदालत ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज से कहा कि पहला कदम यह होना चाहिए कि पैदल चलने वालों के लिए जगह को ठीक से चिन्हित किया जाए।
अदालत की चिंता सीधी है। सड़क पर चल रहे व्यक्ति को यह भरोसा होना चाहिए कि उसके लिए सुरक्षित रास्ता मौजूद है और उस रास्ते पर चलते समय उसे तेज रफ्तार वाहनों के बीच जाने का खतरा नहीं रहेगा।
यही वजह है कि फुटपाथ पर चलने का अधिकार केवल फुटपाथ बनाने तक सीमित नहीं है। उसका अतिक्रमण मुक्त रहना, रखरखाव होना और मोटर वाहनों की लेन से उचित दूरी पर होना भी उतना ही जरूरी है।
केंद्र ने राज्यों को जारी की है एडवाइजरी
केंद्र सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि सड़कें राज्य का विषय हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय और आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) को पैदल यात्रियों के लिए अलग स्थान उपलब्ध कराने संबंधी एडवाइजरी जारी की है।
अब सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से इन एडवाइजरी के संबंध में अपना जवाब दाखिल करने को कहा है। इसका मतलब साफ है कि अदालत अब केवल दिशा-निर्देश जारी करने तक मामला सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि यह जानना चाहती है कि जमीन पर उनका कितना पालन हुआ है।
3 अगस्त को भी सुप्रीम कोर्ट ने दिए थे निर्देश
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले भी पैदल यात्रियों की सुरक्षा को लेकर स्पष्ट निर्देश दे चुका है। 3 अगस्त को अदालत ने केंद्र को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि हर सड़क पर पैदल चलने वालों के लिए अलग जगह हो।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि फुटपाथ पर किसी तरह का कब्जा नहीं होना चाहिए। इसे मोटर वाहनों की लेन से उचित रूप से अलग रखा जाना चाहिए, ताकि पैदल यात्री बिना चलते वाहनों के खतरे के अपने निर्धारित रास्ते पर स्वतंत्र रूप से चल सकें।
शहरों में फुटपाथ पर दुकानों, पार्किंग, निर्माण सामग्री या अन्य अवरोधों का कब्जा कोई नई समस्या नहीं है। ऐसे में अदालत की लगातार टिप्पणियां इस बुनियादी सवाल को सामने ला रही हैं कि सड़क व्यवस्था में पैदल चलने वाले व्यक्ति को आखिर कितनी जगह और सुरक्षा मिलनी चाहिए।
19 जून के फैसले में मौलिक अधिकार माना गया पैदल चलना
सुप्रीम कोर्ट ने 19 जून 2026 के महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि फुटपाथ पर चलने का अधिकार संविधान के भाग-III के तहत मौलिक अधिकार है। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) में दिए गए आवागमन के अधिकार के साथ अनुच्छेद 19 की अन्य संबंधित स्वतंत्रताओं और अनुच्छेद 21 से जोड़ा।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि पैदल चलने के मौलिक अधिकार के दायरे में निर्धारित फुटपाथ का अधिकार भी शामिल है और इन अधिकारों को मोटर चालित वाहनों की आवाजाही पर प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
नगर निकायों और पंचायतों की भी जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने 19 जून के फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि सड़क होने की स्थिति में पैदल यात्रियों के लिए चिन्हित और अच्छी तरह बनाए रखे गए फुटपाथ सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी संबंधित शहरी विकास प्राधिकरणों, नगर निगमों, नगरपालिकाओं और पंचायतों की भी है।
इन संस्थाओं को फुटपाथ और जरूरी पैदल यात्री सुविधाओं को चिन्हित करने, बनाने, उनका रखरखाव करने और उन्हें सुरक्षित रखने की दिशा में काम करना होगा। अदालत ने पैदल चलने को जीवन का अभिन्न हिस्सा माना है।
अब सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जवाब मांगे जाने के बाद अगली नजर इस बात पर रहेगी कि स्थानीय स्तर पर फुटपाथों की वास्तविक स्थिति क्या है और अदालत के निर्देशों को लागू करने के लिए सरकारें क्या ठोस कदम उठाती हैं।











