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क्या चुनाव चिह्न पर हक उनका होना चाहिए जिन्होंने किया ‘संवैधानिक पाप’? शिवसेना विवाद में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

On: October 6, 2026
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शिवसेना विवाद में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
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नई दिल्ली/6 अक्टूबर 2026: शिवसेना के चुनाव चिह्न को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर अहम मोड़ पर पहुंची। अदालत ने सुनवाई के दौरान यह गंभीर सवाल उठाया कि अगर किसी गुट के विधायक दलबदल के आरोप में अयोग्यता की कार्यवाही का सामना कर रहे हैं, तो क्या पार्टी का चुनाव चिह्न उसी गुट को मिलना चाहिए। न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने सवाल को ‘संवैधानिक पाप’ के संदर्भ में रखा।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ में न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं। पीठ शिवसेना में 2022 में हुए विभाजन से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। इनमें उद्धव ठाकरे गुट की ओर से निर्वाचन आयोग के उस फैसले को चुनौती भी शामिल है, जिसमें एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना माना गया और धनुष-बाण चुनाव चिह्न आवंटित किया गया था।

शिवसेना चुनाव चिह्न विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने क्या पूछा?

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने सवाल उठाया कि चुनाव चिह्न से जुड़ी भावना आखिर किस पक्ष के पक्ष में जानी चाहिए—उन लोगों के लिए जिन्होंने कथित तौर पर दलबदल किया या उन लोगों के लिए जिन्होंने इस संवैधानिक उल्लंघन की शिकायत की?

अदालत का सवाल केवल किसी एक गुट की संख्या तक सीमित नहीं था। पीठ यह भी परख रही है कि निर्वाचन आयोग द्वारा विधायी बहुमत को मुख्य आधार बनाकर असली राजनीतिक दल तय करना कितना उचित था, खासकर तब जब उन्हीं विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही लंबित रही हो।

अदालत पहले भी यह सवाल उठा चुकी है कि यदि दोनों गुटों में से किसी को भी स्पष्ट रूप से आरक्षित चुनाव चिह्न का हकदार तय करना कठिन हो, तो क्या निर्वाचन आयोग दोनों पक्षों को अलग-अलग चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ने के लिए कह सकता था।

शिंदे गुट ने विधायी बहुमत के फैसले का किया बचाव

एकनाथ शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने निर्वाचन आयोग के फैसले का बचाव किया। उन्होंने तर्क दिया कि विधायी बहुमत का परीक्षण राजनीतिक दल की पहचान निर्धारित करने के लिए कानूनी रूप से इस्तेमाल किया जा सकता है।

कौल ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सुभाष देसाई मामले में संविधान पीठ के फैसले ने विधायी संख्या बल को परीक्षण के तौर पर इस्तेमाल करने पर रोक नहीं लगाई है। उनका कहना था कि प्रतिद्वंद्वी गुट सामने आने पर संबंधित संवैधानिक प्राधिकारी को यह निर्धारित करना पड़ सकता है कि वास्तविक राजनीतिक दल कौन सा गुट है।

उन्होंने यह भी दलील दी कि दलबदल के आरोप में अयोग्यता अपने आप में हमेशा पूर्व प्रभाव से लागू नहीं होती। उनके अनुसार, जब तक अयोग्यता वास्तव में निर्धारित नहीं हो जाती, तब तक संबंधित विधायकों की स्थिति को लेकर कानूनी प्रश्न बना रहता है।

क्या सिर्फ विधायकों की संख्या से तय होगी असली पार्टी?

सुनवाई का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि पार्टी की पहचान तय करने के लिए संगठनात्मक बहुमत और जमीनी समर्थन को कैसे देखा जाए।

न्यायमूर्ति बागची ने सवाल किया कि अगर किसी राजनीतिक दल का आंतरिक संविधान स्पष्ट रूप से लोकतांत्रिक संगठनात्मक ढांचा नहीं देता, तो केवल संगठन के पदाधिकारियों या सदस्यों की संख्या क्या वास्तव में जमीनी समर्थन की सही तस्वीर पेश कर सकती है।

यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि चुनाव चिह्न महज एक प्रशासनिक पहचान नहीं होता। किसी पुराने और स्थापित राजनीतिक दल का चिह्न मतदाताओं के बीच वर्षों में बनी पहचान और चुनावी स्मृति से भी जुड़ा होता है।

2019 के चुनावी आंकड़ों का भी हुआ उल्लेख

शिंदे गुट की ओर से दलील देते हुए नीरज किशन कौल ने 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के आंकड़ों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि शिंदे के समर्थन वाले 40 विधायक, 2019 में निर्वाचित शिवसेना के 55 विधायकों को मिले कुल वोटों में करीब 76 प्रतिशत वोटों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इसी तरह लोकसभा चुनाव के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि शिंदे समर्थक 13 सांसदों को पार्टी के 18 निर्वाचित सांसदों के पक्ष में पड़े वोटों में करीब 73 प्रतिशत वोट मिले थे।

हालांकि, अदालत के सामने मूल प्रश्न यही है कि क्या विधायी संख्या बल को पार्टी की वास्तविक पहचान निर्धारित करने के लिए निर्णायक आधार माना जा सकता है, विशेषकर तब जब उसी संख्या बल की संवैधानिक वैधता पर अलग कार्यवाही चल रही हो।

‘सुभाष देसाई’ फैसले का फिर आया जिक्र

सुप्रीम कोर्ट का सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष से जुड़ा 2023 का फैसला इस पूरे विवाद की संवैधानिक पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण है। उस फैसले में संविधान पीठ ने दलबदल कानून के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा था कि दसवीं अनुसूची का मकसद दलबदल को हतोत्साहित और दंडित करना है।

मौजूदा सुनवाई में शिंदे गुट की ओर से इस फैसले की व्याख्या को लेकर भी दलीलें दी गईं। अदालत ने हालांकि किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय दोनों पक्षों की संवैधानिक दलीलों को परखा।

फिलहाल सुनवाई पूरी नहीं हुई है। अदालत में बुधवार को भी दलीलें जारी रहेंगी। इसलिए मंगलवार की टिप्पणियों को अंतिम फैसला मानना उचित नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह तय नहीं किया है कि शिवसेना का चुनाव चिह्न किसके पास रहेगा।

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