अंतरराष्ट्रीय डेस्क/28 सितंबर 2026: अमेरिका ने भारत से आने वाली कुछ विशेष दवाओं और फार्मास्युटिकल सामग्री को जीरो टैरिफ वाली सूची में शामिल किया है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब वॉशिंगटन कुछ पेटेंट वाली दवाओं और उनसे संबंधित सामग्री पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू करने की तैयारी कर रहा है। ऐसे में अमेरिकी बाजार में मौजूद भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए यह सीमित लेकिन महत्वपूर्ण राहत मानी जा रही है।
हालांकि, इसे भारत से अमेरिका जाने वाली सभी दवाओं पर टैरिफ खत्म होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। छूट केवल उन उत्पादों पर लागू होगी जो अमेरिकी सरकार की निर्धारित श्रेणियों में आते हैं।
जीरो टैरिफ में कौन-कौन सी दवाएं शामिल हैं?
अमेरिका की सूची में कई विशेष और अपेक्षाकृत जटिल फार्मास्युटिकल उत्पाद शामिल किए गए हैं। इनमें ऑरफन ड्रग्स, न्यूक्लियर मेडिसिन, प्लाज्मा-डिराइव्ड थेरेपी, फर्टिलिटी ड्रग्स, सेल थेरेपी, जीन थेरेपी और एंटीबॉडी-ड्रग कॉन्जुगेट्स जैसी श्रेणियां शामिल हैं।
इसके अलावा केमिकल, बायोलॉजिकल, रेडियोलॉजिकल और न्यूक्लियर खतरों से निपटने के लिए इस्तेमाल होने वाले कुछ मेडिकल काउंटरमेजर तथा पशु स्वास्थ्य से जुड़े कुछ उत्पाद भी इस व्यवस्था में शामिल हैं।
यानी राहत का दायरा आम दवाओं की पूरी खेप पर नहीं, बल्कि अमेरिका द्वारा निर्धारित विशेष उत्पाद श्रेणियों पर केंद्रित है।
29 सितंबर से क्यों महत्वपूर्ण हो रही है अमेरिकी टैरिफ नीति?
अमेरिका ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अप्रैल 2026 के आदेश के तहत फार्मास्युटिकल्स और फार्मास्युटिकल सामग्री के आयात पर Trade Expansion Act की Section 232 के तहत नई व्यवस्था लागू की है। इसके तहत कुछ पेटेंट वाली दवाओं और संबंधित सामग्री पर 100 प्रतिशत टैरिफ का प्रावधान किया गया है। कुछ कंपनियों के लिए यह व्यवस्था 31 जुलाई से प्रभावी हुई, जबकि अन्य कवर किए गए आयातकों पर इसका विस्तार 29 सितंबर 2026 से होना है।
यही वजह है कि जीरो टैरिफ वाली विशेष सूची का महत्व बढ़ जाता है। जिन भारतीय उत्पादों को इस सूची के तहत पात्रता मिलेगी, उन पर निर्धारित शर्तों के अनुसार अमेरिकी टैरिफ शून्य रह सकता है।
क्या भारत की सभी दवाओं पर टैरिफ खत्म हो गया?
