राष्ट्रीय उत्तर प्रदेश राज्य अंतरराष्ट्रीय खेल मनोरंजन एजुकेशन बिजनेस राशिफल

---Advertisement---

अमेरिका क्यों बन रहा ‘अकेली ताकत’? बदलती वैश्विक तस्वीर पर जयशंकर का बड़ा बयान

On: October 5, 2026
Follow Us:
बदलती वैश्विक तस्वीर पर जयशंकर का बड़ा बयान
---Advertisement---

नई दिल्ली (सोमवार, 5 अक्टूबर 2026): दुनिया की राजनीति तेजी से बदल रही है और इस बदलाव के केंद्र में अमेरिका तथा चीन की बढ़ती प्रतिस्पर्धा दिखाई दे रही है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बदलती वैश्विक व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि अमेरिका ने अपनी पसंद से खुद को एक तरह से “अधिक अकेली ताकत” बनाने का रास्ता चुना है। उनके मुताबिक, वाशिंगटन के रुख में आया यह बदलाव और चीन का बढ़ता प्रभाव आज के वैश्विक परिदृश्य की दो प्रमुख विशेषताएं हैं।

जयशंकर ने यह बात नई दिल्ली में आयोजित 62वें म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस के दौरान म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में कही। उन्होंने कहा कि अमेरिका की वैश्विक भूमिका में आया बदलाव केवल किसी एक सरकार की नीतियों तक सीमित नहीं है। इसके कुछ हिस्से व्यापक और संरचनात्मक बदलावों को भी दर्शाते हैं।

बदलती वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका और चीन की भूमिका

जयशंकर के मुताबिक मौजूदा वैश्विक तस्वीर को समझने के लिए दो बड़े बदलावों पर नजर डालनी होगी। पहला, अमेरिका की वैश्विक भूमिका में आया “रेडिकल रीपोजिशनिंग” और दूसरा, चीन का लगातार बढ़ता प्रभाव।

उन्होंने कहा कि अमेरिका का यह बदलाव उसकी अपनी पसंद और रणनीतिक रुख का हिस्सा है। वहीं चीन का उभार वैश्विक शक्ति संतुलन को नए सिरे से प्रभावित कर रहा है। दोनों देशों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा अब केवल वॉशिंगटन और बीजिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर दूसरे देशों की नीतियों और विकल्पों पर भी पड़ रहा है।

विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि देशों के पास मौजूद आर्थिक, तकनीकी, रणनीतिक और दूसरे तरह के प्रभावों का इस्तेमाल अब प्रतिस्पर्धा में एक तरह के हथियार के तौर पर किया जा रहा है। इसके साथ ही वैश्विक अर्थव्यवस्था की आपसी निर्भरता भी बनी हुई है। यही विरोधाभास आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति को और जटिल बना रहा है।

उभरती ताकतें अपना रास्ता खुद तलाश रहीं

जयशंकर ने कहा कि उभरती और मध्यम शक्तियां अब अपने हितों को लेकर पहले से ज्यादा सजग हैं। ये देश आत्मनिर्भरता, आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता और जोखिम कम करने की रणनीति पर जोर दे रहे हैं।

उनके अनुसार, आज देशों को हर मुद्दे पर एक जैसी राय रखने की जरूरत नहीं है। जहां साझा हित मौजूद हों, वहां सीमित लेकिन व्यावहारिक सहयोग भी संभव है। यही सोच आने वाले समय में वैश्विक साझेदारियों की नई तस्वीर तैयार कर सकती है।

भारत भी इसी व्यापक बदलाव के बीच अलग-अलग देशों के साथ अपने संबंधों में संतुलन और रणनीतिक गुंजाइश बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।

रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत की भूमिका बदली?

म्यूनिख बैठक में जयशंकर ने रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर भारत के रुख पर भी बात की। उन्होंने कहा कि भारत की भूमिका केवल संवाद और कूटनीति की वकालत तक सीमित नहीं रही है। अब नई दिल्ली मॉस्को और कीव दोनों के साथ अधिक सक्रिय बातचीत कर रही है।

जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत युद्ध का अंत चाहता है और इसके लिए संवाद तथा कूटनीति जरूरी है। उन्होंने बताया कि भारत रूस और यूक्रेन दोनों से बातचीत कर रहा है और संघर्ष से जुड़े व्यावहारिक मुद्दों पर चर्चा जारी है।

इसमें काला सागर में जहाजों की सुरक्षा, अनाज और ऊर्जा के निर्यात तथा दोनों पक्षों की तत्काल सुरक्षा चिंताओं जैसे मुद्दे भी शामिल हैं।

रूस और यूक्रेन से संपर्क में है भारत

भारत लंबे समय से रूस-यूक्रेन युद्ध के समाधान के लिए बातचीत और कूटनीति पर जोर देता रहा है। हालांकि, जयशंकर के हालिया बयान से संकेत मिलता है कि नई दिल्ली अब इस दिशा में केवल अपील करने के बजाय व्यावहारिक स्तर पर भी संपर्क बढ़ा रही है।

उन्होंने कहा कि भारत दोनों पक्षों के संपर्क में है और युद्ध को समाप्त करने की दिशा में संभावित रास्तों पर चर्चा कर रहा है। हालांकि, भारत की ओर से किसी औपचारिक मध्यस्थता योजना की पूरी सार्वजनिक रूपरेखा अभी सामने नहीं रखी गई है। इसलिए इसे सीधे तौर पर औपचारिक मध्यस्थता कहना जल्दबाजी होगी।

रूस के साथ रिश्तों पर भी जयशंकर ने दिया जवाब

म्यूनिख बैठक में जयशंकर ने भारत-रूस संबंधों के ऐतिहासिक पक्ष का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि संकट के समय रूस ने भारत का साथ दिया है और यह इतिहास भारत की विदेश नीति की सोच को प्रभावित करता है।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आज भारत-रूस संबंध केवल रक्षा और सुरक्षा तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, व्यापार, निवेश, ऊर्जा और संसाधनों जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग है।

भारत के लिए बदलती दुनिया में क्या मायने?

जयशंकर के बयान का व्यापक संदेश यही है कि दुनिया अब एक सरल द्विध्रुवीय व्यवस्था में नहीं चल रही। अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन भारत समेत कई उभरती शक्तियां अपने हितों के मुताबिक अलग-अलग साझेदारियों का रास्ता चुन रही हैं।

ऐसे समय में भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अमेरिका, रूस, चीन और अन्य प्रमुख शक्तियों के साथ अपने संबंधों को इस तरह आगे बढ़ाए कि राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक स्वायत्तता के लिए पर्याप्त गुंजाइश बनी रहे। रूस-यूक्रेन संघर्ष पर दोनों पक्षों से संपर्क बनाए रखना भी इसी व्यापक कूटनीतिक दृष्टिकोण का हिस्सा है।

जयशंकर के हालिया बयान इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे केवल अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा की बात नहीं करते, बल्कि उस बदलती दुनिया की ओर भी संकेत करते हैं जिसमें मध्यम और उभरती शक्तियां अब वैश्विक फैसलों में अपनी जगह और प्रभाव को नए तरीके से परिभाषित कर रही हैं।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now