लखनऊ, 24 फरवरी 2026 (मंगलवार)। उत्तर प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के समापन के बाद विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने मंगलवार को प्रेस वार्ता में कहा कि बीते चार वर्षों में प्रदेश की विधायिका की धारणा में उल्लेखनीय बदलाव आया है। उन्होंने स्वीकार किया कि कभी विधानसभा की कार्यवाही को लेकर समाज में नकारात्मक छवि बन गई थी, लेकिन अब सदन गंभीर, सार्थक और लंबी बहसों का मंच बन चुका है।
महाना ने कहा, “लोकतंत्र केवल बहुमत से नहीं चलता, बल्कि बहस की गुणवत्ता से भी उसकी मजबूती तय होती है। पिछले कुछ वर्षों में यह बदलाव साफ दिखाई दे रहा है।”
विधायिका की धारणा में बदलाव: बहस और अनुशासन पर जोर
विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि पहले सदन की कार्यवाही व्यवधानों और हंगामे के कारण चर्चा में रहती थी। लेकिन अब मुद्दों पर विस्तृत विमर्श हो रहा है। पक्ष और विपक्ष दोनों अपनी बात मजबूती से रखते हैं और जनहित के प्रश्नों पर गंभीरता दिखाई देती है।
उन्होंने बताया कि विशेष अवसरों पर सदन 24 से 36 घंटे तक लगातार चला है। यह केवल समय का विस्तार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक परंपराओं के प्रति प्रतिबद्धता का संकेत है।
इस बार का बजट सत्र भी लंबी कार्यवाही के लिए उल्लेखनीय रहा। सदन की बैठकें सुबह 11 बजे से शुरू होकर कई दिनों तक रात 9 से 10 बजे तक चलीं। कुल 10 दिनों में विधानसभा 75.08 घंटे संचालित हुई, जबकि 2.23 घंटे व्यवधान में व्यतीत हुए।
प्रश्नोत्तर और विधायी कार्य: आंकड़ों में सत्र की तस्वीर
सत्र के दौरान कुल 2427 प्रश्न प्राप्त हुए। इनमें से 1956 प्रश्न स्वीकृत किए गए और 958 प्रश्नों के उत्तर सदस्यों को प्राप्त हो चुके हैं। महाना ने इसे जवाबदेही की दिशा में सकारात्मक संकेत बताया।
इस बजट सत्र में विनियोग विधेयक सहित कुल छह विधेयक पारित हुए। इनमें प्रमुख रूप से—
- उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक
- उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय (द्वितीय संशोधन) विधेयक
- उत्तर प्रदेश नगर निगम (संशोधन) विधेयक
- उत्तर प्रदेश नगर पालिका (संशोधन) विधेयक
- उत्तर प्रदेश राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंध (संशोधन) विधेयक
इन विधेयकों को पारित करते समय विस्तृत चर्चा हुई और सदस्यों ने अपने सुझाव भी दर्ज कराए।
90 दिन सदन न चल पाने पर क्या बोले अध्यक्ष?
साल में 90 दिन सदन न चल पाने के प्रश्न पर विधानसभा अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि सदन का बिजनेस सरकार तय करती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में कार्यप्रणाली को और प्रभावी बनाने की दिशा में प्रयास जारी रहेंगे।
उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में विधानसभा की उत्पादकता और बढ़ेगी तथा लोकतांत्रिक मूल्यों को और मजबूती मिलेगी।
लोकतंत्र की कसौटी पर विधानसभा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी राज्य की लोकतांत्रिक सेहत उसकी विधानसभा की सक्रियता से आंकी जाती है। लंबी बहसें, प्रश्नोत्तर की प्रभावशीलता और विधेयकों पर गंभीर विमर्श—ये सभी संकेतक होते हैं।
सतीश महाना के अनुसार, पिछले चार वर्षों में विधायिका की धारणा केवल बदली ही नहीं है, बल्कि जनता के बीच उसका भरोसा भी बढ़ा है।
बदलते राजनीतिक परिदृश्य में यह दावा कितना स्थायी साबित होगा, यह आने वाले सत्रों में स्पष्ट होगा। फिलहाल, बजट सत्र के आंकड़े और कार्यवाही का समय विधानसभा की बढ़ती सक्रियता की ओर इशारा जरूर करते हैं।









