नई दिल्ली,19 सितंबर 2026 (शनिवार)। पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन पर बढ़ती वैश्विक चिंता के बीच केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने सतत विकास को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया के सामने अब सवाल विकास और पर्यावरण में से किसी एक को चुनने का नहीं है, बल्कि ऐसी विकास प्रक्रिया अपनाने का है जो लंबे समय तक कायम रह सके और पर्यावरण को भी सुरक्षित रखे।
भूपेंद्र यादव शनिवार को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की ओर से आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स’ के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। सम्मेलन 19 और 20 सितंबर को आयोजित हो रहा है। इसमें 17 देशों के न्यायविद, नीति निर्माता, वैज्ञानिक, शिक्षाविद और पर्यावरण विशेषज्ञों के साथ UNEP और एशियाई विकास बैंक (ADB) जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए हैं।
सतत विकास को अपनाने पर भूपेंद्र यादव का जोर
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं हैं। इनका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। ऐसे में विकास और पर्यावरण को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय दोनों के बीच संतुलन कायम करना जरूरी है।
यादव ने कहा कि दुनिया के सामने विकल्प “विकास बनाम पर्यावरण” का नहीं, बल्कि सतत विकास और ऐसे विकास के बीच है जिसे लंबे समय तक कायम नहीं रखा जा सकता। उनके मुताबिक आर्थिक प्रगति के साथ जलवायु कार्रवाई को आगे बढ़ाना संभव है और भारत इसी दिशा में अपने प्रयास कर रहा है।
गैर-जीवाश्म ऊर्जा की हिस्सेदारी 54.18 प्रतिशत
केंद्रीय मंत्री ने भारत के जलवायु लक्ष्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि देश 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि देश की स्थापित विद्युत क्षमता में गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों की हिस्सेदारी बढ़कर 54.18 प्रतिशत हो गई है। यह आंकड़ा 2030 के लिए तय 50 प्रतिशत के लक्ष्य से अधिक है।
यादव के अनुसार भारत नवीकरणीय ऊर्जा की स्थापित क्षमता के मामले में दुनिया में तीसरे स्थान पर है, जबकि सौर ऊर्जा के विकास के लिहाज से वह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। उन्होंने इसे आर्थिक विकास और जलवायु कार्रवाई के साथ-साथ आगे बढ़ने का उदाहरण बताया।
वन और वन्यजीव संरक्षण का भी किया जिक्र
भूपेंद्र यादव ने भारत में वन और वन्यजीव संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि संरक्षण का दायरा केवल वन्यजीवों को बचाने तक सीमित नहीं है। इसके साथ उस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा जुड़ी है, जिस पर मानव जीवन भी निर्भर करता है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत का वन और वृक्ष आवरण अब 8.27 लाख वर्ग किलोमीटर तक पहुंच गया है। पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (UN FAO) की Global Forest Resources Assessment 2025 रिपोर्ट में भारत वार्षिक शुद्ध वन क्षेत्र वृद्धि के मामले में दुनिया में तीसरे स्थान पर रहा है।
संरक्षण और विकास में संतुलन जरूरी: सीजेआई सूर्यकांत
सम्मेलन में भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने भी पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अदालतों के सामने चुनौती अब केवल यह तय करना नहीं है कि संरक्षण और विकास में से किसे प्राथमिकता दी जाए, बल्कि दोनों को साथ लेकर चलने का रास्ता तलाशना है।
सीजेआई ने पर्यावरणीय संरक्षण को प्रभावी बनाए रखने के साथ उसे व्यावहारिक और वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप रखने की जरूरत बताई। उन्होंने पर्यावरण अधिकारों से आगे बढ़कर जलवायु अधिकारों पर बढ़ते विमर्श का भी उल्लेख किया।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभाव नागरिकों के समानता, आजीविका और स्वास्थ्य से जुड़े मौलिक अधिकारों को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने जलवायु परिवर्तन जैसी सीमा-पार चुनौती से निपटने के लिए न्यायिक समझ, वैज्ञानिक ज्ञान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को जरूरी बताया।
पीएम मोदी ने लॉन्च किया NGT मोबाइल एप
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद रहे। उन्होंने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) का मोबाइल एप लॉन्च किया। इसका उद्देश्य एनजीटी की डिजिटल सेवाओं तक पहुंच को और आसान बनाना है।
दो दिवसीय सम्मेलन में पर्यावरण और जलवायु शासन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चार तकनीकी सत्र रखे गए हैं। इनमें जलवायु न्याय, समानता एवं समावेशन, पर्यावरण कानून एवं शासन, टिकाऊ शहर, ऊर्जा संक्रमण, हरित बुनियादी ढांचा और ग्रीन फाइनेंस जैसे मुद्दों पर चर्चा हो रही है।












