कोलकाता (Sat, 09 May 2026)। पश्चिम बंगाल की राजनीति ने शनिवार को एक ऐसा ऐतिहासिक मोड़ देखा, जिसकी कल्पना कुछ साल पहले तक भाजपा समर्थक भी खुलकर नहीं कर पा रहे थे। लंबे राजनीतिक संघर्ष, वैचारिक टकराव और कई चुनावी उतार-चढ़ावों के बाद आखिरकार भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल की सत्ता पर कब्जा जमा लिया। बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी ने राज्य के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले ली है।
ब्रिगेड परेड ग्राउंड में आयोजित भव्य समारोह में हजारों समर्थकों की मौजूदगी के बीच यह शपथ ग्रहण केवल सत्ता परिवर्तन का कार्यक्रम नहीं दिखा, बल्कि बीजेपी ने इसे “सोनार बांग्ला” के नए दौर की शुरुआत के तौर पर पेश किया। विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 293 में से 207 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया, जिसने बंगाल की दशकों पुरानी राजनीतिक धारा को बदल दिया।
शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री बनने के साथ बंगाल में टूटा पुराना राजनीतिक समीकरण
आजादी के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति मुख्य रूप से कांग्रेस, वाम दलों और बाद में तृणमूल कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही। बीजेपी लंबे समय तक राज्य में सीमित प्रभाव वाली पार्टी मानी जाती थी। लेकिन 2026 के चुनाव परिणामों ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह जीत केवल सीटों की संख्या नहीं है, बल्कि बंगाल की सामाजिक और राजनीतिक मानसिकता में आए बड़े बदलाव का संकेत भी है। बीजेपी नेतृत्व लगातार “सोनार बांग्ला” के नारे के जरिए खुद को विकास, मजबूत प्रशासन और केंद्र के साथ तालमेल वाली सरकार के रूप में पेश करता रहा।
गृह मंत्री अमित शाह ने इस जीत को पार्टी की “लंबी वैचारिक यात्रा” का परिणाम बताया। वहीं बीजेपी नेताओं ने इसे पूर्वी भारत में पार्टी के सबसे बड़े राजनीतिक विस्तार के तौर पर प्रस्तुत किया।
स्थानीय पार्षद से मुख्यमंत्री तक का असाधारण सफर
शुभेंदु अधिकारी का राजनीतिक सफर बंगाल की राजनीति में किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं माना जा रहा। उन्होंने 1995 में कोंताई नगरपालिका से कांग्रेस पार्षद के रूप में राजनीति की शुरुआत की थी। बाद में वह तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए और पूर्वी मिदनापुर में अपना मजबूत जनाधार तैयार किया।
धीरे-धीरे उन्होंने विधायक, सांसद और मंत्री के तौर पर अपनी पहचान बनाई। लेकिन उनका असली राजनीतिक कद नंदीग्राम आंदोलन के दौरान उभरकर सामने आया। भूमि अधिग्रहण के खिलाफ चले इस आंदोलन ने बंगाल की राजनीति की दिशा बदल दी थी।
2020 में तृणमूल कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल होने का उनका फैसला उस समय बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा घटनाक्रम माना गया था। भाजपा में आने के पांच साल के भीतर मुख्यमंत्री पद तक पहुंचना उनके तेजी से बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को दिखाता है।
ममता बनर्जी को हराने के बाद बदल गया राजनीतिक समीकरण
2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी को हराने के बाद शुभेंदु अधिकारी बीजेपी के सबसे बड़े बंगाली चेहरे बनकर उभरे। हालांकि उस चुनाव में बीजेपी सत्ता तक नहीं पहुंच पाई थी, लेकिन अधिकारी की जीत ने पार्टी के भीतर उनका कद काफी बढ़ा दिया।
उस चुनाव के बाद उन्हें विपक्ष का नेता बनाया गया और उन्होंने लगातार तृणमूल कांग्रेस सरकार के खिलाफ आक्रामक अभियान चलाया। बीजेपी नेताओं का मानना था कि बंगाल में ममता बनर्जी को सीधे चुनौती देने की क्षमता यदि किसी नेता में है, तो वह शुभेंदु अधिकारी हैं।
