नई दिल्ली (28 सितंबर 2026)। शहीद-ए-आजम भगत सिंह की जयंती पर देश उन्हें नमन कर रहा है। उनकी शहादत, विचारों और आजादी की लड़ाई में योगदान को याद करने के साथ उनकी जिंदगी पर बनी फिल्मों की चर्चा भी होती है। हिंदी सिनेमा में भगत सिंह का किरदार कई कलाकारों ने पर्दे पर निभाया है, लेकिन वर्ष 2002 का दौर खास रहा। उस साल भगत सिंह के जीवन पर बनी तीन फिल्में महज एक सप्ताह के अंतराल में रिलीज हुईं और बॉक्स ऑफिस पर एक-दूसरे से मुकाबला करती नजर आईं।
इन फिल्मों में ‘शहीद-ए-आजम’, ’23 मार्च 1931: शहीद’ और ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’ शामिल थीं। दिलचस्प बात यह रही कि व्यावसायिक स्तर पर तीनों फिल्मों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली, लेकिन द लीजेंड ऑफ भगत सिंह को राष्ट्रीय पुरस्कारों सहित कई सम्मान मिले।
शहीद भगत सिंह पर पहली फिल्म कब बनी?
भगत सिंह की शहादत के करीब 23 साल बाद, 1954 में अभिनेता प्रेम अदीब ने फिल्म शहीदे-आजम में उनका किरदार निभाया था। जगदीश गौतम के निर्देशन में बनी इस फिल्म को भगत सिंह के जीवन पर केंद्रित शुरुआती फीचर फिल्मों में गिना जाता है।
इसके बाद 1965 में मनोज कुमार ने भगत सिंह के जीवन पर शहीद बनाई। फिल्म में उन्होंने भगत सिंह की भूमिका निभाई थी। फिल्म को तीन राष्ट्रीय पुरस्कार मिले और भगत सिंह की कहानी को बड़े पर्दे पर व्यापक दर्शकों तक पहुंचाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
साल 2002 में भगत सिंह पर आईं तीन फिल्में
इसके बाद 2002 में भगत सिंह के जीवन पर तीन फिल्में रिलीज हुईं। खास बात यह थी कि इनके बीच रिलीज का अंतर बहुत कम था।
सबसे पहले 31 मई 2002 को शहीद-ए-आजम सिनेमाघरों में आई। सुकुमार नायर के निर्देशन में बनी इस फिल्म में सोनू सूद ने भगत सिंह की भूमिका निभाई थी।
इसके ठीक एक सप्ताह बाद, 7 जून 2002 को दो फिल्में एक साथ रिलीज हुईं। इनमें पहली थी 23 मार्च 1931: शहीद, जिसमें बॉबी देओल ने भगत सिंह का किरदार निभाया था। फिल्म में उनके भाई सनी देओल ने चंद्रशेखर आजाद की भूमिका निभाई। इसका निर्देशन गुड्डू धनोआ ने किया था और निर्माण धर्मेंद्र से जुड़ा था।
उसी दिन राजकुमार संतोषी के निर्देशन में बनी द लीजेंड ऑफ भगत सिंह भी रिलीज हुई। इसमें अजय देवगन ने भगत सिंह की भूमिका निभाई थी।
एक ही दिन रिलीज हुईं दो भगत सिंह वाली फिल्में
7 जून 2002 का दिन हिंदी सिनेमा के लिए इसलिए भी दिलचस्प रहा क्योंकि भगत सिंह के जीवन पर बनी दो बड़ी फिल्में एक ही दिन दर्शकों के सामने आईं।
एक तरफ बॉबी देओल अभिनीत 23 मार्च 1931: शहीद थी, वहीं दूसरी ओर अजय देवगन की द लीजेंड ऑफ भगत सिंह। दोनों फिल्मों में एक ही ऐतिहासिक व्यक्तित्व की कहानी को अलग-अलग सिनेमाई नजरिए से पेश किया गया।
द लीजेंड ऑफ भगत सिंह बॉक्स ऑफिस पर बड़ी व्यावसायिक सफलता हासिल नहीं कर सकी, लेकिन बाद में इसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। फिल्म को दो राष्ट्रीय पुरस्कार मिले—सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म और अजय देवगन को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार।
सनी देओल को ऑफर हुआ था भगत सिंह का किरदार
द लीजेंड ऑफ भगत सिंह से जुड़ी सबसे दिलचस्प बात इसकी कास्टिंग को लेकर है। बताया जाता है कि निर्देशक राजकुमार संतोषी ने शुरुआत में भगत सिंह की भूमिका के लिए सनी देओल से संपर्क किया था।
हालांकि, सनी देओल ने यह भूमिका स्वीकार नहीं की। इसके बाद संतोषी ने आमिर खान से संपर्क किया। आमिर खान ने भी कथित तौर पर उम्र का हवाला देते हुए भगत सिंह की भूमिका निभाने से इनकार कर दिया।
इसके बाद आखिरकार यह भूमिका अजय देवगन के पास पहुंची और उन्होंने इसे पर्दे पर निभाया। उनके अभिनय को बाद में राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
बॉबी देओल को लेने पर क्यों नहीं बनी बात?
कहानी का एक और दिलचस्प पहलू सनी देओल से जुड़ा था। बताया जाता है कि सनी देओल ने राजकुमार संतोषी से अपने भाई बॉबी देओल को भगत सिंह की भूमिका में लेने का सुझाव दिया था। हालांकि, संतोषी इसके लिए तैयार नहीं हुए।
इसके बाद दोनों के बीच मतभेद की बात सामने आई और लंबे समय तक सनी देओल तथा राजकुमार संतोषी ने साथ काम नहीं किया। दूसरी ओर, बॉबी देओल ने इसी दौर में 23 मार्च 1931: शहीद में भगत सिंह की भूमिका निभाई।
इस तरह 2002 में भगत सिंह की कहानी सिर्फ तीन फिल्मों के एक साथ पर्दे पर आने की वजह से ही चर्चा में नहीं रही, बल्कि इन फिल्मों से जुड़ी कास्टिंग और कलाकारों के फैसलों ने भी इसे हिंदी सिनेमा के यादगार फिल्मी अध्यायों में शामिल कर दिया।













