लखनऊ, 15 मार्च 2026 (रविवार)। ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की दिशा में उत्तर प्रदेश ने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। बीसी सखी योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के दम पर उत्तर प्रदेश देश में पहले स्थान पर पहुंच गया है। इस सूची में मध्य प्रदेश दूसरे और राजस्थान तीसरे स्थान पर हैं।
राज्य सरकार के प्रयासों से यह योजना गांवों की महिलाओं के लिए आज रोजगार और सम्मान का मजबूत माध्यम बनती जा रही है। स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हजारों महिलाएं अब गांव-गांव में बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराते हुए अपनी पहचान बना रही हैं।
40 हजार से अधिक महिलाएं गांवों में दे रहीं बैंकिंग सेवाएं
उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत संचालित बीसी सखी (बिजनेस कॉरेस्पांडेंट सखी) पहल ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय सेवाओं की पहुंच को तेजी से बढ़ा रही है।
प्रदेश में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी 40 हजार से अधिक महिलाएं इस योजना के तहत सक्रिय हैं। ये महिलाएं गांवों में माइक्रो एटीएम और डिजिटल उपकरणों के जरिए बैंकिंग सेवाएं प्रदान कर रही हैं।
इन सेवाओं में शामिल हैं:
- नकद निकासी और जमा
- आधार आधारित भुगतान
- बैंक खातों से जुड़े लेनदेन
- ग्रामीणों को डिजिटल बैंकिंग की जानकारी
इस व्यवस्था से ग्रामीणों को बैंक शाखा तक जाने की जरूरत कम हो गई है और गांव में ही बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध हो रही हैं।
महिलाओं की आय में भी हुआ बड़ा इजाफा
इस योजना का सबसे बड़ा प्रभाव ग्रामीण महिलाओं की आय पर पड़ा है। बीसी सखी के रूप में काम कर रहीं महिलाएं औसतन 10 से 15 हजार रुपये प्रति माह कमा रही हैं।
कई महिलाएं लेनदेन पर मिलने वाले कमीशन के जरिए 40 से 50 हजार रुपये तक मासिक आय अर्जित कर रही हैं। इससे न केवल उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर हुई है, बल्कि परिवार की जिम्मेदारियों को संभालने में भी उन्हें मजबूती मिली है।
महिला सशक्तीकरण का प्रभावी मॉडल
राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के संयुक्त मिशन निदेशक जनमेजय शुक्ला के अनुसार, बीसी सखी योजना महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का मजबूत माध्यम बन चुकी है।
उन्होंने बताया कि लखनऊ, प्रयागराज, सुल्तानपुर सहित कई जिलों में महिलाएं इस योजना के जरिए रोजगार और सम्मान दोनों हासिल कर रही हैं। प्रशिक्षण के बाद उन्हें अपने गांव या आसपास के क्षेत्रों में तैनात किया जाता है, जिससे ग्रामीणों को बैंकिंग सेवाएं घर के पास ही मिल रही हैं।
गांव-गांव तक पहुंच रही वित्तीय सेवाएं
बीसी सखी मॉडल के विस्तार से ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय समावेशन को नई गति मिली है। जिन गांवों में पहले बैंकिंग सेवाएं सीमित थीं, वहां अब महिलाएं डिजिटल उपकरणों के माध्यम से लोगों को सुविधाएं उपलब्ध करा रही हैं।
इस पहल से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी सकारात्मक बदलाव दिखाई दे रहा है। बैंकिंग सुविधाएं सुलभ होने से लोगों की बचत, लेनदेन और सरकारी योजनाओं के लाभ तक पहुंच आसान हुई है।
अनीता और प्रियंका जैसी महिलाएं बनीं प्रेरणा
लखनऊ की अनीता पाल इस योजना की सफलता की एक मजबूत मिसाल बनकर सामने आई हैं। बीसी सखी के रूप में काम करते हुए वे हर महीने नियमित आय के साथ-साथ लगभग 50 हजार रुपये तक कमीशन भी अर्जित कर रही हैं।
इसी तरह सुल्तानपुर की प्रियंका मौर्य भी इस योजना के जरिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनी हैं। वे गांव में बैंकिंग सेवाएं प्रदान करते हुए अपने परिवार की जिम्मेदारियां संभाल रही हैं।
कई बैंक भी जुड़े इस पहल से
बीसी सखी कार्यक्रम की सफलता को देखते हुए कई राष्ट्रीयकृत बैंक भी इस पहल से जुड़ गए हैं।
इसमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
- स्टेट बैंक ऑफ इंडिया
- बैंक ऑफ बड़ौदा
- बैंक ऑफ इंडिया
- पंजाब नेशनल बैंक
- यूनियन बैंक ऑफ इंडिया
- इंडियन बैंक
- केनरा बैंक
इन बैंकों के सहयोग से योजना का दायरा तेजी से बढ़ रहा है और अधिक गांवों तक बैंकिंग सेवाएं पहुंच रही हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रही नई मजबूती
विशेषज्ञों का मानना है कि बीसी सखी योजना केवल रोजगार का साधन नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण भारत में वित्तीय समावेशन और महिला सशक्तीकरण का मजबूत मॉडल बनती जा रही है।
महिलाओं की भागीदारी से गांवों में बैंकिंग सेवाओं की पहुंच बढ़ी है और साथ ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई ऊर्जा मिल रही है।
अगर इसी गति से यह पहल आगे बढ़ती रही तो आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश का यह मॉडल देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक प्रेरक उदाहरण बन सकता है।







