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केरल का नाम बदलकर हुआ ‘केरलम’, राष्ट्रपति मुर्मू ने दी विधेयक को मंजूरी

On: August 17, 2026
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केरल का नाम बदलकर हुआ केरलम, राष्ट्रपति मुर्मू ने दी विधेयक को मंजूरी
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नई दिल्ली/17 अगस्त 2026। देश के दक्षिणी राज्य के आधिकारिक नाम को लेकर लंबे समय से चली आ रही मांग अब पूरी हो गई है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने वाले केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026 को मंजूरी दे दी है। संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के साथ ही नाम परिवर्तन की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी हो गई है।

इस बदलाव के पीछे केवल नाम बदलने की औपचारिकता नहीं, बल्कि राज्य की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को आधिकारिक स्वरूप देने की भावना भी जुड़ी है। मलयालम में राज्य का नाम पहले से ही ‘केरलम’ (കേരളം) है, जबकि संविधान की पहली अनुसूची में इसका आधिकारिक नाम ‘केरल’ दर्ज था।

केरल का नाम बदलकर केरलम क्यों किया गया?

केरल का नाम बदलकर केरलम करने की मांग केरल विधानसभा में कई बार उठ चुकी है। विधानसभा ने अगस्त 2023 में पहली बार इस संबंध में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया था। हालांकि, प्रस्ताव में कुछ प्रक्रियात्मक और तकनीकी कमियां सामने आने के बाद इसे दोबारा तैयार करना पड़ा।

इसके बाद 24 जून 2024 को केरल विधानसभा ने मुख्यमंत्री पिनराई विजयन द्वारा पेश प्रस्ताव को फिर सर्वसम्मति से मंजूरी दी। इसमें संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत राज्य का नाम ‘केरल’ से बदलकर ‘केरलम’ करने की मांग की गई थी।

मलयालम भाषा और स्थानीय पहचान प्रमुख वजह

राज्य सरकार और विधानसभा का तर्क रहा है कि मलयालम भाषा में राज्य को ‘केरलम’ कहा जाता है। ऐसे में संविधान और आधिकारिक दस्तावेजों में ‘केरल’ नाम का इस्तेमाल राज्य की भाषाई पहचान से अलग दिखाई देता था।

1956 में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के दौरान मलयालम भाषी क्षेत्रों को मिलाकर केरल राज्य का गठन हुआ था। इसलिए राज्य का स्थानीय और भाषाई नाम ‘केरलम’ रखने की मांग को उसकी ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखा गया।

संसद में कैसे पूरी हुई नाम बदलने की प्रक्रिया?

केंद्र सरकार ने 24 फरवरी 2026 को राज्य का नाम ‘केरल’ से ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। गृह मंत्रालय के अनुसार, इसके बाद केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026 को संवैधानिक प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाया गया।

संविधान का अनुच्छेद 3 संसद को किसी मौजूदा राज्य का नाम बदलने का अधिकार देता है। हालांकि, ऐसे विधेयक को संसद में पेश करने से पहले राष्ट्रपति की सिफारिश और संबंधित राज्य विधानसभा से उसके विचार प्राप्त करने की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करनी होती है।

इसके बाद विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित हुआ और अब राष्ट्रपति की मंजूरी के साथ इसे कानूनी रूप मिल गया है।

संविधान की पहली अनुसूची में होगा बदलाव

नाम परिवर्तन का सीधा असर संविधान की पहली अनुसूची पर पड़ेगा, जहां राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के नाम दर्ज हैं। वहां ‘Kerala’ के स्थान पर ‘Keralam’ दर्ज किया जाएगा।

यह बदलाव केवल सरकारी कागजों तक सीमित नहीं रहेगा। समय के साथ केंद्र और राज्य सरकार के दस्तावेजों, आधिकारिक रिकॉर्ड, अधिसूचनाओं और अन्य प्रशासनिक संदर्भों में नए नाम का इस्तेमाल किया जाएगा।

‘केरलम’ नाम के पीछे क्या है ऐतिहासिक संदर्भ?

‘केरलम’ नाम को लेकर राज्य में भाषाई और ऐतिहासिक संदर्भ लंबे समय से मौजूद रहे हैं। प्राचीन भारतीय स्रोतों में इस क्षेत्र का उल्लेख अलग-अलग नामों और रूपों में मिलता है। हालांकि, मौजूदा नाम परिवर्तन का मुख्य आधार किसी एक प्राचीन अभिलेख की व्याख्या नहीं, बल्कि मलयालम में प्रचलित नाम और राज्य की भाषाई पहचान है।

विधानसभा के प्रस्ताव में भी इसी बात पर जोर दिया गया था कि मलयालम भाषा में राज्य का नाम ‘केरलम’ है और 1956 में भाषाई आधार पर राज्य के गठन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखते हुए संविधान में भी यही नाम होना चाहिए।

नाम बदला, पहचान वही रहेगी

‘केरल’ से ‘केरलम’ का बदलाव भले ही शब्दों में छोटा दिखाई देता हो, लेकिन स्थानीय पहचान के लिहाज से इसका महत्व बड़ा है। यह उस नाम को संवैधानिक मान्यता देता है, जिसे मलयालम भाषी समाज लंबे समय से अपनी भाषा में इस्तेमाल करता आया है।

अब देश के नक्शे, सरकारी रिकॉर्ड और संवैधानिक दस्तावेजों में भी इस दक्षिणी राज्य की पहचान ‘केरलम’ के नाम से दर्ज होगी।

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