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FDI नियमों में बदलाव का असर, 29 विदेशी कंपनियों ने भारत में निवेश के लिए जताई रुचि; करीब 4,896 करोड़ के प्रस्ताव

On: August 21, 2026
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FDI नियमों में बदलाव का असर, 29 विदेशी कंपनियों ने भारत में निवेश के लिए जताई रुचि
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नई दिल्ली/21 अगस्त 2026: विदेशी निवेश को लेकर भारत के बदले नियमों का असर अब जमीन पर दिखाई देने लगा है। केंद्र सरकार की ओर से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी FDI नियमों में बदलाव के बाद महज ढाई महीने के भीतर 29 विदेशी निवेश प्रस्ताव भारत के सामने आए हैं। इन प्रस्तावों की कुल राशि करीब 4,895.65 करोड़ रुपये यानी 500 मिलियन डॉलर से अधिक है।

इन निवेश प्रस्तावों में सूचना प्रौद्योगिकी (IT), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मैन्युफैक्चरिंग, फार्मा, डेटा सेंटर और ट्रांसपोर्ट सेवाओं जैसे क्षेत्रों को प्रमुखता मिली है। निवेशकों में अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, मॉरीशस, लक्जमबर्ग और केमैन आइलैंड्स जैसे देशों और क्षेत्रों से जुड़ी कंपनियां शामिल हैं।

FDI नियमों में बदलाव से कैसे आसान हुआ विदेशी निवेश?

केंद्र सरकार ने 2026 में विदेशी निवेश नीति में महत्वपूर्ण बदलाव किया। इसके तहत किसी विदेशी कंपनी में चीन या हांगकांग से जुड़ी 10 प्रतिशत तक की गैर-नियंत्रणकारी हिस्सेदारी होने पर, वह कंपनी उन क्षेत्रों में भारत में निवेश कर सकती है जहां FDI के लिए ऑटोमैटिक रूट की अनुमति है। हालांकि, इसके लिए संबंधित सेक्टर की शर्तों और अन्य नियमों का पालन करना जरूरी है।

इस बदलाव का एक अहम पहलू यह है कि केवल किसी विदेशी कंपनी में सीमित चीनी हिस्सेदारी होने के कारण अब हर निवेश के लिए पहले से सरकारी मंजूरी लेना जरूरी नहीं होगा। इससे निवेश प्रक्रिया में लगने वाला समय और नियामकीय अनिश्चितता कम होने की उम्मीद है।

हालांकि, यह छूट चीन, हांगकांग या भारत से जमीन साझा करने वाले अन्य देशों में पंजीकृत कंपनियों पर लागू नहीं होती। ऐसी संस्थाओं के लिए पहले की तरह सरकारी मंजूरी से जुड़े नियम प्रभावी हैं।

2020 के नियमों से कितना अलग है नया ढांचा?

कोविड-19 महामारी के शुरुआती दौर में अप्रैल 2020 में भारत ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति में बदलाव करते हुए जमीन से सटे देशों से आने वाले निवेश पर सरकारी निगरानी बढ़ा दी थी। उस समय ऐसे देशों से जुड़े निवेशकों के लिए कई मामलों में सरकारी मंजूरी अनिवार्य हो गई थी।

अब सरकार ने निवेशक इकाई के ‘Beneficial Ownership’ पर ज्यादा स्पष्ट व्यवस्था बनाई है। नए प्रावधानों में गैर-नियंत्रणकारी लैंड बॉर्डर कंट्री (LBC) लाभकारी स्वामित्व 10 प्रतिशत तक होने पर निर्धारित शर्तों के साथ ऑटोमैटिक रूट की अनुमति दी गई है। संबंधित निवेश की जानकारी की रिपोर्टिंग भी जरूरी होगी।

IT, AI और डेटा सेंटर में निवेश की बढ़ी रुचि

नए नियमों के बाद सामने आए 29 प्रस्तावों का दायरा केवल एक-दो क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। सूचना प्रौद्योगिकी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सूचना एवं संचार, मैन्युफैक्चरिंग, फार्मास्युटिकल्स, डेटा सेंटर और परिवहन सेवाओं में निवेश की योजनाएं सामने आई हैं।

