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बारिश थमी तो फिर बिगड़ी दिल्ली-एनसीआर की हवा, 48 घंटे में PM2.5 37.9 फीसदी बढ़ा

On: October 1, 2026
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बारिश थमी तो फिर बिगड़ी दिल्ली-एनसीआर की हवा
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नई दिल्ली/1 अक्टूबर 2026: बारिश के दौरान दिल्ली-एनसीआर की हवा को मिलने वाली राहत एक बार फिर अस्थायी साबित हुई है। दिल्ली-एनसीआर की हवा में बारिश थमने के बाद प्रदूषण तेजी से लौटने लगा। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (CSE) के नए विश्लेषण के मुताबिक, मानसून के 92 दिनों में दिल्ली को केवल एक दिन ‘अच्छी’ वायु गुणवत्ता मिली। बारिश के दौरान PM2.5 का स्तर घटा जरूर, लेकिन 48 घंटे के भीतर इसमें 37.9 फीसदी का उछाल दर्ज किया गया।

दिल्ली-एनसीआर की हवा पर बारिश का असर कितना रहा?

सीएसई ने अप्रैल-मई की गर्मियों और जून-अगस्त के मानसून के आंकड़ों का विश्लेषण किया है। इसके मुताबिक जून से अगस्त 2026 के बीच दिल्ली में 576.9 मिलीमीटर बारिश हुई। इसके बावजूद 92 दिनों में केवल 9 जुलाई को AQI ‘अच्छी’ श्रेणी में रहा। उस दिन सफदरजंग और पालम मौसम केंद्रों पर बारिश का संयुक्त औसत 67.75 मिलीमीटर था।

मानसून की सबसे ज्यादा एक दिन की बारिश 8 अगस्त को 101.05 मिलीमीटर दर्ज की गई। लेकिन इतनी बारिश के बावजूद उस दिन हवा ‘अच्छी’ नहीं, बल्कि ‘संतोषजनक’ श्रेणी में रही। सीएसई के मुताबिक, यह इस बात का संकेत है कि बारिश के बावजूद दिल्ली में प्रदूषण का आधारभूत स्तर काफी ऊंचा बना हुआ है।

बारिश रुकी और PM2.5 फिर तेजी से बढ़ा

सीएसई ने मानसून के दौरान हुई छह अलग-अलग बारिश की घटनाओं का विश्लेषण किया। बारिश शुरू होने से पहले PM2.5 का औसत स्तर 40.6 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था। बारिश के दौरान यह घटकर 32.7 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रह गया। यानी बारिश से PM2.5 में करीब 19.5 फीसदी की कमी आई।

लेकिन राहत ज्यादा देर नहीं टिकी। बारिश खत्म होने के 24 घंटे बाद PM2.5 बढ़कर 36.2 माइक्रोग्राम पहुंच गया। 48 घंटे बाद यह 45.1 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हो गया। यानी बारिश के दौरान दर्ज स्तर की तुलना में 48 घंटे में PM2.5 37.9 फीसदी बढ़ गया। इतना ही नहीं, यह बारिश शुरू होने से पहले के औसत स्तर से भी करीब 11.1 फीसदी ज्यादा था।

सीएसई ने इसे ‘वॉशआउट और क्विक रिबाउंड’ पैटर्न के रूप में रेखांकित किया है। बारिश हवा में मौजूद कणों को नीचे बैठा देती है, लेकिन प्रदूषण के स्रोत बंद नहीं होते। मौसम साफ होते ही उत्सर्जन दोबारा वातावरण में जमा होने लगता है।

मानसून के 92 दिनों में सिर्फ एक दिन रही ‘अच्छी’ हवा

मानसून के दौरान दिल्ली में PM2.5 का औसत स्तर 40.2 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा। गर्मियों यानी अप्रैल-मई में यह औसत 60.2 माइक्रोग्राम था। इस तरह मानसून में PM2.5 का औसत स्तर गर्मियों की तुलना में करीब 33.2 फीसदी कम रहा।

फिर भी हवा को लगातार साफ नहीं कहा जा सका। 92 दिनों में:

  • 53 दिन AQI ‘मध्यम’ श्रेणी में रहा।
  • 35 दिन हवा ‘संतोषजनक’ रही।
  • 3 दिन AQI ‘खराब’ श्रेणी में रहा।
  • केवल 1 दिन हवा ‘अच्छी’ श्रेणी में दर्ज हुई।

यानी बारिश के मौसम में भी दिल्ली की हवा का सबसे बड़ा हिस्सा ‘मध्यम’ श्रेणी में रहा।

बारिश के बाद कौन से प्रदूषक बढ़े?

