नई दिल्ली/08 अगस्त 2026: केंद्र सरकार न्यायाधिकरणों में अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति व्यवस्था को नए सिरे से व्यवस्थित करने की तैयारी में है। प्रस्तावित कानून के तहत राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग बनाया जाएगा, जिसमें न्यायिक और तकनीकी विशेषज्ञ शामिल होंगे। इसका मकसद नियुक्तियों में पारदर्शिता, एकरूपता और न्यायाधिकरणों की संस्थागत स्वतंत्रता को मजबूत करना है।
राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन का प्रस्ताव
विभिन्न न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों के चयन के लिए आयोग के गठन से जुड़ा विधेयक अगले सप्ताह लोकसभा में पेश किए जाने की तैयारी है। प्रस्तावित व्यवस्था में नियुक्ति प्रक्रिया के साथ-साथ पदों की योग्यता, सेवा शर्तों और चयन के मानकों को भी स्पष्ट किया जाएगा।
प्रस्तावित राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग का मुख्यालय नई दिल्ली में होगा। इसमें कुल पांच सदस्य होंगे। इनमें एक अध्यक्ष के अलावा दो न्यायिक और दो तकनीकी सदस्य शामिल होंगे।
कौन बन सकेगा आयोग का अध्यक्ष?
प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या किसी हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश आयोग के अध्यक्ष पद के लिए पात्र होंगे। न्यायिक अनुभव के साथ तकनीकी विशेषज्ञता को भी आयोग की संरचना में जगह देने की कोशिश की गई है।
इसका उद्देश्य यह है कि न्यायाधिकरणों में होने वाली नियुक्तियां केवल प्रशासनिक प्रक्रिया न रहकर विशेषज्ञता और निर्धारित मानकों के आधार पर हों।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद बढ़ी कवायद
न्यायाधिकरणों की नियुक्ति व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले भी चिंता जता चुका है। अदालत ने न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के कुछ प्रावधानों को शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना था।
शीर्ष अदालत ने न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति, कार्यकाल तथा कामकाज से जुड़े मानकों में स्पष्टता की आवश्यकता पर भी जोर दिया था। इसी पृष्ठभूमि में एक स्वतंत्र और पेशेवर विशेषज्ञता वाले राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग की जरूरत सामने आई।
चयन से लेकर हटाने तक नियम होंगे तय
प्रस्तावित कानून में संबंधित न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों की योग्यता, चयन प्रक्रिया, नियुक्ति, वेतन-भत्ते, इस्तीफा, पद से हटाने और सेवा की अन्य शर्तों को निर्धारित करने का प्रावधान है।
विधेयक के कानून बनने पर न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 को समाप्त करने का प्रस्ताव है। सरकार की कोशिश है कि अलग-अलग न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों को लेकर मौजूद असमानताओं को कम किया जाए और एक ऐसी व्यवस्था बने जिसमें योग्यता और पारदर्शिता दोनों पर बराबर जोर हो।













