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वैश्विक अनिश्चितता स्थायी, भविष्य की तैयारी पर जोर; वित्त मंत्री सीतारमण ने बताईं भारत की 4 प्राथमिकताएं

On: October 3, 2026
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वित्त मंत्री सीतारमण ने बताईं भारत की 4 प्राथमिकताएं
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नई दिल्ली, 3 अक्टूबर 2026। दुनिया की अर्थव्यवस्था जिस दौर से गुजर रही है, उसमें भू-राजनीतिक तनाव अब केवल कूटनीति तक सीमित नहीं रह गया है। इसका असर कारोबार, निवेश और आपूर्ति शृंखला पर भी दिखाई दे रहा है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए कहा है कि अनिश्चितता अब अस्थायी घटना नहीं, बल्कि आने वाले समय की स्थायी चुनौती के रूप में देखी जानी चाहिए। ऐसे में भारत को परिस्थितियों का इंतजार करने के बजाय भविष्य की तैयारी पर ध्यान देना होगा।

कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री ने भारत की भावी आर्थिक रणनीति की चार प्रमुख प्राथमिकताओं का उल्लेख किया। इनमें राष्ट्रीय सुरक्षा और महत्वपूर्ण कच्चे माल की आपूर्ति, वैश्विक आर्थिक संबंधों को मजबूत बनाए रखना, बदलती तकनीक के अनुरूप कौशल विकास और अनुसंधान एवं विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना शामिल है।

वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत की चार प्राथमिकताएं

सीतारमण ने कहा कि आने वाले वर्ष भारत से बेहतर तैयारी और रणनीतिक सोच की मांग करेंगे। उनके मुताबिक, पिछले एक दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था की जो नींव मजबूत की गई है, अब उसी आधार को आगे बढ़ाते हुए 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में काम करना है।

1. रणनीतिक कच्चे माल की आपूर्ति में आत्मनिर्भरता

वित्त मंत्री ने राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रमुख प्राथमिकता बताते हुए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कच्चे माल की आपूर्ति में अधिक आत्मनिर्भरता हासिल करने की जरूरत पर जोर दिया। आधुनिक उद्योग, इलेक्ट्रॉनिक्स और नई तकनीकों के लिए महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता अब आर्थिक नीति के साथ-साथ रणनीतिक जरूरत भी बन गई है।

इसी दिशा में सरकार ने नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन, रेअर अर्थ कॉरिडोर और सेमीकंडक्टर मिशन जैसे कार्यक्रम शुरू किए हैं। मकसद यह है कि महत्वपूर्ण संसाधनों की आपूर्ति के लिए भारत को बाहरी परिस्थितियों पर अत्यधिक निर्भर न रहना पड़े।

2. वैश्विक आर्थिक रिश्तों को बनाए रखना

दूसरी प्राथमिकता वैश्विक आर्थिक संबंधों से जुड़ी है। सीतारमण ने किसी देश का नाम लिए बिना कहा कि भू-राजनीतिक मतभेदों को व्यापार और निवेश के रास्ते में दीवार नहीं बनना चाहिए।

उनके मुताबिक कारोबारी प्रतिबद्धताओं का पालन होना चाहिए और बाजार को खुला बनाए रखने की कोशिश जारी रहनी चाहिए। सेवाओं, उत्पादों, ऊर्जा और पूंजी का प्रवाह जहां तक संभव हो, स्थिर रहना जरूरी है।

यह रुख ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया के कई हिस्सों में व्यापारिक नीतियां तेजी से बदल रही हैं और देशों के बीच आर्थिक संबंधों पर रणनीतिक हितों का प्रभाव बढ़ रहा है।

3. एआई के दौर में कौशल विकास पर जोर

तीसरी प्राथमिकता कौशल विकास है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और दूसरी नई तकनीकों के तेजी से विस्तार ने काम करने के तरीकों के साथ-साथ नौकरियों के लिए जरूरी कौशल को भी बदलना शुरू कर दिया है।

वित्त मंत्री ने कहा कि केवल नए युवा कामगारों को तैयार करना पर्याप्त नहीं होगा। पहले से काम कर रहे लोगों को भी कौशल उन्नयन और नई भूमिकाओं के लिए तैयार करना होगा। उद्योग को प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप और कार्यस्थल पर सीखने की प्रक्रिया में बड़ी भूमिका निभानी होगी।

सरकार की कोशिश यह है कि तकनीक का इस्तेमाल केवल काम को स्वचालित करने तक सीमित न रहे, बल्कि उससे बेहतर रोजगार के अवसर पैदा हों और उत्पादकता में भी वृद्धि हो।

4. आरएंडडी में निजी निवेश बढ़ाना

चौथी प्राथमिकता अनुसंधान एवं विकास (R&D) से संबंधित है। वित्त मंत्री ने भारत में शोध पर होने वाले खर्च और उसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ाने की जरूरत रेखांकित की।

उन्होंने बताया कि भारत का आरएंडडी व्यय सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का 0.83 प्रतिशत है, जबकि वैश्विक औसत 2.7 प्रतिशत है। वहीं भारत के कुल आरएंडडी खर्च में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 36 प्रतिशत है।

सीतारमण के मुताबिक, केवल सरकारी खर्च बढ़ाने से तस्वीर पूरी तरह नहीं बदलेगी। शोध और नवाचार में निवेश का पैमाना बढ़ाने के साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी भी बढ़ानी होगी। इसी उद्देश्य से सरकार ने एक लाख करोड़ रुपये की रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन योजना शुरू की है।

आत्मनिर्भरता के साथ रणनीतिक साझेदारी भी

वित्त मंत्री के संबोधन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि भारत आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ेगा, लेकिन इसका अर्थ दुनिया से दूरी बनाना नहीं है। भारत अपनी रणनीतिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग देशों के साथ साझेदारी भी जारी रखेगा।

सीतारमण के मुताबिक, बदलते वैश्विक माहौल में भारत के सामने चुनौती केवल आर्थिक विकास की गति बनाए रखने की नहीं है। संसाधनों की उपलब्धता, तकनीकी क्षमता, कुशल मानव संसाधन, अनुसंधान और वैश्विक व्यापार संबंधों—इन सभी मोर्चों पर एक साथ तैयारी करनी होगी।

आने वाले वर्षों की यही तस्वीर बताती है कि वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत की आर्थिक रणनीति में आत्मनिर्भरता और वैश्विक सहभागिता दोनों को साथ लेकर चलने पर जोर रहेगा। 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य के लिए सरकार अब आर्थिक मजबूती के साथ रणनीतिक तैयारी को भी उतना ही महत्वपूर्ण मान रही है।

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