यही वजह रही कि इस बार सत्ता मिलने के बाद उनके नाम पर पार्टी के भीतर लगभग सर्वसम्मति दिखाई दी।
बीजेपी विधायक दल में निर्विरोध मिला समर्थन
बीजेपी नेतृत्व ने दावा किया कि मुख्यमंत्री पद के लिए शुभेंदु अधिकारी के नाम पर किसी तरह का विरोध नहीं हुआ। विधायक दल की बैठक में कई विधायकों ने उनका नाम प्रस्तावित किया और किसी दूसरे नेता के नाम पर चर्चा तक नहीं हुई।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, संगठन के भीतर शुभेंदु अधिकारी को ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो बंगाल की जमीनी राजनीति, प्रशासनिक ढांचे और चुनावी रणनीति तीनों को अच्छी तरह समझते हैं।
उनके समर्थकों का कहना है कि बंगाल में बीजेपी को गांव और जिला स्तर तक मजबूत करने में उनकी भूमिका बेहद अहम रही।
मिदनापुर में जश्न, क्षेत्रीय पहचान को मिला नया चेहरा
शुभेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री बनना केवल राजनीतिक बदलाव नहीं बल्कि क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के लिहाज से भी बड़ा माना जा रहा है। अजय मुखर्जी के बाद वह मिदनापुर क्षेत्र से मुख्यमंत्री बनने वाले दूसरे नेता हैं।
जैसे ही उनके नाम की घोषणा हुई, कोंताई और पूर्वी मिदनापुर के कई इलाकों में समर्थकों ने सड़कों पर उतरकर जश्न मनाया। पटाखे फोड़े गए, मिठाइयां बांटी गईं और ‘सोनार बांग्ला’ के नारे लगाए गए।
उनके पिता और वरिष्ठ नेता शिशिर अधिकारी ने कहा कि मिदनापुर लंबे समय तक राजनीतिक रूप से उपेक्षित महसूस करता रहा और अब इस क्षेत्र को नई पहचान मिलने की उम्मीद है।
नंदीग्राम आंदोलन ने गढ़ी राजनीतिक पहचान
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि नंदीग्राम आंदोलन नहीं होता, तो शायद शुभेंदु अधिकारी का राजनीतिक सफर भी अलग होता। 2007 में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हुए आंदोलन ने उन्हें जमीनी नेता के तौर पर स्थापित कर दिया।
उन्होंने हरिपुर परमाणु ऊर्जा परियोजना के विरोध में भी आंदोलन का नेतृत्व किया। इन अभियानों ने उन्हें ग्रामीण बंगाल में मजबूत जनसमर्थन दिलाया।
बीजेपी आज भी उन्हें ऐसे नेता के रूप में पेश करती है जो केवल संगठन की वजह से नहीं बल्कि लंबे जनसंघर्षों से उभरकर सामने आए हैं।
‘डबल इंजन सरकार’ पर बीजेपी का बड़ा दांव
बीजेपी अब बंगाल में “डबल इंजन सरकार” के मॉडल को आगे बढ़ा रही है। पार्टी का दावा है कि केंद्र और राज्य में एक ही गठबंधन की सरकार होने से विकास परियोजनाओं, निवेश और बुनियादी ढांचे के कामों में तेजी आएगी।
शुभेंदु अधिकारी ने शपथ लेने के बाद तेज प्रशासन, उद्योग निवेश और कानून-व्यवस्था सुधार को अपनी प्राथमिकता बताया। बीजेपी नेताओं का कहना है कि बंगाल अब राजनीतिक टकराव की जगह विकास आधारित राजनीति की ओर बढ़ेगा।
भव्य शपथ समारोह से दिया गया बड़ा राजनीतिक संदेश
ब्रिगेड परेड ग्राउंड में हुए शपथ ग्रहण समारोह की भव्यता ने साफ कर दिया कि बीजेपी इस पल को केवल औपचारिक कार्यक्रम नहीं बल्कि ऐतिहासिक राजनीतिक घटना के तौर पर पेश करना चाहती थी।
करीब 80 हजार लोगों के बैठने की व्यवस्था की गई थी। भारी बारिश की आशंका के बावजूद विशाल वॉटरप्रूफ ढांचा तैयार किया गया। मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, एनडीए शासित राज्यों के मुख्यमंत्री, राज्यपाल और नई कैबिनेट के लिए अलग-अलग सेक्शन बनाए गए थे।
राइटर्स बिल्डिंग्स को भी खास तौर पर सजाया गया, जिसे बीजेपी सत्ता परिवर्तन के प्रतीक के रूप में पेश कर रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी बंगाल में अपने शासन को केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं बल्कि वैचारिक परिवर्तन के रूप में स्थापित करना चाहती है।