नहीं। यह सबसे महत्वपूर्ण बात है।
अमेरिका की नई सूची में शामिल होना सभी भारतीय फार्मास्युटिकल उत्पादों के लिए सार्वभौमिक टैरिफ छूट नहीं है। यह केवल राष्ट्रपति के आदेश में परिभाषित पात्र दवाओं और फार्मास्युटिकल सामग्री पर लागू है। इसलिए किसी भारतीय कंपनी का अमेरिका को निर्यात अपने आप जीरो टैरिफ के दायरे में नहीं आ जाएगा।
दूसरी ओर, अमेरिकी वाणिज्य विभाग के नोटिस के अनुसार, जेनेरिक दवाएं और उनसे जुड़े इंग्रीडिएंट्स वर्तमान Section 232 फार्मास्युटिकल टैरिफ से बाहर हैं। भारत के लिए यह पहलू खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि अमेरिकी दवा बाजार में भारतीय कंपनियों की मजबूत मौजूदगी जेनेरिक क्षेत्र में है।
भारत के साथ इन देशों को भी मिली जगह
अमेरिकी सूची में भारत अकेला देश नहीं है। भारत के साथ अर्जेंटीना, बांग्लादेश, कंबोडिया, इक्वाडोर, अल साल्वाडोर, यूरोपीय संघ, ग्वाटेमाला, इंडोनेशिया, जापान, जॉर्डन, मलेशिया, नॉर्थ मैसेडोनिया, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड और लिकटेंस्टीन, ताइवान, थाईलैंड, ब्रिटेन और वियतनाम को भी शामिल किया गया है।
अमेरिकी वाणिज्य विभाग के अनुसार, इन देशों से आने वाले पात्र उत्पादों को जीरो प्रतिशत टैरिफ की सुविधा मौजूदा या संभावित व्यापार एवं सुरक्षा ढांचे से जुड़े समझौतों के संदर्भ में दी जा सकती है।
भारतीय फार्मा सेक्टर के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
भारत दुनिया के बड़े जेनेरिक दवा निर्माताओं में शामिल है और अमेरिकी हेल्थकेयर सप्लाई चेन में भारतीय कंपनियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। भारतीय कंपनियां तैयार दवाओं के साथ-साथ Active Pharmaceutical Ingredients (APIs) और विशेष फार्मास्युटिकल उत्पादों की भी आपूर्ति करती हैं।
ऐसे में अमेरिका द्वारा कुछ विशेष दवा श्रेणियों के लिए जीरो टैरिफ का रास्ता खुलना उन भारतीय निर्माताओं के लिए अहम हो सकता है, जिनके उत्पाद सूची में निर्धारित श्रेणियों और शर्तों को पूरा करते हैं। खासकर महंगी और विशेषीकृत थेरेपी वाली दवाओं के मामले में टैरिफ लागत का असर अपेक्षाकृत महत्वपूर्ण हो सकता है।
हालिया घटनाक्रम पर बाजार विश्लेषण में भी भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए इसे टैरिफ संबंधी अनिश्चितता में कमी के रूप में देखा गया है।
अमेरिका की नीति में घरेलू उत्पादन पर भी जोर
इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पहलू भी है। अमेरिका एक ओर कुछ विदेशी दवाओं को विशेष परिस्थितियों में टैरिफ राहत दे रहा है, वहीं दूसरी ओर टैरिफ नीति के जरिए देश के भीतर फार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
इसलिए भारत के लिए यह फैसला व्यापक टैरिफ विवाद का अंत नहीं है। बल्कि यह चुनिंदा दवा श्रेणियों के लिए एक लक्षित राहत है।
भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए आगे की चुनौती यह होगी कि वे यह सुनिश्चित करें कि उनके संबंधित उत्पाद अमेरिकी नियमों के तहत किस श्रेणी में आते हैं और उन पर कौन-सी टैरिफ व्यवस्था लागू होती है।
क्या समझें इस फैसले से?
सीधी बात यह है कि अमेरिका ने भारतीय फार्मा सेक्टर को व्यापक टैरिफ छूट नहीं दी है, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण विशेष दवाओं और सामग्री के लिए जीरो टैरिफ का रास्ता जरूर खोला है। जेनेरिक दवाओं को मौजूदा Section 232 फार्मास्युटिकल टैरिफ से बाहर रखना और विशेष थेरेपी वाली दवाओं को लक्षित छूट देना—दोनों बातें भारतीय दवा उद्योग के लिए महत्वपूर्ण हैं।
आने वाले समय में असली असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी टैरिफ व्यवस्था किस तरह लागू होती है और भारतीय कंपनियों के कितने उत्पाद इन निर्धारित श्रेणियों में आते हैं।













