कानपुर/नई दिल्ली (08 फ़रवरी 2026)। कानपुर नगर निगम निष्कासन विवाद अब स्थानीय दायरे से निकलकर दिल्ली तक जा पहुँचा है। नगर निगम के तीन निष्कासित पार्षद रविवार को दिल्ली स्थित आवास पर देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मिले और अपने साथ हुई कार्रवाई पर आपत्ति दर्ज कराई। पार्षदों का आरोप है कि उन्हें चार सदनों के लिए राजनीतिक दबाव में निष्कासित किया गया, जबकि वे नगरहित के मुद्दे उठा रहे थे।
मुलाकात के दौरान पार्षद पवन गुप्ता ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए महापौर प्रमिला पांडेय पर विकास कार्यों में उदासीनता का आरोप लगाया। उनका कहना था कि जनहित से जुड़े प्रस्तावों को व्यवस्थित तरीके से रोका जा रहा है और असहमति जताने वाले पार्षदों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा रही है।
पार्षदों ने यह भी आरोप लगाया कि पार्षद वेलफेयर के गठन जैसे मुद्दों पर नियमों की अनदेखी हो रही है, जिसका उन्होंने विरोध किया। उनके साथ इस मुलाकात में पार्षद लक्ष्मी कोरी और विकास जायसवाल भी मौजूद रहे।
ज्ञापन लेने से इनकार, संगठन स्तर पर रखने को कहा
सूत्रों के अनुसार, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पार्षदों की बात सुनी, लेकिन कोई औपचारिक ज्ञापन लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यह मामला संगठन और प्रदेश स्तर पर रखा जाए। पार्षदों को सलाह दी गई कि वे भाजपा के प्रदेश नेतृत्व से मिलकर अपनी शिकायतें दर्ज कराएं।
रक्षा मंत्री ने पार्षदों को पंकज चौधरी (भाजपा प्रदेश अध्यक्ष) से मिलने का निर्देश दिया, ताकि प्रकरण का समाधान पार्टी संगठन के भीतर से निकाला जा सके।
आरोप: भ्रष्टाचार, भेदभाव और प्रशासनिक हस्तक्षेप
पार्षदों का कहना है कि नगर निगम में विकास कार्यों को लेकर भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया जा रहा है। उन्होंने कथित भ्रष्टाचार और प्रशासनिक हस्तक्षेप की भी शिकायत की। पार्षद पवन गुप्ता के मुताबिक, “नगरहित के मुद्दे उठाना ही हमारे निष्कासन का कारण बन गया।”
तीनों पार्षदों ने बताया कि वे सोमवार को दिल्ली में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष से मुलाकात कर पूरे घटनाक्रम का विवरण देंगे। उनका मानना है कि संगठन स्तर पर सुनवाई होने से स्थिति स्पष्ट होगी।
कानपुर की सियासत में बढ़ी हलचल
कानपुर नगर निगम निष्कासन विवाद के दिल्ली तक पहुंचने से स्थानीय राजनीति में सरगर्मी बढ़ गई है। अब नजर इस बात पर टिकी है कि प्रदेश नेतृत्व इस मामले में क्या रुख अपनाता है। फिलहाल, महापौर या नगर निगम प्रशासन की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
यह प्रकरण नगर निकाय की कार्यप्रणाली, पार्षदों की भूमिका और संगठनात्मक अनुशासन के बीच संतुलन की बहस को भी सामने ला रहा है।








