नई दिल्ली/24 अक्टूबर 2026। दवा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को कथित तौर पर महंगे उपहार और दूसरे लाभ देकर अपने उत्पादों का प्रचार करने के मामले में केंद्र सरकार ने निगरानी व्यवस्था की समीक्षा शुरू कर दी है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद सरकार ने फार्मा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों और उनसे जुड़े नियमों की प्रभावशीलता जांचने के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की है। इस पहल का उद्देश्य दवा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग पर अंकुश लगाने, नियामक व्यवस्था को मजबूत करने और मरीजों के हितों की रक्षा के लिए जरूरी उपाय सुझाना है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद फार्मा कंपनियों पर निगरानी की तैयारी
केंद्र सरकार ने नीति आयोग के सदस्य डॉ. एम. श्रीनिवास की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति बनाई है। इसमें पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव प्रीति सूदन और मेदांता के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक डॉ. नरेश त्रेहन को भी शामिल किया गया है।
समिति का गठन ऐसे समय हुआ है, जब फार्मा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों और डॉक्टरों को कथित प्रलोभन दिए जाने को लेकर कानूनी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 8 अक्टूबर 2026 के आदेश में केंद्र सरकार को दो सप्ताह के भीतर एक समिति गठित कर मौजूदा कानूनी और नियामक व्यवस्था की व्यापक समीक्षा कराने का निर्देश दिया था।
सरकार ने इसके बाद समिति के गठन का आदेश जारी किया। अब समिति यह आकलन करेगी कि दवा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों को नियंत्रित करने वाले मौजूदा नियम कितने प्रभावी हैं और उनकी निगरानी तथा अनुपालन व्यवस्था में कहां सुधार की जरूरत है।
समिति किन मुद्दों की करेगी समीक्षा?
समिति को फार्मा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों से जुड़े विभिन्न पहलुओं की व्यापक समीक्षा करने की जिम्मेदारी दी गई है। इसमें अनैतिक प्रचार के आरोपों के साथ-साथ मौजूदा निगरानी तंत्र की कार्यप्रणाली भी शामिल होगी।
समिति मुख्य रूप से इन विषयों पर विचार करेगी:
- नियमों की प्रभावशीलता: दवा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों को नियंत्रित करने वाले मौजूदा कानूनी और नियामक प्रावधान कितने कारगर हैं।
- निगरानी व्यवस्था: अनैतिक मार्केटिंग की पहचान करने, उसकी जांच करने और नियमों का पालन सुनिश्चित करने के मौजूदा तंत्र में क्या कमियां हैं।
- पारदर्शिता और जवाबदेही: कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों में पारदर्शिता बढ़ाने और नियमों के उल्लंघन पर जवाबदेही तय करने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं।
- नियामक सुधार: मौजूदा व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए किन नए उपायों या बदलावों की जरूरत है।
समिति जरूरत के मुताबिक संबंधित विभागों, तकनीकी विशेषज्ञों, चिकित्सा क्षेत्र के पेशेवरों, संस्थानों और अन्य हितधारकों से भी विचार-विमर्श कर सकती है।
दो महीने में देनी होगी सिफारिशें
समिति को अपनी पहली बैठक की तारीख से दो महीने के भीतर औषधि विभाग को सिफारिशें सौंपनी होंगी। इसके बाद केंद्र सरकार समिति की रिपोर्ट पर विचार करेगी और आगे की कार्रवाई के संबंध में निर्णय लेगी।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, केंद्र सरकार को समिति की सिफारिशों और उन पर लिए गए निर्णय की जानकारी हलफनामे के माध्यम से अदालत के समक्ष रखनी होगी।
इस मामले में अगली सुनवाई 29 जनवरी 2027 को निर्धारित है। ऐसे में समिति की रिपोर्ट और उसके आधार पर सरकार की ओर से उठाए जाने वाले कदम महत्वपूर्ण होंगे।
डॉक्टरों को उपहार देने वाली कंपनियों पर कार्रवाई का मुद्दा
इस मामले की जड़ में दवा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को कथित तौर पर महंगे उपहार, आर्थिक लाभ और अन्य सुविधाएं देकर अपने उत्पादों को बढ़ावा देने का आरोप है। याचिकाकर्ता का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में डॉक्टरों पर लागू होने वाले नियमों और कंपनियों की जवाबदेही के बीच असमानता है।
फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया की याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि प्रभावी वैधानिक व्यवस्था बनने तक फार्मा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग पर नियंत्रण के लिए उचित दिशा-निर्देश तय किए जाएं।
याचिका में यह सवाल भी उठाया गया है कि यदि किसी डॉक्टर द्वारा अनुचित लाभ स्वीकार करने पर कार्रवाई का प्रावधान है, तो ऐसे लाभ देने वाली कंपनियों की जवाबदेही तय करने के लिए भी प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए।
इस मुद्दे पर अंतिम कानूनी स्थिति समिति की समीक्षा, सरकार के फैसले और न्यायालय की आगे की कार्यवाही से स्पष्ट होगी।
अनैतिक मार्केटिंग का असर मरीजों की जेब पर कैसे पड़ सकता है?
फार्मा कंपनियों की मार्केटिंग को लेकर होने वाली बहस केवल डॉक्टरों और दवा निर्माताओं तक सीमित नहीं है। इसका संबंध सीधे मरीजों के इलाज और दवाओं के खर्च से भी है।
यदि दवा के चयन में चिकित्सकीय जरूरत के बजाय अनुचित व्यावसायिक प्रोत्साहन प्रभाव डालते हैं, तो मरीजों को ऐसी दवाएं लिखे जाने का जोखिम हो सकता है जो उनके लिए सबसे उपयुक्त या किफायती विकल्प न हों। हालांकि, किसी विशेष दवा के महंगे होने या लिखे जाने का कारण केवल मार्केटिंग गतिविधियों को नहीं माना जा सकता; इसके लिए मामले के तथ्यों और चिकित्सकीय परिस्थितियों को देखना जरूरी है।
इसी वजह से पारदर्शी मार्केटिंग, डॉक्टरों की पेशेवर स्वतंत्रता और कंपनियों की जवाबदेही को स्वास्थ्य व्यवस्था के महत्वपूर्ण पहलुओं के रूप में देखा जाता है।
अब समिति की रिपोर्ट पर टिकी निगाहें
केंद्र सरकार की ओर से गठित समिति से उम्मीद है कि वह मौजूदा नियमों की कमियों की पहचान कर निगरानी व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के सुझाव देगी। हालांकि, समिति की सिफारिशें आने और सरकार के निर्णय के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि फार्मा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए किस तरह के ठोस बदलाव किए जाएंगे।
फिलहाल, इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या प्रस्तावित समीक्षा से दवा कंपनियों की जवाबदेही मजबूत होगी और मरीजों के हितों की सुरक्षा के लिए अधिक प्रभावी व्यवस्था तैयार हो सकेगी।
नोट: समिति का गठन अपने आप में नए दंडात्मक प्रावधान लागू होने का संकेत नहीं है। वास्तविक बदलाव समिति की सिफारिशों, सरकार के निर्णय और लागू कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेंगे।










