लखनऊ (27 अप्रैल 2026)। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत की राजनीति में अपनी सक्रिय मौजूदगी दर्ज कराते हुए असम और पश्चिम बंगाल में कुल 27 जनसभाएं और रोड शो किए। यह अभियान केवल संख्या का खेल नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक सुनियोजित सीएम योगी चुनाव प्रचार रणनीति स्पष्ट रूप से दिखाई दी—जहां शहरी और ग्रामीण दोनों वर्गों को साधने की कोशिश की गई।
तीन अप्रैल को असम से शुरू हुआ यह प्रचार अभियान सोमवार को पश्चिम बंगाल में समाप्त हुआ। आखिरी दिन भी उनकी सक्रियता कम नहीं हुई—दो जनसभाएं और दो रोड शो के जरिए उन्होंने चुनावी माहौल को अपने पक्ष में करने की कोशिश जारी रखी।
असम से शुरुआत, बंगाल में तेज हुआ अभियान
इस अभियान की शुरुआत असम के सोनितपुर (बरछला) और बारपेटा से हुई। शुरुआती सभाओं में ही उन्होंने स्थानीय मुद्दों को उठाते हुए अपनी बात रखने की कोशिश की, जिससे माहौल बनाने की रणनीति साफ झलकती है। इसके बाद 12 अप्रैल से पश्चिम बंगाल में प्रचार ने रफ्तार पकड़ी।
पूर्व मेदिनीपुर, बांकुड़ा, पश्चिम बर्धमान और वीरभूम जैसे जिलों में लगातार सभाएं कर उन्होंने संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने का प्रयास किया। इन क्षेत्रों में उनकी मौजूदगी सिर्फ औपचारिक नहीं रही, बल्कि भाषणों में स्थानीय संदर्भों को शामिल कर उन्होंने जुड़ाव बनाने की कोशिश की।
शहरी और ग्रामीण दोनों पर फोकस
18 अप्रैल को उत्तर बंगाल के कूच बिहार और जलपाईगुड़ी के साथ बांकुड़ा में कार्यक्रमों ने उनके अभियान को भौगोलिक विस्तार दिया। वहीं 20 अप्रैल को पश्चिम मेदिनीपुर और पुरुलिया में जनसभाओं के जरिए ग्रामीण इलाकों को साधने का प्रयास किया गया।
इसके बाद 22 अप्रैल को हावड़ा, नदिया और कोलकाता जैसे शहरी क्षेत्रों में सभाएं कर उन्होंने स्पष्ट संकेत दिया कि सीएम योगी चुनाव प्रचार रणनीति केवल ग्रामीण वोट बैंक तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरी मतदाताओं को भी बराबर महत्व दिया जा रहा है। यही संतुलन उनके पूरे अभियान की खासियत रहा।
अंतिम चरण में रोड शो और लक्षित सीटों पर ध्यान
25 अप्रैल को कटवा, नबाद्वीप और बगदा में कार्यक्रमों के जरिए अभियान जारी रहा। वहीं अंतिम दिन उत्तर 24 परगना के कल्याणी और दमदम विधानसभा क्षेत्रों में रोड शो कर उन्होंने सीधा जनसंपर्क साधा। हुगली के धानेखाली और राजारहाट गोपालपुर में जनसभाओं के जरिए प्रचार का समापन किया गया।
पूरे दौरे में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया—अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आरक्षित सीटों पर विशेष फोकस। यह संकेत देता है कि चुनावी रणनीति केवल व्यापक स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर भी तैयार की गई थी।
राजनीतिक संकेत और असर
अगर इस पूरे अभियान को एक फ्रेम में देखा जाए, तो यह साफ होता है कि योगी आदित्यनाथ ने असम और पश्चिम बंगाल में अपने प्रचार के जरिए पार्टी की पकड़ मजबूत करने के साथ-साथ एक व्यापक संदेश देने की कोशिश की है।
शहरी-ग्रामीण संतुलन, क्षेत्रीय विविधता और आरक्षित सीटों पर विशेष ध्यान—ये सभी पहलू सीएम योगी चुनाव प्रचार रणनीति को एक बहुआयामी और सुनियोजित अभियान के रूप में सामने लाते हैं। अब देखना यह होगा कि यह रणनीति चुनावी नतीजों में कितनी प्रभावी साबित होती है।