बारिश PM2.5 और PM10 जैसे कणों को वातावरण से हटाने में मदद करती है। लेकिन गैसीय प्रदूषकों पर इसका असर अलग होता है। PM2.5 घटने के बाद ओजोन, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसे प्रदूषक दैनिक AQI को प्रभावित करने लगे।

सीएसई के मुताबिक, मानसून के 20 दिनों में ओजोन प्रमुख प्रदूषक रहा। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड की प्रमुख प्रदूषक के रूप में मौजूदगी गर्मियों के 3 फीसदी दिनों से बढ़कर मानसून में 10 फीसदी दिनों तक पहुंच गई। वहीं कार्बन मोनोऑक्साइड मानसून के 7 फीसदी दिनों में प्रमुख प्रदूषक रहा।

सीएसई की अर्बन लैब की डिप्टी प्रोग्राम मैनेजर शरणजीत कौर के मुताबिक, बारिश के दौरान कणों का स्तर घटता है, लेकिन वाहनों, डीजल जनरेटर और औद्योगिक गतिविधियों से निकलने वाले गैसीय उत्सर्जन बने रहते हैं।

30 सितंबर को दिल्ली का AQI 129

मानसून की विदाई के बाद दिल्ली की हवा में बदलाव 30 सितंबर के आंकड़ों में भी नजर आया। सीपीसीबी के आंकड़ों के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया कि दिल्ली का AQI 29 सितंबर के 71 से बढ़कर 30 सितंबर को 129 हो गया। यानी एक दिन में 58 अंकों की बढ़ोतरी हुई और हवा ‘संतोषजनक’ से ‘मध्यम’ श्रेणी में पहुंच गई।

30 सितंबर को दिल्ली के साथ एनसीआर के कई शहरों में भी हवा ‘मध्यम’ श्रेणी में रही। हालांकि अलग-अलग समय और मॉनिटरिंग स्टेशनों के आधार पर AQI में अंतर देखा जा सकता है, इसलिए शहर के औसत और किसी एक स्टेशन के आंकड़े को अलग-अलग समझना जरूरी है।

मानसून खत्म, अब सर्दियों की चिंता

भारत मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक दक्षिण-पश्चिम मानसून 23 सितंबर 2026 को दिल्ली से वापस लौट गया, जबकि सामान्य वापसी की तारीख 25 सितंबर मानी जाती है। इसके साथ बारिश से मिलने वाली प्राकृतिक ‘वॉशआउट’ प्रक्रिया भी कम हो गई है।

अब दिल्ली-एनसीआर पोस्ट-मानसून से सर्दियों की ओर बढ़ रहा है। इस दौरान हवा की ऊपरी परत की ऊंचाई कम होने, तापमान में उलटफेर और हवा के ठहराव जैसी स्थितियां प्रदूषकों को जमीन के करीब रोक सकती हैं। ऐसे मौसम में पहले से मौजूद उत्सर्जन हवा की गुणवत्ता को तेजी से प्रभावित कर सकते हैं।

सीएसई की कार्यकारी निदेशक, रिसर्च एंड एडवोकेसी, अनुमिता रॉयचौधरी के मुताबिक, दिल्ली को सिर्फ मानसून की बारिश या सर्दियों में लगाए जाने वाले अस्थायी आपातकालीन प्रतिबंधों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उनका जोर पूरे साल और पूरे एनसीआर क्षेत्र में उत्सर्जन कम करने की रणनीति पर है।

सिर्फ सर्दियों के प्रतिबंधों से नहीं चलेगा काम

सीएसई के विश्लेषण में वाहनों, उद्योगों, कचरा जलाने, निर्माण गतिविधियों और डीजल जनरेटर जैसे स्रोतों से होने वाले उत्सर्जन पर सालभर नियंत्रण की जरूरत बताई गई है।

इसके लिए सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करने, इलेक्ट्रिक वाहनों और शून्य-उत्सर्जन माल ढुलाई को बढ़ावा देने, उद्योगों में स्वच्छ ईंधन और विद्युतीकरण, खुले में कचरा जलाने पर प्रभावी रोक तथा निर्माण कचरे के बेहतर प्रबंधन जैसे उपाय सुझाए गए हैं। साथ ही बिजली आपूर्ति को मजबूत कर डीजल जनरेटर पर निर्भरता घटाने पर भी जोर दिया गया है।

सीएसई ने यह भी स्पष्ट किया है कि अध्ययन बारिश और PM2.5 के बीच संबंध दिखाता है, लेकिन बारिश के प्रभाव को हवा की गति, हवा की दिशा, मिक्सिंग हाइट, आर्द्रता और स्थानीय उत्सर्जन में बदलाव जैसे अन्य मौसम संबंधी कारकों से पूरी तरह अलग करके नहीं देखा गया है। इसलिए आंकड़ों को मौसम के व्यापक संदर्भ में समझना जरूरी है।

एक्यूआई की छह श्रेणियां

  • 0-50: अच्छी
  • 51-100: संतोषजनक
  • 101-200: मध्यम
  • 201-300: खराब
  • 301-400: बहुत खराब
  • 401-500: गंभीर

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