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Delimitation: क्या होता है परिसीमन, जो बदल सकता है लोकसभा सीटों का पूरा गणित?

On: April 15, 2026
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Delimitation- क्या होता है परिसीमन
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नई दिल्ली, 15 अप्रैल 2026। देश की राजनीति एक बार फिर एक ऐसे मुद्दे के इर्द-गिर्द सिमटती दिख रही है, जो आम जनता को तकनीकी लग सकता है, लेकिन इसके असर सीधे सत्ता के केंद्र तक जाते हैं—यह मुद्दा है Delimitation यानी परिसीमन

केंद्र सरकार लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने और महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण देने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। जैसे ही यह चर्चा तेज हुई, Delimitation बहस के केंद्र में आ गया—और इसके साथ ही सत्ता संतुलन को लेकर नई राजनीतिक सरगर्मियां भी शुरू हो गईं।

Delimitation क्या है और क्यों इतना अहम है?

सरल शब्दों में कहें तो Delimitation वह प्रक्रिया है, जिसके तहत देश के निर्वाचन क्षेत्रों (constituencies) की सीमाएं दोबारा तय की जाती हैं।

इसका मतलब सिर्फ नक्शा बदलना नहीं होता—बल्कि यह तय करता है कि किस राज्य को कितनी सीटें मिलेंगी और किस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कितना मजबूत होगा। यही वजह है कि इसे राजनीति का “silent game changer” भी कहा जाता है।

भारत में अब तक चार बार परिसीमन हो चुका है—1952, 1963, 1973 और 2002 में। आखिरी बार सीटों की संख्या में बड़ा बदलाव 1973 में हुआ था, जब लोकसभा सीटें 522 से बढ़कर 545 हुई थीं।

अब क्यों चर्चा में आया Delimitation?

सरकार 2011 की जनगणना को आधार बनाकर परिसीमन करने की तैयारी में है। इसके लिए संसद का विशेष सत्र 16 अप्रैल से बुलाया गया है, जहां 131वां संविधान संशोधन विधेयक और परिसीमन से जुड़े प्रावधान पेश किए जा सकते हैं।

दरअसल, 1976 में जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देने के लिए सीटों के पुनर्निर्धारण पर रोक लगा दी गई थी, जिसे बाद में 2001 और फिर 2026 तक बढ़ाया गया। अब यह रोक हटने जा रही है—यहीं से असली बदलाव की शुरुआत होगी।

प्रस्तावित बदलाव: सीटों से लेकर बहुमत तक सब बदलेगा

सरकार के प्रस्ताव के अनुसार:

  • लोकसभा सीटें 545 से बढ़कर 850 हो सकती हैं
  • राज्यों की सीटें 530 से बढ़कर 815 तक
  • केंद्र शासित प्रदेशों की सीटें 20 से बढ़कर 35 तक

इसका सीधा असर बहुमत के आंकड़े पर भी पड़ेगा—जो अभी 272 है, वह बढ़कर करीब 426 हो जाएगा।

इसके अलावा, यह भी प्रस्ताव है कि किस जनगणना को आधार बनाया जाए, इसका फैसला संसद बहुमत से कर सकेगी। फिलहाल 2011 की जनगणना को आधार बनाने की बात कही जा रही है।

उत्तर बनाम दक्षिण: राजनीतिक बहस का नया केंद्र

Delimitation को लेकर सबसे बड़ा विवाद यहीं से शुरू होता है।

विपक्ष और दक्षिण भारत के कई राज्यों का मानना है कि अगर सीटें पूरी तरह जनसंख्या के आधार पर बढ़ीं, तो उत्तर भारत के राज्यों को ज्यादा फायदा होगा।

उनका तर्क है:

  • हिंदी भाषी राज्यों की हिस्सेदारी 38% से बढ़कर 43% से अधिक हो सकती है
  • दक्षिण भारत की हिस्सेदारी 24% से घटकर करीब 21% रह सकती है

वहीं सरकार का कहना है कि सभी राज्यों में लगभग 50% सीटें बढ़ाई जाएंगी, ताकि संतुलन बना रहे और किसी के साथ अन्याय न हो।

परिसीमन आयोग: कैसे होता है पूरा प्रोसेस?

Delimitation लागू करने के लिए केंद्र सरकार एक परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) का गठन करती है।

इस आयोग की खासियत यह है कि इसके फैसले अंतिम होते हैं—

  • इन्हें अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती
  • संसद या विधानसभा भी इनमें बदलाव नहीं कर सकती

आयोग के अध्यक्ष आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश होते हैं। इसके साथ मुख्य चुनाव आयुक्त और राज्य चुनाव आयुक्त भी सदस्य होते हैं।

प्रक्रिया में मसौदा तैयार करना, जनता से सुझाव लेना, जनसुनवाई करना और फिर अंतिम आदेश जारी करना शामिल होता है—जिसमें करीब 1.5 से 2 साल का समय लग सकता है।

आखिर क्यों इतना बड़ा मुद्दा है Delimitation?

Delimitation सिर्फ सीटों की संख्या नहीं बदलता—यह देश की राजनीतिक दिशा तय करता है।

यह तय करता है कि किस राज्य की आवाज संसद में कितनी मजबूत होगी, किस क्षेत्र को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलेगा और अंततः कौन सत्ता के करीब पहुंचेगा।

यही कारण है कि जैसे-जैसे 2026 नजदीक आ रहा है, Delimitation एक तकनीकी प्रक्रिया से निकलकर देश की सबसे बड़ी राजनीतिक बहस बनता जा रहा है।

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