नई दिल्ली/29 अगस्त 2026: जमीन-जायदाद से जुड़े विवादों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि राजस्व अभिलेख में किसी व्यक्ति का नाम दर्ज हो जाने या हट जाने मात्र से संपत्ति का मालिकाना हक अपने आप पैदा या खत्म नहीं होता। नामांतरण मुख्य रूप से राजस्व संबंधी उद्देश्यों के लिए किया जाता है और इसे स्वामित्व का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने 20 अगस्त 2026 को मध्य प्रदेश से जुड़े एक जमीन विवाद में यह टिप्पणी की। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अचल संपत्ति पर वास्तविक स्वामित्व का निर्धारण करने का अधिकार दीवानी अदालत के पास बना रहता है।
राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण से नहीं बदलता मालिकाना हक
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजस्व अभिलेख में दर्ज प्रविष्टि स्वामित्व का अनुसरण करती है, उसका निर्माण नहीं करती। यानी किसी व्यक्ति का नाम खसरा, खतौनी या अन्य राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज हो जाने से वह अपने आप संपत्ति का मालिक नहीं बन जाता। इसी तरह किसी व्यक्ति का नाम रिकॉर्ड से हट जाने भर से उसका वैध स्वामित्व समाप्त नहीं माना जा सकता।
पीठ ने कहा कि नायब तहसीलदार का आदेश राजस्व अभिलेखों को नियंत्रित या व्यवस्थित कर सकता है, लेकिन केवल एक व्यक्ति की जगह दूसरे व्यक्ति का नाम दर्ज कर देना स्वामित्व के हस्तांतरण या अधिकारों के त्याग के बराबर नहीं हो सकता।
यह अंतर जमीन के मामलों में खासा महत्वपूर्ण है। अक्सर राजस्व रिकॉर्ड में हुए बदलाव को ही लोग मालिकाना हक का अंतिम आधार मान लेते हैं, जबकि अदालत ने दोहराया है कि दोनों चीजें अलग-अलग हैं।
मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 117 का भी जिक्र
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 117 के तहत राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज प्रविष्टियों की शुद्धता को लेकर मौजूद वैधानिक अनुमान पर भी विचार किया।
अदालत के मुताबिक यह अनुमान केवल खंडनीय साक्ष्यगत अनुमान है। इसका मतलब यह है कि रिकॉर्ड में दर्ज प्रविष्टि को सही माना जा सकता है, लेकिन उपलब्ध दूसरे साक्ष्यों के आधार पर इस अनुमान को चुनौती दी जा सकती है।
पीठ ने साफ किया कि इस अनुमान को संपत्ति के मालिकाना हक का अनुमान नहीं माना जा सकता। राजस्व रिकॉर्ड की प्रविष्टि का मूल्यांकन मामले में मौजूद अन्य दस्तावेजों और साक्ष्यों के साथ मिलाकर किया जाना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का फैसला किया रद्द
यह मामला इंदौर के कनाड़िया गांव की कृषि भूमि और उस पर बने मकान से जुड़ा था। संपत्ति मूल रूप से भगवान सिंह के नाम थी। उनकी मृत्यु के बाद उनके दो बेटों रामप्रसाद और वासुदेव के नाम राजस्व रिकॉर्ड में संयुक्त रूप से दर्ज किए गए थे।
बाद में रामप्रसाद का नाम रिकॉर्ड से हटा दिया गया और संपत्ति के अलग-अलग हिस्से वासुदेव तथा उसके बेटे जसवंत के नाम दर्ज कर दिए गए।
इसके बाद रामप्रसाद के कानूनी वारिसों ने सह-स्वामित्व, बंटवारे और अलग कब्जे के अधिकार के लिए मुकदमा दायर किया। दूसरी ओर वासुदेव की ओर से दावा किया गया कि रामप्रसाद ने वर्ष 1990 में शपथपत्र, नायब तहसीलदार के सामने दिए गए बयान और बाद में लिखित सहमति के माध्यम से संपत्ति में अपना हिस्सा छोड़ दिया था।
ट्रायल कोर्ट ने इस दावे को पर्याप्त रूप से साबित नहीं माना। प्रथम अपीलीय अदालत ने भी पाया कि हिस्सा छोड़ने के दावे की पुष्टि के लिए स्वतंत्र गवाह पेश नहीं किया गया और दस्तावेजों से जुड़े साक्ष्यों में विरोधाभास था।
दोनों निचली अदालतों ने रामप्रसाद के परिवार के पक्ष में फैसला दिया। हालांकि, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 9 मई 2025 को इन निष्कर्षों को पलट दिया था।
दूसरी अपील में हाई कोर्ट की शक्ति पर भी अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि दूसरी अपील में हाई कोर्ट का अधिकार क्षेत्र सीमित होता है। केवल इसलिए कि हाई कोर्ट को उपलब्ध साक्ष्यों की कोई दूसरी व्याख्या अधिक उचित लगती है, वह निचली अदालतों के समवर्ती तथ्यात्मक निष्कर्षों को सामान्य तौर पर नहीं पलट सकता।
शीर्ष अदालत ने माना कि हाई कोर्ट ने यह मानने में गलती की कि रामप्रसाद ने विवादित संपत्ति में अपने अधिकारों का त्याग कर दिया था।
पीठ ने कहा कि अचल संपत्ति में अधिकार छोड़ने का दावा करने वाले पक्ष पर यह साबित करने की जिम्मेदारी होती है कि स्वामित्व अधिकार वास्तव में कानूनी तरीके से छोड़ा गया था। महज राजस्व रिकॉर्ड में किसी दूसरे व्यक्ति का नाम दर्ज हो जाने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पुराने स्वामी ने स्वेच्छा से अपना हिस्सा छोड़ दिया था।
रामप्रसाद के वारिसों के सह-स्वामित्व का अधिकार बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने रामप्रसाद के कानूनी वारिसों के सह-स्वामित्व के अधिकार को मान्यता दी और निचली अदालतों के फैसले को बहाल कर दिया। अदालत ने कहा कि उनके हिस्से का निर्धारण कानून के मुताबिक बंटवारे की प्रक्रिया के जरिए किया जाएगा।
साथ ही, वैध बंटवारा होने तक प्रतिवादी विवादित संपत्ति को बेच नहीं सकेंगे और न ही किसी तीसरे पक्ष के पक्ष में उसमें कोई अधिकार पैदा कर सकेंगे।
जमीन विवादों में क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण है जहां संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर राजस्व रिकॉर्ड की प्रविष्टियों को आधार बनाया जाता है। अदालत ने एक बार फिर यह अंतर रेखांकित किया है कि राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण और वास्तविक स्वामित्व दो अलग कानूनी अवधारणाएं हैं।
नामांतरण से राजस्व प्रशासन को रिकॉर्ड व्यवस्थित रखने में मदद मिलती है, लेकिन स्वामित्व का अंतिम फैसला केवल रिकॉर्ड में नाम चढ़ने या हटने से नहीं होता। संपत्ति पर अधिकार का निर्धारण संबंधित दस्तावेजों, साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर किया जाना होता है।













