नई दिल्ली /1 अक्टूबर 2026: त्योहारी सीजन शुरू होने से पहले हवाई यात्रियों के लिए ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी चिंता बढ़ा सकती है। घरेलू उड़ानों में इस्तेमाल होने वाला एटीएफ (ATF) अक्टूबर में लगातार तीसरे महीने महंगा हुआ है। इसकी कीमत में करीब 16 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में एयरलाइंस का परिचालन खर्च बढ़ने की संभावना है और इसका असर आने वाले समय में हवाई टिकटों की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है।
भारत में एयरलाइंस के कुल परिचालन खर्च में एटीएफ की हिस्सेदारी काफी महत्वपूर्ण होती है। यही वजह है कि ईंधन की कीमत में मामूली बदलाव भी विमानन कंपनियों की लागत को प्रभावित कर सकता है।
ATF की कीमत 121.28 से बढ़कर करीब 137 रुपये प्रति लीटर
अक्टूबर में एटीएफ की कीमत करीब 13.22 प्रतिशत बढ़ी है। इससे पहले इसकी कीमत 121.28 रुपये प्रति लीटर थी, जो अब करीब 137 रुपये प्रति लीटर पहुंच गई है।
इस बढ़ोतरी का सीधा असर एयरलाइंस के ईंधन बिल पर पड़ेगा। हालांकि, इसका पूरा बोझ यात्रियों पर ही डाला जाएगा, यह जरूरी नहीं है। टिकट की कीमतें मांग, सीटों की उपलब्धता, रूट, प्रतिस्पर्धा और एयरलाइन की व्यावसायिक रणनीति समेत कई कारकों पर निर्भर करती हैं।
कच्चे तेल और जेट फ्यूल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर
इस साल पश्चिम एशिया में तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और जेट फ्यूल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में कीमतों में बदलाव का असर घरेलू ईंधन लागत पर भी पड़ता है।
इसके अलावा डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर भी आयातित ईंधन की लागत को प्रभावित करती है। इन परिस्थितियों को देखते हुए घरेलू विमानन क्षेत्र के लिए एटीएफ की कीमतों में बदलाव एयरलाइंस के खर्च पर सीधा असर डालता है।
एयरलाइंस के खर्च में ईंधन की बड़ी हिस्सेदारी
विमान संचालन में एयरलाइंस को केवल ईंधन का खर्च ही नहीं उठाना पड़ता। पायलट और केबिन क्रू की सैलरी, विमान का किराया या लीज, रखरखाव, एयरपोर्ट शुल्क और दूसरे परिचालन खर्च भी होते हैं।
इन सबके बीच एटीएफ एयरलाइंस के कुल परिचालन खर्च का करीब 35 से 40 प्रतिशत तक हिस्सा हो सकता है। इसलिए ईंधन की कीमत बढ़ने पर विमानन कंपनियों की लागत पर खासा असर पड़ता है।
अप्रैल में सरकार ने घरेलू उड़ानों के लिए एटीएफ की कीमतों में बढ़ोतरी को सीमित करने का फैसला किया था। उस समय एयर इंडिया, इंडिगो और अकासा जैसी एयरलाइंस ने इस कदम का स्वागत किया था। लेकिन पिछले तीन महीनों में कीमतों में लगातार हुई बढ़ोतरी ने ईंधन लागत को लेकर दबाव फिर बढ़ा दिया है।
दिल्ली-मुंबई की एक उड़ान पर कितना बढ़ सकता है खर्च?
इसे एक उदाहरण से समझें। दिल्ली से मुंबई जैसे करीब दो घंटे के रूट पर उड़ने वाला एयरबस A320 विमान परिस्थितियों के आधार पर लगभग 5,000 से 6,000 लीटर ईंधन की खपत कर सकता है।
अगर एटीएफ की कीमत में 16 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी मानें, तो:
- 5,000 लीटर × 16 रुपये = 80,000 रुपये
- 6,000 लीटर × 16 रुपये = 96,000 रुपये
यानी इस उदाहरण में एक उड़ान का ईंधन खर्च लगभग 80 हजार से 96 हजार रुपये तक बढ़ सकता है।
अगर विमान में करीब 180 सीटें हैं और 150 यात्री सफर कर रहे हैं, तो केवल इस अतिरिक्त ईंधन लागत को यात्रियों में बांटने पर करीब 533 से 640 रुपये प्रति यात्री का अतिरिक्त खर्च बैठता है।
हालांकि, यह केवल गणितीय अनुमान है। वास्तविक लागत विमान के मॉडल, उड़ान की अवधि, मौसम, हवा की स्थिति, यात्रियों और सामान के वजन तथा अन्य परिचालन परिस्थितियों के अनुसार अलग हो सकती है। एयरलाइन इस अतिरिक्त लागत को टिकट की कीमत में कितना शामिल करती है, यह भी अलग विषय है।
तीन महीने में करीब 27 रुपये बढ़ी ATF की कीमत
एटीएफ की कीमत में पिछले तीन महीनों के दौरान लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
| महीना | एटीएफ की कीमत |
|---|---|
| जुलाई 2026 | करीब ₹110 प्रति लीटर |
| अगस्त 2026 | करीब ₹115 प्रति लीटर |
| सितंबर 2026 | ₹121.28 प्रति लीटर |
| अक्टूबर 2026 | करीब ₹137 प्रति लीटर |
इस हिसाब से जुलाई से अक्टूबर के बीच एटीएफ करीब 27 रुपये प्रति लीटर महंगा हुआ है। अक्टूबर की बढ़ोतरी सबसे बड़ी रही है।
आखिर विमान के लिए क्यों जरूरी है ATF?
एटीएफ यानी एविएशन टर्बाइन फ्यूल विमानों में इस्तेमाल होने वाला प्रमुख ईंधन है। जिस तरह सड़क पर चलने वाली कारों के लिए पेट्रोल या डीजल जरूरी है, उसी तरह जेट इंजन वाले विमानों के संचालन के लिए एटीएफ की आवश्यकता होती है।
इसलिए जब एटीएफ की कीमत बढ़ती है तो एयरलाइंस की लागत भी बढ़ती है। इसका कुछ हिस्सा कंपनियां अपने स्तर पर वहन कर सकती हैं, जबकि परिस्थितियों के अनुसार बढ़ी हुई लागत का कुछ असर किराये पर भी पड़ सकता है।
त्योहारी सीजन में यात्रियों के लिए इसका मतलब यही है कि हवाई टिकट बुक करते समय केवल बेस फेयर नहीं, बल्कि मांग और उपलब्ध सीटों पर भी नजर रखना जरूरी होगा।