यह बदलाव ऐसे समय आया है जब भारत वैश्विक कंपनियों के लिए टेक्नोलॉजी, मैन्युफैक्चरिंग और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का बड़ा केंद्र बनने की कोशिश कर रहा है। खासकर AI और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में बड़ी पूंजी के साथ तकनीक और विशेषज्ञता का आना घरेलू इकोसिस्टम को भी प्रभावित कर सकता है।

अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया की कंपनियां भी आगे

इन प्रस्तावों में केवल चीन से जुड़े निवेशकों की भूमिका नहीं है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार निवेश प्रस्ताव अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, मॉरीशस, लक्जमबर्ग और केमैन आइलैंड्स जैसे विभिन्न क्षेत्रों में स्थित निवेशक इकाइयों से आए हैं।

यानी नियमों में बदलाव का असर व्यापक निवेश समुदाय पर पड़ता दिखाई दे रहा है। निवेशकों के लिए सबसे बड़ा फायदा नियामकीय स्पष्टता और कुछ मामलों में सरकारी मंजूरी की आवश्यकता खत्म होना है।

सरकार को क्यों बदलने पड़े FDI नियम?

विदेशी निवेश के मामले में सबसे बड़ी चुनौती अक्सर केवल पूंजी जुटाना नहीं होती, बल्कि निवेश प्रक्रिया को समयबद्ध और अनुमान योग्य बनाना भी होती है। किसी सौदे में हिस्सेदारी छोटी हो, लेकिन निवेशक की संरचना में किसी ऐसे देश की पूंजी जुड़ी हो जिसके लिए अतिरिक्त जांच जरूरी है, तो मंजूरी की प्रक्रिया लंबी हो सकती है।

नए ढांचे में सरकार ने इसी अंतर को दूर करने की कोशिश की है। छोटे और गैर-नियंत्रणकारी विदेशी स्वामित्व को अलग तरीके से देखने से निवेश प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल हो सकती है, जबकि बड़े या नियंत्रित स्वामित्व पर निगरानी बरकरार रहती है।

FDI बढ़ाने के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा का संतुलन

सरकार का रुख पूरी तरह नियमों को हटाने का नहीं है। नए प्रावधानों में 10 प्रतिशत की सीमा, लाभकारी स्वामित्व की पहचान और सेक्टर-विशिष्ट शर्तों को बनाए रखा गया है। चीन, हांगकांग और अन्य भूमि-सीमा साझा करने वाले देशों में पंजीकृत कंपनियों को इस छूट से बाहर रखा गया है।

इसका मतलब साफ है—भारत विदेशी पूंजी के लिए रास्ता आसान करना चाहता है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक क्षेत्रों से जुड़े जोखिमों को नजरअंदाज नहीं करना चाहता।

निवेश प्रस्तावों से क्या संकेत मिल रहे हैं?

29 प्रस्तावों में करीब 4,895.65 करोड़ रुपये की निवेश राशि सामने आना इस बात का शुरुआती संकेत है कि नियामकीय स्पष्टता का निवेशकों पर असर पड़ रहा है। सरकार का मानना है कि इस तरह के बदलाव आगे और निवेश आकर्षित कर सकते हैं।

हालांकि, इन प्रस्तावों को वास्तविक निवेश में बदलने में अभी प्रक्रिया, अनुपालन और परियोजना क्रियान्वयन जैसे कई चरण बाकी हैं। इसलिए इसे तत्काल बड़े FDI उछाल के बजाय नीति बदलाव की शुरुआती प्रतिक्रिया के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा।

फिलहाल तस्वीर यह है कि भारत ने निवेश नियमों में संतुलित ढील देकर एक तरफ विदेशी कंपनियों के लिए रास्ता आसान किया है, तो दूसरी तरफ संवेदनशील निवेश पर सरकारी निगरानी का ढांचा भी बरकरार रखा है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन 29 प्रस्तावों में से कितने वास्तविक निवेश में बदलते हैं और इससे देश में रोजगार, तकनीक तथा उत्पादन क्षमता को कितना लाभ मिलता है।

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